सोरेन सरकार 6 साल बाद भी राज्य पुलिस के जन-विरोधी रवैये को बदलने में रही नाकाम
रिपोर्ट के मूल में जाने से पहले यह जानना जरूरी हो जाता है कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाजी जर्मनी द्वारा किए गए अत्याचार पर युद्ध के बाद विश्व समुदाय के भीतर मानवाधिकार को लेकर एक बेचैनी बड़ी और एक आम सहमति बनी, जिसके आलोक में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 10 दिसंबर,1948 को पेरिस में मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा की गई।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुए अत्याचारों की पृष्ठभूमि में इस घोषणा को सभी लोगों और सभी राष्ट्रों के लिए मौलिक मानवाधिकारों की एक “साझा मानक” के रूप में अपनाया गया और अपने मूल युद्ध लक्ष्यों के रूप में चार स्वतंत्रताओं को अपनाया गया जिसमें अभिव्यक्ति की आजादी, धर्म की आजादी, अभाव से मुक्ति और भय से मुक्ति शामिल है।
बता दें कि युद्ध के अंत में संयुक्त राष्ट्र चार्टर पर बहस हुई, उसका मसौदा तैयार किया गया और “मौलिक मानवाधिकारों में विश्वास तथा मानव व्यक्ति की गरिमा और मूल्य” की पुष्टि करने के लिए इसकी पुष्टि की गई और सभी सदस्य राज्यों को “जाति, लिंग, भाषा या धर्म के भेदभाव के बिना सभी के लिए मानवाधिकारों और मौलिक स्वतंत्रता के लिए सार्वभौमिक सम्मान और पालन” को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध किया गया।
वहीं भारत में मानवाधिकारों को मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के तहत लागू किया गया, जो 28 सितंबर, 1993 को प्रभावी हुआ और जिसके तहत 12 अक्टूबर, 1993 को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना की गई। इस अधिनियम ने भारत में मानवाधिकारों की सुरक्षा और संवर्धन के लिए वैधानिक आधार प्रदान किया।
इसके बावजूद आज मोदी सरकार नागरिक स्वतंत्रता के अधिकारों को खत्म कर रही है। वहीं दूसरी तरफ झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार भी इन अधिकारों के प्रति अत्यंत उदासीन है। आदिवासी, दलित, मुसलमान और गरीब दैनिक पुलिसिया दमन और लचर न्यायिक व्यवस्था से त्रस्त हैं।
6 साल तक सरकार की कमान संभालने के बावजूद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन राज्य पुलिस के ऐतिहासिक जन-विरोधी रवैये को बदलने में नाकाम रहे हैं। पिछले एक साल में भी फर्जी मामलें, मुठभेड़ के नाम पर हत्या, हिरासत में हिंसा और आदिवासी-वंचितों के शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज न करने के अनगिनत घटनाएं हुई हैं।
10-11 अगस्त 2025 को डकायता गांव (गोड्डा) के सूर्या हांसदा का फर्जी मुठभेड़ सबसे स्पष्ट उदाहरण है। यह भी अत्यंत चिंताजनक है कि आदिवासी व वंचितों के लिए उन पर हुए हिंसा के विरुद्ध एक महज़ प्राथमिकी दर्ज करवाना आज भी चुनौती है।
हाल में 1 नवंबर 2025 को पश्चिमी सिंहभूम के चक्रधरपुर के युवा आदिवासी मनसा सामड को गैर-आदिवासी समुदाय के लोगों ने बुरी तरह से पीटा था। लेकिन स्थानीय पुलिस ने खून से लथपथ मानसा को चार दिनों तक घुमाती रही, लेकिन प्राथमिकी दर्ज नहीं की।
हालांकि पुलिस हिरासत में हिंसा और कुल मौतों की कोई औपचारिक रिपोर्ट नहीं है, लेकिन आदिवासी, दलित और मुसलमान लगातार शिकार हो रहे हैं। उच्च न्यायालय में दर्ज एक पीआईएल के जवाब में राज्य के अनुसार 2018 से अब तक 427 लोगों की जेल में मौत हुई है।
इससे ज्यादा दुखद बात और क्या हो सकती है कि जन आंदोलन से निकली हुई पार्टी की सरकार ही जन आंदोलनों पर डंडे बरसा रही है और फर्जी मामलों में सामाजिक कार्यकर्ताओं को उलझा रही है।
27 अक्टूबर 2025 को चाईबासा के ताम्बो चौक पर क्षेत्र के आदिवासी-मूलवासियों द्वारा शहर में बड़े वाहनों के प्रवेश पर नो-एंट्री लगाने की मांग पर एवं लगातार हो रही दुर्घटनाओं के विरोध में शांतिपूर्ण आन्दोलन पर रात के अंधेरे में पुलिस द्वारा लाठीचार्ज किया गया, आंसूगैस छोड़ा गया, 11 महिलाओं समेत 75 आदिवासियों के विरुद्ध ‘हत्या के प्रयास’ समेत कई गंभीर आरोपों के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई और 16 लोगों व पहले 4 नेतृत्वकारी युवाओं को गिरफ्तार किया गया।
पुलिस की कानून व मानवता विरोधी मानसिकता इससे भी झलकती है कि 18 वर्षीय छात्र साहिल बिरुवा को फर्जी रूप से इस मामले में जेल भेजा गया और फिर हथकड़ी में कॉलेज ले गया इंजीनियरिंग का फॉर्म भरवाने।
चतरा के खूंटीकेवाल कला गांव में पूर्व सामंती जमींदार द्वारा फरवरी 2025 में ग्रामीणों की सामुदायिक भूमि को कब्ज़ा करने की कोशिश को पुलिस व प्रशासन ने साथ दिया एवं इसका विरोध कर रहे आंदोलनकारी विनय सेंगर समेत 33 ग्रामीणों पर रंगदारी, लूटपाट समेत कई बेबुनियाद आरोप पर मामला दर्ज किया गया। विनय सेंगर को 28 फरवरी को और राजा भुईयां को 5 नवंबर को गिरफ्तार किया गया। दोनों अभी भी जेल में हैं।
रांची के लापुंग में भी पूर्व जमींदार द्वारा गांव की जमीन को छीनने की कोशिश के विरुद्ध 3 जून 2025 को पारंपरिक पड़हा बैठक को पुलिस ने रोका, गोली चलाई, दो ग्रामीण घायल हुए और कई फर्जी आरोप आधारित प्राथमिकी दर्ज की गई।
यह भी स्पष्ट है कि हेमंत सोरेन सरकार आंख बंद करके केंद्र के माओवादी-खात्मा अभियान के नाम पर आदिवासी-खात्मा की रणनीति के नक्शेकदम पर चल रही है। हाल में छत्तीसगढ़ में भाकपा (माओवादी) के आदिवासी नेता मांडवी हिड़मा की हत्या ने केंद्र सरकार के माओवाद-खात्मा अभियान के पीछे की सच्चाई को फिर से उजागर किया है।
झारखंड में 21 अप्रैल व 16 जुलाई को गोमिया में हुए मुठभेड़ों पर भी प्रमुख सवाल यही है कि क्या माओवादियों को घेरने के बाद आत्मसमर्पण का मौका दिया गया था?
साथ ही इसमें एक ग्रामीण बलदेव किस्कू की भी मौत हुई थी जिसको दबाने की कोशिश की गई।
इसके बाद भी राज्य में कई मुठभेड़ हुए जिसमें माओवादी, मुख्यतः आदिवासी-दलित, मारे गए।
10 दिसम्बर को मनाये जाने वाले अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस के उपलक्ष्य में झारखंड जनाधिकार महासभा द्वारा आज 3 दिसम्बर को एक प्रेस वार्ता का आयोजन करके पिछले एक साल के कई तथ्यान्वेषणों व जांच के आधार पर लगातार हो रहे मानवाधिकार उल्लंघनों के मामलों को सामने रखा।
प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए अलोका कुजूर, दिनेश मुर्मू, एलिना होरो, मनोज भुइयां, नंदिता भट्टाचार्य , सुशीला बोदरा और सिराज ने कहा कि चाहे छत्तीसगढ़ हो या झारखंड, महासभा का मानना है कि माओवाद खात्मा अभियानों का असली उद्देश्य आदिवासी इलाकों को कॉरपोरेट लूट के लिए सुरक्षित क्षेत्र बनाना है।
इसके लिए आदिवासियों को उनके ही क्षेत्र में सुरक्षा कैम्पों से घेरकर उनकी आज़ादी सीमित की जा रही है। पिछले कुछ सालों में राज्य के आदिवासी सघन क्षेत्रों में लगातार पेसा व अन्य संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन कर, बिना ग्राम सभा की सहमति के, एक के बाद एक सुरक्षा बलों के कैंप लगाये गए।
यह महज़ संयोग नहीं है कि एक तरफ कोल्हान व सारंडा में पिछले कुछ सालों में 25 से अधिक कैम्प स्थापित किए गए और दूसरी ओर वहां लौह अयस्क खनन को बढ़ावा देने की कोशिश भी लगातार चल रही है।
प्रेस वार्ता में व्यवस्थागत मुद्दों को रखते हुए महासभा ने कई मांगें रखते हुए कहा कि राज्य में शोषण और व्यवस्थागत हिंसा के लंबे इतिहास के बावजूद राज्य में मानवाधिकार आयोग को निष्क्रिय करके रखा गया है। लंबे समय से आयोग में अध्यक्ष व अन्य पद रिक्त पड़े हुए हैं। यह महज़ संयोग नहीं है कि राज्य के जेलों में बंद लोगों में 75 % विचाराधीन हैं और अधिकांश आदिवासी, दलित, पिछड़े और मुसलमान हैं।
सरकारी आंकड़ों पर आधारित हाल में जारी “इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2025” के अनुसार पुलिस, न्यायिक व्यवस्था, जेल व कानूनी सहायता के सभी आंकड़ों पर झारखंड देश के सबसे निचले पायदान पर खड़ा है।
झारखंड जनाधिकार महासभा ने मांग की कि चाईबासा नो-एंट्री, लापुंग , चतरा आदि में दर्ज प्राथमीकियों को तुरंत रद्द किया जाए, जेल में डाले गए सामाजिक कार्यकर्ताओं को रिहा किया जाए और दोषी पुलिस के विरुद्ध न्यायसंगत कार्यवाही हो, सूर्या हांसदा के फर्जी एनकाउंटर के लिए जिम्मेवार पुलिस के विरुद्ध न्यायसंगत कार्यवाही हो।
राज्य के सभी थानों व जेल में कड़ी निगरानी सुनिश्चित हो एवं हिरासत में हिंसा के मामलों पर त्वरित न्यायसंगत कार्यवाही सुनिश्चित हो। साथ ही, पुलिस को स्पष्ट निर्देश दिया जाए कि 24 घंटे के अंदर प्राथमिकी दर्ज करना सुनिश्चित करे।
इसके अलावा, आदिवासी क्षेत्रों में तुरंत सशस्त्र आक्रमण और हिंसा को रोका जाए। निष्पक्ष और विश्वसनीय सैन्य अभियान विराम लागू किया जाए। स्थानीय आदिवासियों के साथ उनके मुद्दों पर संवाद किया जाए। 16 जुलाई की मुठभेड़ में ग्रामीण बलदेव किस्कू की मौत की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जाए और न्यायसंगत कार्यवाही की जाए। उनकी मौत के एवज़ में उनके परिवार के सदस्यों को मुआवज़ा दिया जाए।
आईईडी ब्लास्ट में घायल या मरे आदिवासियों को मुआवज़ा दिया जाए। ग्राम सभा की सहमति के बिना बनाये गये सशस्त्र बल कैम्पों व विद्यालयों में लगे कैम्पों को हटाया जाये।
राज्य के आदिवासी-मूलवासियों पर दर्ज यूएपीए समेत माओवाद सम्बंधित गंभीर आरोपों के मामलों व विचाराधीन कैदियों के मामलों की निष्पक्ष जांच के लिए एक न्यायिक आयोग का गठन करने, आदिवासी क्षेत्रों में पेसा, पांचवी अनुसूची प्रावधान, वन अधिकार कानून समेत सभी आदिवासी अधिकार सम्बंधित कानून व संवैधानिक प्रावधानों को पूर्ण रूप से लागू करने और निष्क्रिय पड़े राज्य मानवाधिकार आयोग के सभी पदों पर नियुक्ति कर पूर्ण रूप से सक्रिय करने की मांग भी की गई।

