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टाइम और वैल्यू दोनों को पहचानना बहुत जरूरी है, तभी सक्सेस मिलेगी-विनोद अग्रवाल

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विनोद अग्रवाल फाउंडेशन ने 2022 में 25 करोड़ रुपये का दान दिया है। कंपनी के स्तर पर अग्रवाल कोल कार्पोरेशन प्राइवेट लिमिटेड और व्यक्तिगत तौर पर विनोद अग्रवाल प्रदेश में सबसे ज्यादा टैक्स देने वाले व्यक्ति हैं। इनके साथ ही इंदौर के राजरतन ग्लोबल वायर के एमडी सुनील चौरड़िया 389वें पर रहे हैं। लिस्ट में पहली बार शहर की यूनिकार्न कंपनी ईकेआइ एनर्जी सर्विसेस को भी जगह मिली है। कंपनी के संचालक मनीष डबकारा 459वें स्थान पर हैं। भोपाल की दिलीप बिल्डकान कंपनी के दिलीप सूर्यवंशी 681 और दिलीप बिल्डकान के ही देवेंद्र जैन 950वें पायदान पर हैं।

‘यदि आपकी मर्सिडीज खरीदने की क्षमता है, फिर भी आप पुराने मॉडल की गाड़ी पर चलते हैं तो ये गलत है। वैसे ही यदि आपकी क्षमता नहीं है, फिर भी आप दिखावे के लिए मर्सिडीज खरीद लें, वह भी ठीक नहीं..। टाइम और वैल्यू दोनों को पहचानना बहुत जरूरी है, तभी सक्सेस मिलेगी।’

यह कहना है मध्यप्रदेश के सबसे बड़े दानवीर विनोद अग्रवाल का। इंदौर के रहने वाले अग्रवाल का नाम हाल ही में तब चर्चा में आया था, जब एक साल में 25 करोड़ रुपए दान देने की वजह से एडलगिव इंडिया ने उनका नाम परोपकार सूची 2022 में शामिल किया। ऐसा करने वाले वे मध्यप्रदेश के पहले शख्स बने। देश में उनका नंबर 34वें नंबर पर है।

दो साल के थे तब परिवार इंदौर आया
10 जून 1963 को हरियाणा के रोहतक में जन्मे विनोद का परिवार जमींदारी से जुड़ा था। 1965 में जब वे दो साल के थे तो उनका परिवार इंदौर आकर बस गया। इंदौर में पिता ने पहले नौकरी की। फिर खुद का ट्रांसपोर्ट बिजनेस शुरू किया। इसके बाद वे धीरे-धीरे कोयले के कारोबार से जुड़ते गए।

ट्रांसपोर्ट बिजनेस शुरू करते समय पिता राम अग्रवाल के साथ विनोद अग्रवाल (ऊपर की पंक्ति में बाएं से पहले)

नौविनोद आठवीं तक इंदौर के विद्या विजय बाल मंदिर में पढ़ा। 9वीं से 12वीं तक मैं दयानंद हायर सेकेंडरी स्कूल का स्टूडेंट रहा हूं। मैं शुरू से ही चाहता था कि खूब पढ़ूं और डिग्रियां हासिल करूं। लेकिन शायद समय ऐसा नहीं चाहता था। परिवार के व्यापार को मेरी जरूरत थी।

मैं जब 9वीं क्लास में था, लगभग 14-15 साल मेरी उम्र थी। तभी बिजनेस को संभालना शुरू कर दिया। तब गुजरात-राजस्थान की यात्राएं की जो कोयला व्यापार से संबंधित थी। तब क्लाइंट को हैंडल करना बड़ा चैलेंज था। कम उम्र होने के कारण कई बार उन्हें भरोसे में लेना मुश्किल हो जाता था। हालांकि मेरा पढ़ने का शौक कम नहीं हुआ। 12वीं की परीक्षा में गोल्ड मेडलिस्ट रहा। प्रदेश में मेरिट लिस्ट में था। व्यापार का सफर भी चलता रहा।

युवा अवस्था में विनोद अग्रवाल कुछ इस तरह नजर आते थे। उन्होंने बताया कि कॉलेज में शिक्षकों के अपमान को देख उन्होंने कॉलेज जाना छोड़ दिया था।

इंदौर आए थे तब साइकिल भी नहीं थी
आगे उन्होंने बताया, जब हम इंदौर आए थे तो हमारे पास एक साइकिल भी नहीं थी। सपना था कि हमारे पास भी एक साइकिल हो। आज प्रभु ने हमें रॉल्स रॉयस दी हुई है। मेरा मानना है कि जो समय आप से करवाए वो करना चाहिए। यदि आप समय के आगे चलेंगे तो भी तकलीफ है, समय से पीछे चलेंगे तो भी तकलीफ है। उदाहरण के लिए यदि आप आज मर्सिडीज कार मेंटेन कर सकते हैं और आप कंजूसी में मारुति में चलना शुरू कर दें तो वो भी गलत है। अगर आपकी पोजिशन मारुति की ही है और आप मर्सिडीज ले आते हैं तो आप संभाल नहीं पाएंगे। मेंटेन नहीं कर पाएंगे, तो परेशान हो जाएंगे। ब्याज का जीवन नहीं बनाए। आप जैसे हैं वैसे रहें।

…और मैंने कॉलेज जाना छोड़ ही दिया
12वीं के बाद कॉमर्स विषय से ग्रेजुएशन की पढ़ाई के लिए मैंने इंदौर के गुजराती कॉलेज को जॉइन किया। शुरुआत में कुछ समय मैं कॉलेज भी गया। कॉलेज का समय सुबह का होता था और 11 बजे ऑफिस भी पहुंचना पड़ता था। लेकिन कुछ ऐसी घटनाएं हुईं (किसी ने कुर्सी के ऊपर झाड़ू रख दी और कहने लगे कि ये हमारे टीचर हैं), जो मेरे मन को खराब कर गई। मुझे लगा कि ऐसी शिक्षा जहां मिल रही है, जहां शिक्षकों का ऐसा अपमान हो रहा है, वहां मैं पढ़ाई जारी नहीं रख पाऊंगा।

इसके बाद मैंने कॉलेज जाना तो छोड़ दिया, लेकिन पढ़ाई नहीं छोड़ी। एग्जाम के समय एक-दो महीने पहले अच्छी मेहनत करके, ऐसे लोगों के सानिध्य में रहता जो हाई क्वालिफाइड थे। हालांकि वे प्रोफेसर नहीं थे। उनके सहयोग से मैंने पढ़ाई की। मैं इंदौर यूनिवर्सिटी में बीकॉम में गोल्ड मेडलिस्ट रहा। इस तरह से व्यापार भी चलता रहा और पढ़ाई भी चलती रही।

इंदौर स्थित विनोद अग्रवाल के घर की तस्वीर। एडलगिव इंडिया परोपकार सूची 2022 में एक साल में 25 करोड़ रुपए दान देने वाले वे मध्यप्रदेश के पहले शख्स हैं।

एग्जाम हॉल में कॉपी खाली छोड़ी और पढ़ाई खत्म हो गई
बीकॉम के बाद एलएलबी करने के लिए गुजराती कॉलेज में ही एडमिशन लिया। मैं जिंदगी में अपने दम पर ही पढ़ा। कई राइटर्स की किताबें और कई सालों के एग्जाम पेपर से रेफरेंस लेकर पढ़ाई करता था। मैं अपने दिमाग से, अपने सिस्टम से पढ़ता था और उसी तरीके की मेरी लॉ की तैयारी थी लेकिन होनी को कौन टाले। परीक्षा के पांच-दस दिन पहले एक फोन आया कि इस तरीके का पेपर ही एग्जाम में आएगा। आपको इसको देखना चाहिए। मैंने मना भी किया कि मेरी यह थ्योरी नहीं है।

कुछ दोस्त साथ में पढ़ते थे। सभी ने कहा कि उसको देखें तो सही। जब उसको देखा तो वह बहुत कुछ अलग था। तो पांच-सात दिन में हमारा फोकस बदला और उस पेपर की तरफ ध्यान चला गया। जब एग्जाम हॉल में गए तो पेपर में से कुछ भी नहीं आया, हमारी जो तैयारी पहले थी, पेपर वैसा ही था। मैं चाहता तो पेपर दे भी सकता था और पास भी हो सकता था। मुझे लगा कि मेरी मेरिट ना बिगड़ जाए। उस चक्कर में मैं खाली पेपर छोड़कर वापस आ गया। यह सबक लेकर कि आपको अपनी मेहनत और अपनी सोच पर ही काम करना चाहिए। कोई भी फोकस डायवर्ट करे, वह नहीं करना चाहिए और उसके बाद मेरी पढ़ाई खत्म हो गई।

विनोद अग्रवाल अपने परिवार के साथ। उनके के मुताबिक पिछले वित्तीय वर्ष में उन्होंने 25 करोड़ की चैरिटी की थी। लेकिन जब उन्होंने ये सब किया था तब ऐसा कुछ दिमाग में नहीं था। हमने अपना काम समझते हुए ये किया था। नंबर वन बनने का सोचकर दान नहीं किया।

सालासर बालाजी से शुरू हुआ दान देने का सिलसिला
मैं समाज से काफी जुड़ा हुआ हूं। समाज के लोग मेरे पास कुछ ना कुछ कामों के लिए आते रहते थे। मेरा थोड़ा-थोड़ा जुड़ाव तो वहां से शुरू हुआ। लेकिन एक बार हम परिवार के साथ राजस्थान यात्रा पर थे। वहां जीण माता के दर्शन करते हुए हम सालासर दरबार पहुंचे। वहां अनोखी घटना हमारे साथ हुई। हम दशहरे वाले दिन पहुंचे थे। इतनी भीड़ में दर्शन के कोई चांस नहीं थे लेकिन एक व्यक्ति हमें मिले।

उन्होंने एक कमरे में हमें बैठाया और कहा कि दस बजे पट बंद होंगे और उसके पहले हम आपको दर्शन करा देंगे। पांच मिनट पहले एक द्वार खुला और सीधे हमें बालाजी महाराज के सामने बैठा दिया। बहुत सुंदर दर्शन हुए। उसी समय उन्होंने कहा कि यह बालाजी का दरबार है और यहां बहुत सारी गतिविधियां चलती हैं। बहुत बड़े काम यहां पर होते हैं और यहां आने वाले लोग अपनी आय का एक हिस्सा बाबा के लिए छोड़ते हैं, जो कि चैरिटी, दान में ही खर्च होता है। ऐसा यहां का संस्कार है।

हनुमान जी को इस रूप में मैंने पहले कभी नहीं देखा था। मेहंदीपुर बालाजी को मां के जमाने से मानते हैं। मेरा ऐसा मानना है कि हनुमान जी का इष्ट हमें हमारी मां से प्राप्त हुआ है। रातभर काफी विचार किया। हमारे जो साथी थे वो इसके पक्ष में नहीं थे लेकिन जो प्रभु की इच्छा थी। अगले दिन पुजारी जी ने जो आंकड़ा कहा वहीं राशि मैंने लिफाफे में रखी थी। तब से मेरी आस्था और प्रगाढ़ हो गई। इसके बाद दो-तीन साल तक जुड़ा रहा।

तब देखा कि सालासर में बहुत सारी एक्टिविटी होती है, चैरिटी होती है। फिर बाबा की प्रेरणा से पंद्रह साल पहले बालाजी सेवार्थ विनोद अग्रवाल फाउंडेशन ट्रस्ट का निर्माण किया और जो भी चैरिटी में करता हूं। उन्हीं को समक्ष रखकर करता हूं। वहीं मां ने परिवार के लिए सब कुछ किया। वो उस समय भी देवी थी और आज भी देवी है। इसलिए मैं सारे प्रोजेक्ट मां के नाम से बनाता हूं। बनाने वाले, करने वाले बालाजी महाराज हैं।

नंबर वन बनने का सोचकर नहीं किया दान
कभी भी नंबर वन बनने के लिए काम नहीं किया। हमने जब से होश संभाला खुद को इंदौर में पाया। यहां आए थे तब कुछ नहीं थे। आज प्रभु ने सब कुछ दिया है। हमारा हर दम एक ध्यान रहा है कि हम कड़ी मेहनत करें, लगन से मेहनत करें। पारदर्शी बिजनेस करें, किसी को धोखा नहीं दें और किसी से धोखा खाएं भी नहीं। समय के साथ अपने आप को परिवर्तित करते रहें। खुद में बदलाव लाते रहे।

आज उसी का नतीजा है कि भगवान ने मध्यप्रदेश में नंबर वन बनाया है। पिछले वित्तीय वर्ष में 25 करोड़ की चैरिटी मैंने की। लेकिन जब हमने ये सब किया था तब ऐसा कुछ दिमाग में नहीं था। हमने अपना काम समझते हुए ये किया है। नंबर वन बनने का सोचकर दान नहीं किया।

इसलिए नहीं छोड़ सकता इंदौर
मुझसे पहले कभी कहा गया था कि भारत के कानून अलग तरीके के हैं। सख्त हैं। यहां टैक्सेशन अधिक है। आपको कहीं न कहीं विदेश में सेटल हो जाना चाहिए। देश से बाहर चले जाना चाहिए। तो मेरा उनको यही जवाब रहता था कि ये मां अहिल्या की पुण्याई की नगरी है। यदि आप यहां आए हैं और आपने यहां से कुछ अर्जन किया है और आप सोचें कि कहीं बाहर चले जाएं और उसको संभाल पाएं।

मेरे पास ऐसे कई उदाहरण है, जिन्होंने अपना होम टाउन बदला तो वो कहीं संभल नहीं पाए। तो मैं तो कभी भी इंदौर नहीं छोड़ूंगा। मुझे तो इस धरती ने सब कुछ दिया है। फिर बेटे की बात हुई कि उसे बाहर सेटल कर दीजिए। NRI बना दीजिए। मैंने कहा कि भारत के संस्कार ऐसे नहीं है। हमारा बेटा ही हमारी भविष्य की धरोहर है। हमारी जो चीजें हैं, उसको उसे आगे बढ़ाना है। मेरा विजन है कि मैं परिवार के साथ इस देश में, इस शहर में रहूं।

वाइफ के कारण मिले गुरुजी
उन्होंने बताया कि हनुमानजी मां से मिले और गुरु अवधेशानंदजी पत्नी नीना के कारण मिले। उन्होंने बताया कि उज्जैन में 2004 सिंहस्थ में उनकी मुलाकात महामंडलेश्वर अवधेशानंदजी से हुई थी। तब शाही स्नान के दौरान गुरुजी ने कहा था कि मैंने तुम्हें अपना शिष्य मान लिया है। बाद में उनसे लगातार संपर्क रहा। कॉलेज की ओपनिंग में वे इंदौर आए, तब पत्नी ने कहा कि हमें गुरु नाम लेना हैं।

परोपकार सूची के अनुसार ये हैं देश के टॉप 3 दानदाता

1. शिव नाडर एंड फैमिली
HCL टेक्नोलॉजीज के फाउंडर-चेयरमैन शिव नाडर एंड फैमिली लिस्ट में पहले नंबर पर हैं। नाडर ने एजुकेशन के क्षेत्र में 1,161 करोड़ रुपए का दान दिया है।

2. अजीम प्रेमजी
484 करोड़ रुपए के डोनेशन के साथ अजीम प्रेमजी लिस्ट में दूसरे नंबर पर हैं। बीते साल की तुलना में अजीम प्रेमजी के डोनेशन में 95% की गिरावट आई है। अजीम प्रेमजी फाउंडेशन ने एजुकेशन के क्षेत्र में 484 करोड़ का दान दिया। वहीं पिछले साल उन्होंने 9,713 करोड़ रुपए डोनेट किए थे।

3. मुकेश अंबानी एंड फैमिली
रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी इस लिस्ट में तीसरे नंबर पर हैं। अंबानी ने भी एजुकेशन के क्षेत्र में 411 करोड़ रुपए दान किए।

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