खरगोन
खरगोन में पिछली रामनवमी पर भड़के दंगे को एक साल बीत गया, लेकिन इसके जख्म अब भी बाकी हैं। खसखसवाड़ी और जमींदार मोहल्ले के बीच खड़ी नफरत की दीवार आज भी है। कई घर जले और टूटे हुए हैं। कई घर-आंगनों में सन्नाटा पसरा है। दरवाजों पर ताले लटक रहे हैं। दंगे ने हर किसी को जख्म दिए। लोग अपनों की मौत को भुला नहीं पा रहे। कुछ जीवनभर के लिए असहाय हो गए। बात नाते-रिश्तों की करें तो दंगे के बाद कई बेटियों की शादी नहीं हो सकी। कई लड़कों के रिश्ते टूट गए, तो कुछ से लड़कियों ने शादी से मना कर दिया। कहा- जहां दंगे होते हैं, वहां शादी नहीं करना।
खरगोन में क्या कुछ बदला? रिश्तों जमी बर्फ कितनी पिघली है? राख के ढेर में तब्दील गृहस्थी संवर पाई क्या? दोनों समुदायों के दिलों में आखिर क्या चल रहा है?
कभी न भूल पाने वाला दर्द मिला…
दंगों के दौरान सिर में चोट लगने से जख्मी हुआ 16 साल का शिवम अब 17 बरस का हो चुका है, लेकिन 2 महीने अस्पताल में रहकर भी पहले की तरह खुश नहीं है। उसके शरीर का एक हिस्सा अब भी लकवाग्रस्त है। पॉलिटेक्निक के पेपर तो दे रहा है, लेकिन पेपर लिखने के लिए उसे राइटर की मदद लेनी पड़ती है। संजय नगर में दंगों के दौरान आयशा बी का घर जला दिया गया था। आयशा ने बेटी मुस्कान की शादी के लिए गृहस्थी का सामान और गहने खरीदकर रखे थे। अब आयशा बेटी की शादी के लिए फिर पाई-पाई जोड़ रही है।पिछले साल दंगों के बाद दोनों समुदायों के मोहल्ले के बीच दीवार बना दी गई थी।
सबसे पहले चलते हैं तालाब चौक जहां दंगा भड़का…, टूटी दुकानें, बिखरा हुआ मलबा…
ये वही तालाब चौक है जहां 10 अप्रैल 2022 को रामनवमी के जुलूस पर पथराव के बाद शहर में दंगे भड़के थे। कई मकानों को आग लगा दी गई थी।
यहां ऊपरी तौर पर तो सबकुछ सामान्य दिखता है, लेकिन मस्जिद की टूटी दुकानों का बिखरा हुआ मलबा अब भी यहां दंगों की याद दिला देता है। दरअसल, दंगों के बाद सरकार ने अतिक्रमण मानते हुए मस्जिद की दुकानों पर बुलडोजर चला दिया था। यहां टूटी हुई दुकानों के बीच डॉ. टी शेख का क्लिनिक और मेडिकल स्टोर्स भी खुला हुआ है, लेकिन पहले वाली रौनक गायब है।
पिछले साल रामनवमी के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों में दो समुदायों के बीच हिंसा भड़की थी। इनमें से एक मध्यप्रदेश का खरगोन शहर भी था। रामनवमी के दिन जुलूस के दौरान कथित रूप से उस पर पत्थरबाजी की घटना के साथ यहां हिंसा भड़की और फिर आसपास के इलाकों में फैल गई। तालाब चौक जहां से इसकी शुरुआत हुई थी। सबसे ज्यादा प्रभावित इलाका संजय नगर रहा था। इस दंगों में दोनों समुदायों के लगभग 30 या उससे ज्यादा घरों को उपद्रवियों ने आग के हवाले कर दिया था। सबसे ज्यादा प्रभावित निम्न मध्यमवर्गीय परिवार के कामकाजी लोग हुए थे। माहौल इतना खराब हो चुका था कि प्रशासन को लगभग एक महीने तक पूरे शहर में कर्फ्यू लगाना पड़ा था।
खरगोन में दंगे की आग भड़की तो पुलिस को आंसू गैस छोड़नी पड़ी थी। इससे लोग तितर-बितर हो गए थे। – फाइल इमेज
ज्यादा दंगा प्रभावित क्षेत्र संजय नगर…दीवार पर अब सिर्फ फोन नंबर
दंगे में सबसे ज्यादा प्रभावित इलाका संजय नगर रहा था। यहां दोनों समुदाय के लोगों को खासा नुकसान हुआ था। उनकी रोजी-रोटी के साधन तक जलकर राख हो गए थे। मगर मुआवजे की रकम ने लोगों को काफी राहत भी दी है। संजय नगर में रहने वाली सलमा और उनकी सास अकिला ने कुछ साल पहले ही अपना नया घर बनाया था। उसके दोनों बेटों ने फेरी का काम करके एक-एक पैसा जोड़ा था, लेकिन उपद्रवियों ने उनकी सालों की कमाई को देखते ही देखते फूंक दिया। सलमा बताती हैं कि उन्हें मुख्यमंत्री राहत कोष से डेढ़ लाख रुपए का मुआवजा मिला था और 50 हजार अपनी तरफ से लगाकर वापस से उन्होंने अपना घर बनवाया।
दंगों में लोगों की घरों के साथ-साथ उपद्रवियों ने दुकानों को भी आग लगा दी थी।
प्रभावित इलाके में एक घर ऐसा भी था, जिसकी स्थिति पहले जैसी ही थी। घर की मालकिन आयशा बी अब उस घर में नहीं रहती, लेकिन उन्होंने फोन नंबर दीवार पर लिख रखा है, ताकि अगर कोई उन्हें ढूंढते हुए आए तो उनसे संपर्क कर सके। हमने उन्हें कॉल करके बुलाया तो उन्होंने अपनी आपबीती बताई।
आयशा बताती हैं कि उनकी माली हालत इतनी खराब है कि वो घर को वापस ठीक कराने का फिलहाल सोच भी नहीं सकतीं। दरअसल, आयशा ने पिछले साल ही अपनी बेटी मुस्कान की शादी तय कर रखी थी। शादी की सारी खरीदारी हो चुकी थी और पूरा घर शादी के सामान से भरा पड़ा था। इसके अलावा घर पर नकदी और जेवर भी थे। हिंसा की इस आग में उनकी सारी मेहनत की कमाई और बेटी की शादी का सारा सामान जलकर राख हो गया।
उन्होंने बताया कि अगर ये सब ना हुआ होता तो उनकी बेटी की शादी अब तक हो चुकी होती, लेकिन अब आगे कैसे क्या होगा वे ये सोच-सोचकर परेशान हैं। दस लाख से ऊपर के नुकसान की तुलना में डेढ़ लाख का मुआवजा उनके लिए नाकाफी है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से भी मैंने मदद की गुहार लगाई हैं। मामा से मैं बस इतना चाहती हूं कि जैसे उन्होंने लक्ष्मी (आइशा की पड़ोस में एक लड़की) की शादी कराई, वैसे ही मेरी बेटी मुस्कान की भी शादी करा दें। मुझे उससे ज्यादा नहीं चाहिए, कम ही चाहिए। बस गहने का जो नुकसान हुआ वो दे दें।
घर तो खड़ा कर लिया, लेकिन डर बरकरार है
भले ही उस हिंसा को सालभर बीत गया हो, लेकिन लोगों के जहन में वो दृश्य अभी भी जिंदा हैं। दोनों समुदाय के लोगों में थोड़ा-बहुत यह डर आज भी बना हुआ है। संजय नगर के धर्मेंद्र कुमावत का घर आग लगने और रसोई गैस सिलेंडर फटने से बहुत बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था। मुआवजे के रूप में मिली रकम और सामुदायिक सहयोग से उन्होंने वापस अपने घर को खड़ा कर लिया है, मगर घर के कई हिस्से अभी भी जर्जर हालत में ही हैं। उन्होंने बताया कि उस घटना के बाद इस जगह पर असुरक्षा को देखते हुए रहने का बिल्कुल भी मन नहीं था, मगर प्रशासन के आश्वस्त करने के बाद उन्होंने यहीं पर रहने का फैसला किया है।
रामनवमी से एक दिन पहले यहां दोनों समुदाय के कई परिवार अपने घर पर ताला लगाकर कहीं और चले गए थे। पिछले साल की घटना को देखते हुए उन्होंने अपनी मां और बहन को अपने किसी रिश्तेदार के यहां भेज दिया था।
उपद्रवियों ने घरों में आग लगाकर लोगों का सबकुछ बर्बाद कर दिया था। दंगों के दौरान इस तरह घर सुलगते रहे।
धर्मेंद्र की मां मंजुला बाई बताती हैं कि चाहे हिंदू हो या मुसलमान दोनों के अंदर यह डर बना रहता है। मोहल्ले में भी कोई भी चैन से नहीं रह पाता हैं। मेरे बेटे की शादी भी टूट गई। लड़की वालों ने ये आरोप लगाकर शादी तोड़ दी कि हम ऐसी जगह बेटी की शादी नहीं कर सकते जहां हमेशा दंगा ही होता हो।
सलमा बी बताती हैं कि वो भी अपने बच्चे को लेकर कहीं और चली गई थीं, क्योंकि वो डर उनके अंदर से गया नहीं था। वो कहती हैं, ‘दिनभर अल्लाह का नाम लेकर काट लेती हूं, लेकिन रात में बहुत डर लगा रहता है। हमारा दूसरा कोई घर नहीं है, इसलिए यहां मजबूरी में रहते हैं।’
कई घरों में अब भी ताला, दूसरे मोहल्ले में किराए के मकान में रहते हैं
हिंसा का प्रभाव लोगों के दिमाग पर कुछ ऐसा पड़ा कि वे पलायन करने को मजबूर हो गए। संजय नगर के इलाके में ऐसे कई घर दोनों समुदायों के थे, जहां ताला जड़ा हुआ था और लोग कहीं और किराए पर रहते हैं। हालांकि, बीच-बीच में वे कई बार आते रहते हैं। ऐसे ही हमारी मुलाकात हुई दुर्गेश पंवार के परिवार से। पिछले साल की हिंसा में इनके घर का एक कोना नहीं बचा था जहां आग की लपटें ना पहुंची हों। दुर्गेश की मां बताती हैं कि हम यहां 35-40 साल से रहते आ रहे थे, लेकिन अब मजबूर होकर हम कहीं और किराए के मकान में रहने लगे हैं। डर इतना बना रहता है कि हम अपने जान की चिंता करके भागे हैं। हम तो चाहते हैं कि सब अच्छा हो, लेकिन सब ऊपर वाला मालिक है।
अब भी मौजूद है ‘सुरक्षा’ की दीवार, लोग बोले- नहीं टूटना चाहिए
प्रशासन ने उपद्रवियों को रोकने के लिए एक दीवार बनाई थी। इसके साथ ही गई गलियों को बैरिकेड कर ब्लॉक किया था। घटना के सालभर बाद वो दीवार और बैरिकेडिंग लगी ही हुई है। दीवार हटाने को लेकर हाईकोर्ट ने प्रशासन को ही यह तय करने की जिम्मेदारी दी है कि इसे हटाया जाना चाहिए या नहीं? आम रास्ते के ब्लॉक हो जाने से लोगों को परेशानी तो है मगर इस पर उनकी मिलीजुली प्रतिक्रिया रहती है।
खसखसवाड़ी के सलीम खान बताते हैं कि प्रशासन ने अगर यह दीवार बनाई है तो कुछ सोच-समझकर ही बनाई होगी। वे कहते हैं कि यह बरसों से आम रास्ता था, तो थोड़ा घूमकर तो जाना पड़ता है, लेकिन अगर दीवार टूट जाए तो भी ठीक और बनी रहे तो भी ठीक। हम लोग बस ये चाहते हैं कि मोहल्ले में शांति बनी रहे।
दीवार के उस तरफ जमीदार मोहल्ला के रोहित सिंह चौहान बताते हैं कि प्रशासन ने बिल्कुल सही कदम उठाया था और हम नहीं चाहते कि यह दीवार टूटे। इस दीवार के होने से हम लोगों के अंदर एक सुरक्षा का भाव है। यह उपद्रवियों के मूवमेंट को काफी हद तक रोकने में कारगर साबित हुई है।
शिवम को लकवा, हालात अभी ठीक नहीं
उस हिंसा के दौरान जमींदार मोहल्ले के 16 वर्षीय शिवम को सिर में गोली लगने की खबर सामने आई थी। लंबे समय तक इंदौर में उसका इलाज चला, लेकिन अब उसकी स्थिति थोड़ी सी बेहतर है मगर सामान्य नहीं है। शिवम के शरीर का बायां हिस्सा पैरालाइज्ड हो चुका है और अभी भी अपने कामकाज को लेकर वो सेल्फ डिपेंडेंट नहीं है।
शिवम ने बताया कि इन चीजों से उन्हें मानसिक तनाव होता हैं। मुझे खेलने-कूदने और बाइक चलाने की आदत थी, लेकिन अब वो सब सोचकर ही रोना आ जाता है, क्योंकि मैं अब वो नहीं कर सकता।
शिवम के भाई नीलेश जोशी इलाज के दौरान शुरुआत से ही शिवम के साथ रहे हैं। उन्होंने बताया कि डॉक्टर्स भी शिवम के पूरी तरह ठीक हो जाने का दावा तो नहीं कर रहे हैं, लेकिन चूंकि उसकी उम्र अभी काफी कम है, तो हमें एक उम्मीद है। अभी तो मुश्किल इतना ज्यादा है कि परीक्षा में इसकी कॉपी भी राइटर्स की मदद से लिखवाई जा रही है।
इदरिश का परिवार पुलिस की जांच से अब भी संतुष्ट नहीं
दंगे के लगभग एक सप्ताह बाद पुलिस को इदरिश खान नाम के एक व्यक्ति की लाश मिली थी। 26 वर्षीय इदरिश के दो बच्चे और उनकी पत्नी को चार लाख रुपए का मुआवजा मिला था, लेकिन परिवार पुलिस की कार्रवाई से बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं है। इदरिश के भाई इखलाख बताते हैं कि उन्होंने 11 लोगों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट दर्ज कराई थी, लेकिन पुलिस अबतक सारे लोगों को गिरफ्तार नहीं कर पाई है। यह पूछने पर कि वे लोग अभी भी आपको नजर आते हैं? इस पर उन्होंने कहा कि हां कई बार। वे लोग शहर में खुलेआम घूमते हैं और यह बात उन्होंने पुलिस को बताई, लेकिन फिर भी कोई सुनवाई नहीं हुई।
प्रशासन की मुस्तैदी से ही शहर में हो पाए बड़े कार्यक्रम
हिंसा के बाद पुलिस और प्रशासन ने लोगों में कॉन्फिडेंस बिल्ड करने के लिए क्या-क्या प्रयास किए और साथ ही तमाम सवालों के साथ जब हम एसपी धर्मवीर सिंह से बात करने पहुंचे तो दो मुलाकातों के बावजूद उन्होंने ऑन रिकॉर्ड कुछ भी कहने से मना कर दिया। बातचीत में उन्होंने बताया कि अगर शहर में कोई छिटपुट घटना होती है तो व्यक्तिगत स्तर पर उसे संज्ञान में लेते हैं और इसी कॉन्फिडेंस बिल्डिंग एक्सरसाइज का ही नतीजा है कि इस साल रामनवमी, मुहर्रम और गरबा इस तरीके से मनाया गया जैसा कि पहले कभी नहीं मनाया गया।
वे इस बात को सीधे तौर पर खारिज करते हैं कि लोगों के अंदर थोड़ा भी डर है। उनका कहना था कि जो लोग लौटकर नहीं आए ये वो लोग हैं जिन पर मुकदमे दर्ज हैं। प्रशासन ने लगभग एक दर्जन लोगों को जिला बदर भी किया है। एसपी ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि इसमें दोनों समुदाय के लोग शामिल हैं, हालांकि, उन्होंने इसकी सूची देने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि पुलिस तथ्यों के आधार पर अपनी कार्रवाई कर रही है और बाकी चीजें कोर्ट खुद तय कर रही है।

