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कर्नाटक हेट स्पीच बिल:नफरत पर लगाम या आजादी का कत्ल? विरोध में राज्यपाल ने राष्ट्रपति को भेजा विधेयक

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कर्नाटक राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने हेट स्पीच बिल 2025 को राष्ट्रपति के पास विचारार्थ भेज दिया है. राज्यपाल ने विधेयक की अस्पष्टता और अभिव्यक्ति की आजादी पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव पर गंभीर चिंता जताई है. उन्होंने तर्क दिया कि नफरत रोकने के नाम पर स्वतंत्रता को खत्म करना समाधान नहीं है. विधेयक में हेट स्पीच की व्यापक परिभाषा और पुलिस शक्तियों के दुरुपयोग की आशंका ने संवैधानिक विवाद पैदा कर दिया है.

लोकतंत्र की बुनियाद स्वतंत्रता पर टिकी है लेकिन क्या होगा जब नफरत रोकने के नाम पर जुबान ही सिल दी जाए? कर्नाटक की राजनीति में इस वक्त एक नया उबाल आया है जिसने राजभवन और सरकार को आमने-सामने खड़ा कर दिया है. राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने राज्य के चर्चित ‘हेट स्पीच और हेट क्राइम (रोकथाम) विधेयक, 2025’ पर अपनी मुहर लगाने के बजाय उसे राष्ट्रपति के पास भेज दिया है. राज्यपाल का स्पष्ट मानना है कि नफरत रोकना जरूरी है लेकिन इसके लिए अभिव्यक्ति की आजादी की बलि नहीं दी जा सकती.

यह विवाद महज कानूनी दांव-पेंच नहीं है बल्कि उस डर की गूंज है जिसने नागरिक समाज और राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है. दिसंबर 2025 में पारित इस विधेयक के खिलाफ करीब 40 संगठनों ने राजभवन में अपनी आपत्तियां दर्ज कराई थीं. अब गेंद राष्ट्रपति के पाले में है जो यह तय करेंगी कि कर्नाटक का यह कानून संविधान की कसौटी पर खरा उतरता है या नहीं.

राज्यपाल की तीन बड़ी आपत्तियां: क्यों अटका विधेयक?
राज्यपाल ने अपने नोट में इस विधेयक को ‘अति-व्यापक’ और ‘अस्पष्ट’ करार देते हुए कई गंभीर संवैधानिक सवाल खड़े किए हैं:

अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरा: राज्यपाल ने चेतावनी दी कि विधेयक की धारा 2(1) में हेट स्पीच की परिभाषा इतनी धुंधली है कि इससे सामान्य भाषण भी अपराध की श्रेणी में आ सकता है.

· अनुच्छेद 19 और 21 का उल्लंघन: उन्होंने तर्क दिया कि यह कानून नागरिकों के मौलिक अधिकारों और ‘स्वतंत्र समाज’ की धारणा पर ‘चिलिंग इफेक्ट’ (ठंडा प्रभाव) डाल सकता है.

· दमनकारी शक्तियां: राज्यपाल के अनुसार इस कानून के जरिए प्रशासन को जो शक्तियां दी गई हैं वे तानाशाही की ओर इशारा करती हैं और इनका दुरुपयोग संभव है.

5 महत्वपूर्ण सवाल
सवाल 1: इस विधेयक में ‘हेट स्पीच’ की परिभाषा क्या दी गई है?
जवाब: विधेयक के अनुसार किसी भी व्यक्ति या समुदाय के खिलाफ धर्म, जाति, लिंग या विकलांगता के आधार पर शत्रुता या नफरत फैलाने वाली अभिव्यक्ति ‘हेट स्पीच’ है.

सवाल 2: राज्यपाल ने इस बिल को राष्ट्रपति के पास क्यों सुरक्षित (Reserved) रखा?
जवाब: राज्यपाल ने अनुच्छेद 200, 201 और 254 का हवाला देते हुए इसे केंद्रीय कानूनों के साथ संभावित टकराव और संवैधानिक वैधता की जांच के लिए भेजा है.

सवाल 3: चिक्कमगलुरु का विवादित वाकया क्या था?
जवाब: बिल कानून बनने से पहले ही पुलिस ने भाजपा नेता विकास पुत्तूर को इसके प्रावधानों के तहत नोटिस थमा दिया था, जिससे भारी राजनीतिक बवाल मच गया.

सवाल 4: नागरिक समाज और मीडिया निकायों को इस बिल से क्या दिक्कत है?
जवाब: उनका मानना है कि बिना सार्थक परामर्श के लाए गए इस कानून से डिजिटल प्लेटफॉर्म और स्वतंत्र पत्रकारों की आवाज दबाई जा सकती है.

सवाल 5: क्या नफरत फैलाने वाली संस्थाओं पर भी कोई कार्रवाई का प्रावधान है?
जवाब: हां, बिल में संगठनात्मक जवाबदेही तय की गई है, जिससे नफरत फैलाने वाले संगठनों के पदाधिकारियों को भी दोषी ठहराया जा सकेगा.

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