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16 साल पुराने मामले में आईपीएस पंकज श्रीवास्तव को करना होगा आपराधिक मामले का सामना

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भोपाल। सीबीआई में संयुक्त संचालक और मप्र कैडर के आईपीएस अफसर पंकज श्रीवास्तव को अब 16 साल पुराने एक मामले में आपराधिक प्रकरण का सामना करना होगा। यह मामला तब का है जब वे बतौर एसपी भिंड में पदस्थ थे। यह मामला उनके खिलाफ भिंड की एक अदालत के आदेश पर दर्ज किया जाना है। अदालत ने यह आदेश उनके खिलाफ दायर एक परिवाद पर दिया है। इसमें अदालत ने माना कि श्रीवास्तव द्वारा 6 साल पुराने एनएसए के एक मामले में आपराधिक षड्यंत्र रचकर कानून की अवहेलना के साथ ही मानहानि की थी।  जिसका केस दर्ज करने का आदेश दिया है। कोर्ट द्वारा उनके अलावा नगरीय प्रशासन विभाग के प्रमुख सचिव पीएस मनीष सिंह तथा एक अन्य अधिकारी के खिलाफ भी यही आदेश दिया है। इसके साथ ही उक्त तीनों अफसरों को 25 मार्च को कोर्ट में पेश होने के निर्देश दिए हैं। दरअसल  तीनों अफसरों पर 25 जनवरी 2005 को पत्रकार मुकेश जैन के खिलाफ झूठे दस्तावेज तैयार कर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत कार्यवाही कर जेल भेजने का आरोप है। जैन द्वारा कोर्ट में पेश सबूतों के आधार पर माना गया है कि अफसरों द्वारा की गई कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण थी। जैन ने इस मामले में खुद पैरवी करते हुए कोर्ट को बताया था कि उन्हें 2005 पंचायत चुनावों में जिला निर्वाचन अधिकारी द्वारा प्रेस फोटोग्राफर के रूप में अधिकृत किया गया था। 9 जनवरी को उन्होंने बूथ कैप्चरिंग के फोटो अखबार में प्रकाशित किए थे तो तत्कालीन कलेक्टर मनीष सिंह, पुलिस अधीक्षक पंकज श्रीवास्तव और तत्कालीन सिटी कोतवाली थाना प्रभारी केआर सिजोरिया ने झूठे दस्तावेज बनाकर जेल भेज दिया था। हाईकोर्ट जबलपुर की सलाहकार समिति ने सुनवाई के दौरान एनएसए को निरस्त कर दिया था, तब दो माह जेल में रहने के बाद उनकी रिहाई हुई थी।
इस मामले में भी चर्चित रह चुके हैं श्रीवास्तव
सीआईडी के तत्कालीन आईजी पंकज श्रीवास्तव पहले भी एक मामले में सरकार के लिए मुसीबत बन चुके हैं। दरअसल साइबर सेल द्वारा फ्रॉड के मामले में दो महिला अधिवक्ताओं को गिरफ्तार किया गया था। उन्हें 23 दिन जेल में रहना पड़ा था। इसकी जांच उस समय सीआईडी के तत्कालीन आईजी पंकज श्रीवास्तव की मॉनिटरिंग में की गई थी। रिहा होने के बाद उक्त महिलाओं ने उन्हें झूठे मामले में फंसाने, पुलिस द्वारा प्रताड़ित करने, आर्थिक तथा मानसिक क्षति पहुंचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी , जिसकी वजह से शासन को सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखना पड़ा था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उक्त महिलाओं को क्षतिपूर्ति के रूप में शासन को दस लाख रुपए देने के निर्देश दिए थे।  इस मामले में दोषी पुलिस अधिकारी तथा कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय जांच  सीआईडी के तत्कालीन आईजी पंकज श्रीवास्तव को दी गई थी। उनके प्रतिनियुक्ति पर जाने के बाद यह जिम्मा आईजी डी. श्रीनिवास वर्मा को दिया गया था।  इस मामले में गृह विभाग द्वारा भी इन दोनों ही अफसरों से सवाल-जवाब कर उसे भुला दिया। अभी यह मामला लोकायुक्त जांच में है। इस मामले ने इतना तूल पकड़ा था कि न्यायालय में शासन को पक्ष रखना मुश्किल हो गया था।

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