नीतीश कुमार राज्यसभा मन से जा रहे या बेमन से, यह उनके सिवा कोई नहीं जानता. पर, उन्हें उकसा-चिढ़ा कर राजद को अब भी ‘खेला होने’ की उम्मीद बनी हुई है. तेजस्वी ने नीतीश को याद दिलाया है कि अगर वे राजद के साथ रहते तो उन्हें यह दिन देखना नहीं पड़ता. राजद को अब भी उम्मीद है कि नीतीश साथ आ जाएं तो महागठबंधन की सरकार बिहार में बन सकती है. इसका गणित यह कि जेडीयू के 85, महागठबंधन के 35 और AIMIM के 5 विधायक साथ आ गए तो यह संख्या 125 हो जाती है. सरकार बनाने के लिए 122 विधायकों का ही समर्थन चाहिए.
राज्यसभा के लिए नामांकन के बाद नाम वापसी की तारीख भी बीत गई. किसी ने नाम वापस नहीं लिया. यानी बिहार की 5 सीटों के लिए पर्चा दाखिल करने वाले सभी 6 उम्मीदवार किस्मत आजमाएंगे. वोटिंग और नतीजे की तारीख 16 मार्च आने में सिर्फ 7 दिन बचे हैं. इस बार राज्यसभा चुनाव की सबसे बड़ी खासियत यह है कि 3 पार्टियों के राष्ट्रीय अध्यक्ष बिहार से चुनाव लड़ रहे हैं. भाजपा ने नितिन नवीन को अपना उम्मीदवार बनाया है तो जेडीयू से सीएम नीतीश कुमार खुद चुनाव लड़ रहे हैं. आरएलएम के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा भी एनडीए समर्थित उम्मीदवार हैं. तीनों पार्टियों का ताल्लुक एनडीए से है. कामयाबी की उम्मीद में राजद ने भी संख्या बल न होने के बावजूद अपना उम्मीदवार उतार दिया है. महागठबंधन की पार्टियों के कुल 35 विधायक हैं. जीत के लिए 41 विधायक चाहिए. यानी 6 की कमी है. राजद इस उम्मीद में है कि बीएसपी के 1 और AIMIM के 5 विधायकों को साध कर वह 5वीं सीट जीत लेगा. दूसरी ओर एनडीए अपनी 4 सीटों के अलावा 5वीं सीट पर भी काबिज होना चाहता है. उसके पास 38 वोट हैं. यानी 3 का जुगाड़ उसी पैटर्न पर एनडीए को करना होगा, जिस पैटर्न से 6 का समर्थन हासिल करने का प्रयास आरजेडी का होगा.
नीतीश के फैसले से सभी सकते में
नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के फैसले ने सबको चौंका दिया है. किसी को यह बात समझ में नहीं आ रही कि मुख्यमंत्री पद छोड़ कर नीतीश ने राज्यसभा जाने का मन क्यों बनाया. हालांकि नीतीश ने यह बात स्पष्ट कर दी है कि वे अपनी दिली इच्छा के कारण राज्यसभा जाना चाहते हैं. वे लोकसभा, विधानसभा और विधान परिषद का सदस्य रह चुके हैं. सिर्फ राज्यसभा उनसे अछूता रह गया था. नीतीश भी जानते हैं कि सक्रिय राजनीति में यह उनकी आखिरी पारी है. संभव है कि इस वजह से ही उन्होंने 6 साला मियाद वाली राज्यसभा का सदस्य बनने की सोची हो. हालांकि जेडीयू समर्थकों को यह बात हजम नहीं हो रही. उन्हें इसमें साजिश दिखती है. नीतीश के बेटे निशांत के राजनीति में दाखिले के बाद साजिश की चर्चा जेडीयू में तो कमजोर पड़ी है, लेकिन महागठबंधन के नेता बिलबिला उठे हैं. विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष राजद की राबड़ी देवी और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष राजद के ही तेजस्वी के यादव के साथ उनकी बहन रोहिणी आचार्य की छटपटाहट देखने लायक है
नीतीश के निर्णय से राजद हलकान!
नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के फैसले पर लालू यादव परिवार की प्रतिक्रियाएं आलोचनात्मक और तंज भरी रही हैं. आरजेडी इसे भाजपा की साजिश के रूप में देख रहा है. लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने इसे लेकर सबसे तीखी प्रतिक्रिया जाहfर की है. उन्होंने X पर कई पोस्ट डाले, जिनमें उन्होंने नीतीश कुमार को ‘चाचा जी’ कह कर संबोधित करते हुए तंज कसे हैं. उन्होंने लिखा- ‘जैसी करनी वैसी भरनी– बार-बार पलटी मारने का अंजाम… सियासी जल्लादों के प्रेम में चाचा जी ऐसे फंस गए कि न इज्जत बची और न नेम प्लेट पर मुख्यमंत्री का नाम रह गया… आपने अपनों के साथ बेवफाई की. अब जो हो रहा है, आप उसके हकदार हैं.’ उन्होंने भाजपा पर आरोप लगाया है कि नीतीश की कोई ‘कमजोर नस’ दबा कर उन्हें कठपुतली बनाया गया और महाराष्ट्र जैसी स्थिति बिहार में दोहरायी गई.
राबड़ी और तेजस्वी भी काफी दुखी
बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री और राजद नेता राबड़ी देवी ने तो नीतीश की बुद्धि पर ही सवाल उठा दिया. उन्होंने कहा- उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो चुकी है. बीजेपी नीतीश को बिहार से भगाना चाहती है और उन्हें राज्यसभा भेज कर मुख्यमंत्री पद से हटाने की साजिश है. नीतीश को बिहार नहीं छोड़ना चाहिए था. उन्हें सीएम पद पर बने रहना चाहिए. मां और बहन की टिप्पणी के बाद तेजस्वी भी नीतीश पर चुटकी लेने से बाज नहीं आए. उन्होंने अपने बयान में कहा कि नीतीश को हाईजैक कर लिया गया था और अब राज्यसभा भेजा जा रहा है. अगर हम उनके साथ होते, तो शायद उन्हें यह दिन नहीं देखना पड़ता. बीजेपी ने महाराष्ट्र इन बिहार किया. जनादेश के साथ धोखा हुआ. नीतीश का यह फैसला जनता के साथ विश्वासघात है.
राजद की ललकार का ‘खेला’ मकद
नीतीश कुमार के भाजपा के साथ रहने के खामियाजे की चिंता पहले भी तेजस्वी और लालू को रही है. खासकर तब से, जब आखिरी बार राजद का साथ छोड़ कर नीतीश ने 2024 में भाजपा संग सरकार बना ली थी. तब विधानसभा में एनडीए का संख्या बल सिर्फ सरकार बनाने भर का था. तब आरजेडी ने नीतीश को सबक सिखाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी थी. सरकार गिराने के लिए राजद ने एनडीए विधायकों को तोड़ने की कोशिश की. हालांकि नीतीश की चाणक्य बुद्धि ने राजद को ही मात दे दी थी. उसके ही विधायकों ने धोखा दे दिया. लालू-तेजस्वी ने ऐसा जाल बुना था कि नीतीश मात खा जाते. विधानसभा अध्यक्ष की कुर्सी के लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष की जोरआजमाइश में नीतीश को मात देने की तैयारी थी. तेजस्वी तो इतने उत्साहित थे कि उन्होंने खेला होने का ऐलान कर दिया था. खेल बनते-बनते ऐसा बिगड़ा कि राजन अपना ही कुनबा संभाल नहीं पाया. मत विभाजन में तेजस्वी की फजीहत हुई
तेजस्वी की अब भी टपक रही लार
नीतीश कुमार राज्यसभा मन से जा रहे या बेमन से, यह उनके सिवा कोई नहीं जानता. पर, उन्हें उकसा-चिढ़ा कर राजद को अब भी खेला होने की उम्मीद बनी हुई है. तभी तो तेजस्वी ने नीतीश को याद दिलाया है कि अगर वे राजद के साथ रहते तो उन्हें यह दिन देखना नहीं पड़ता. राजद को अब भी उम्मीद है कि नीतीश साथ आ जाएं तो महागठबंधन की सरकार बिहार में बन सकती है. इसका गणित भी आरजेडी ने बना रखा है. जेडीयू के 85 विधायक है, जबकि महागठबंधन के विधायकों की संख्या 35 है. AIMIM के 5 विधायक साथ आ गए तो यह संख्या 125 हो जाती है. सरकार बनाने के लिए 122 विधायकों का ही समर्थन चाहिए. नीतीश कुमार की पिछली सरकार भी 125 विधायकों के समर्थन से ही बनी थी. पर, अब ऐसा हो पाएगा, इसकी संभावना दूर-दूर तक नजर नहीं आती. इसलिए कि नीतीश पुरानी गलती दोहराने से बचने की बात कई बार कह चुके हैं.

