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ज्यूडिशयरी को अंकल जजेज और पुलिस को थानों की राजशाही से छुटकारा दिलवाने की जरुरत

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एस पी मित्तल,अजमेर

सुप्रीम कोर्ट के सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ को पता है कि हाईकोर्ट के जज जब लंच या डिनर लेते हैं तो डिस्ट्रिक्ट जज सब ऑर्डिनेट (अधीनस्थ कार्मिक) की तरह खड़े रहते हैं। डिस्ट्रिक्ट जज की बैठने की भी हिम्मत नहीं होती है। 15 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के एक समारोह में जस्टिस चंद्रचूड़ ने अब माडर्न ज्यूडिशयरी और इक्वल ज्यूडिशयरी को आगे बढ़ाने की जरूरत है। इस कथन से जाहिर है कि देश के सबसे बड़े न्यायाधीश को न्यायिक व्यवस्था के हालात पता है। जस्टिस चंद्रचूड़ ने हकीकत सार्वजनिक किया, यह अच्छी बात है, लेकिन इस व्यवस्था को सुधारने की जिम्मेदारी भी जस्टिस चंद्रचूड़ की ही है। डिस्ट्रिक्ट जज हाईकोर्ट के जजों के सामने सम्मान पूर्वक बैठ सकें, यह व्यवस्था भी जस्टिस चंद्रचूड़ को ही करनी है। जस्टिस चंद्रचूड़ यह भी जानते होंगे कि हर डिस्ट्रिक्ट जज हाईकोर्ट का जज बनना चाहता है। हाईकोर्ट के जज ही डिस्ट्रिक्ट जज के नामों की सिफारिश करते हैं। सिफारिशें किस तरह होती है, यह भी जस्टिस चंद्रचूड़ को अच्छी तरह पता है। जस्टिस चंद्रचूड़ तो देश के ज्यूडिशियरी सिस्टम से अच्छी तरह वाकिफ है, क्योंकि उनके पिता भी सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रह चुके हैं। आज देश के ज्यूडिशियरी सिस्टम में अंकल जजेज की प्रवृत्ति को रोकने की जरूरत है। हाईकोर्ट के अधिकांश जजों के पुत्र-पुत्रियां, भाई-बहन,चाचा-भतीजे आदि रिश्तेदार वकालत का काम करते हैं। जस्टिस चंद्रचूड़ माने या नहीं, लेकिन ऐसे रिश्तेदारों की प्रेक्टिस खूब चलती है। हाईकोर्ट के जज एक दूसरे के रिश्तेदारों का ख्याल तो रखते ही हैं। इससे उन युवा वकीलों को नुकसान होता है जो अपनी योग्यता के बल पर वकालत करते हैं। पक्षकार भी उन्हीं वकीलों के पास जाता है, जिसका कोई रिश्तेदार जज हो। अंकल जजेज का सिस्टम देश भर के हाईकोर्टों में चल रहा है। अंकल जज जिस प्रदेश में नियुक्त होते हैं, उसी प्रदेश में रिश्तेदार वकील भी पहुंच जाते हैं। जस्टिस चंद्रचूड़ यदि जजों और उनके रिश्तेदार वकीलों की सूची बनवाएंगे तो चौंकाने वाले तथ्य उजागर होंगे। जस्टिस चंद्रचूड़ की यह बात सही है कि डिस्ट्रिक्ट जजों को हाईकोर्ट के जजों के सामने सब ऑर्डिनेट (अधीनस्थ कार्मिकों) की तरह खड़ा नहीं होना चाहिए।

डीजीपी को भी दो टूक:

15 नवंबर को ही राजस्थान के पुलिस महानिदेशक उमेश मिश्रा ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए प्रदेश भर के पुलिस अधिकारियों से संवाद किया। डीजीपी मिश्रा ने इस सच्चाई को स्वीकार किया उनके थानाधिकारी जमीनों के कब्जे छुड़वाने में ही व्यस्त रहते हैं। पीड़ित व्यक्तियों का थानाधिकारी से मिलना मुश्किल होता है। मिश्रा ने हिदायत दी है कि सभी थानाधिकारी प्रतिदिन दोपहर 12 से डेढ़ बजे तक आवश्यक रूप से थानों पर ही उपस्थित रहें। कितने थाना अधिकारी अपने डीजीपी का आदेश मानते हैं, यह तो समय ही बताएगा, लेकिन सच्चाई यह है कि पुलिस थानों पर राजशाही चलती है। थानाधिकारी का बर्ताव किसी राजा से कम नहीं होता। थानाधिकारी का यह बर्ताव सिर्फ आमजन के साथ ही नहीं होता, बल्कि थानों पर नियुक्त अधीनस्थ कार्मिकों के साथ भी होता है। थानाधिकारी की उपस्थिति में अन्य कार्मिकों की स्थिति दरबारी जैसी होती है। हालांकि थनों पर स्वागत कक्ष बनाए गए हैं, लेकिन पीड़ित व्यक्तियों को तो दरबारियों की चाकरी कर ही थानाधिकारी से मिलना होता है। कई बार तो पीड़ित व्यक्ति को घंटों बैठा रहना पड़ता है। थानों पर राजशाही व्यवस्था को देखना है तो डीजीपी मिश्रा को चुपचाप किसी थाने के बाहर खड़ा होकर थानाधिकारी के आने का इंतजार करना चाहिए। थानाधिकारी बड़ी स्टाइल से पुलिस वाहन से उतरेगा। वाहन से उतरने के साथ ही चाकरी शुरू हो जाएगी। यदि थानाधिकारी को वाहन से उतरते देख लिया जाए तो थाने के अंदर के हालातों का अंदाजा लगाया जा सकता है। जो थानाधिकारी किसी फिल्मी हीरो की तरह चश्मा लगाते हैं, उनका अंदाज तो और भी निराला होता है। यदि थाना अधिकारियों के व्यवहार को सुधार दिया जाए तो पुलिस की समस्याओं का समाधान भी हो सकता है। संपूर्ण पुलिस सिस्टम में थानाधिकारी ऐसी कड़ी है जो सबसे महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में कई थानाधिकारी हैं जो अधिकांश समय थाने पर ही उपस्थित रहते हैं तथा आम लोगों से सीधा संवाद रखते हैं। ऐसे थानाधिकारी अपने क्षेत्र की कानून व्यवस्था बनाए रखने में सफल भी होते हैं। 

Ramswaroop Mantri

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