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दिल्ली में हुई मजदूर-किसान संसद

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केंद्र सरकार से कॉरपोरेट-परस्त और अमेरिका-परस्त नीतियाँ छोड़ने अन्यथा देशव्यापी संघर्ष का सामना करने के लिए तैयार होने की चेतावनी दी

23 मार्च 2026 को मुक्त व्यापार समझौते के खिलाफ “साम्राज्यवाद विरोधी दिवस”, 1 अप्रैल 2026 को 4 श्रम संहिताओं के खिलाफ “राष्ट्रव्यापी काला दिवस”, सभी राज्यों में महापंचायतें आयोजित कर कॉरपोरेट विरोधी जनसंघर्ष की घोषणा करने का आह्वान

जीएसटी अधिनियम 2017 में संशोधन कर राज्यों की कराधान शक्तियाँ बहाल की जाएँ – विभाज्य पूल (सेस और सरचार्ज सहित) में वर्तमान 33% के बजाय राज्यों को 60% हिस्सा दिया जाए

9 मार्च 2026 को जंतर-मंतर पर आयोजित मजदूर-किसान संसद ने केंद्र सरकार को चेतावनी दी कि वह कॉरपोरेट-परस्त और अमेरिका-परस्त नीतियों व कानूनों को थोपने की आक्रामक और तानाशाही प्रवृत्ति को तुरंत छोड़े, अन्यथा किसानों और मजदूरों की सभी प्रमुख मांगें पूरी होने तथा जनविरोधी और राष्ट्रविरोधी नीतियों को वापस लेने तक देशभर में निरंतर संयुक्त संघर्ष चलाए जाएंगे। मजदूर-किसान संसद ने किसानों और मजदूरों से बड़े पैमाने पर संघर्ष के लिए तैयार होने का आह्वान किया और समाज के सभी मेहनतकश व लोकतांत्रिक वर्गों से इन आंदोलनों के समर्थन की अपील की।

आगामी व्यापक और निरंतर संघर्षों की तैयारी के तहत किसानों और मजदूरों ने निर्णय लिया है कि 23 मार्च 2026 — जो शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत दिवस है — को मुक्त व्यापार समझौते के खिलाफ “साम्राज्यवाद विरोधी दिवस” के रूप में मनाया जाएगा। 1 अप्रैल 2026 को चार श्रम संहिताओं के लागू किए जाने के खिलाफ “राष्ट्रव्यापी काला दिवस” मनाया जाएगा। साथ ही सभी राज्यों में महापंचायतें आयोजित कर कॉरपोरेट विरोधी जनसंघर्ष की घोषणा की जाएगी।

राष्ट्रीय राजधानी में संसद सत्र के समानांतर आयोजित इस मजदूर-किसान संसद का आयोजन केंद्रीय ट्रेड यूनियनों/स्वतंत्र क्षेत्रीय महासंघों/संघों के संयुक्त मंच तथा संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा किया गया। इस अवसर पर 12 फरवरी 2026 को हुए देशव्यापी आम हड़ताल की शानदार सफलता के लिए मेहनतकश जनता को बधाई दी गई, जिसे मोदी सरकार की मजदूर-विरोधी और किसान-विरोधी नीतियों के खिलाफ एक सशक्त चेतावनी बताया गया।

सभी वक्ताओं ने अमेरिका के दबाव में भारत सरकार द्वारा असमान और शोषणकारी भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौता के ढांचे को स्वीकार करने और कॉरपोरेट हितों के साथ मिलकर मजदूर-विरोधी व किसान-विरोधी कदम लागू करने की कड़ी निंदा की।

घोषणापत्र में कहा गया कि अमेरिका विश्व की मेहनतकश जनता का सबसे बड़ा दुश्मन है और विश्व शांति के अंतरराष्ट्रीय संस्थागत तंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। मजदूर-किसान संसद ने केंद्र सरकार से अपील की कि वह व्यापार के मुद्दों पर अमेरिकी दबाव के सामने झुकना बंद करे, ईरान के खिलाफ युद्ध की तुरंत समाप्ति की मांग करे और विश्व शांति सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए। साथ ही सरकार से खाड़ी देशों में कार्यरत भारतीय कामगारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा खाड़ी देशों को होने वाले कृषि निर्यात पर विशेष मुआवजा देने की मांग की गई, ताकि किसानों को लाभकारी मूल्य मिल सके।

संसद ने केंद्र सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि उसने 9 दिसंबर 2021 को संयुक्त किसान मोर्चा को दिए गए लिखित आश्वासनों को लागू नहीं किया, जो ऐतिहासिक किसान आंदोलन के संदर्भ में दिए गए थे, जिसमें 736 शहीदों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया। घोषणापत्र में संसद से कानून बनाकर सभी फसलों की खरीद सी2+50% की दर से न्यूनतम समर्थन मूल्य के आधार पर सुनिश्चित करने, उत्पादक सहकारिताओं के माध्यम से कृषि के आधुनिकीकरण, सार्वजनिक और सहकारी क्षेत्र में कृषि-आधारित उद्योगों की स्थापना, कृषि पर कॉरपोरेट कब्जे को समाप्त करने और मूल्य संवर्धन से प्राप्त अधिशेष को प्राथमिक उत्पादकों के साथ साझा करने की मांग की गई।

यदि सरकार प्रतिगामी चार श्रम संहिताओं को लागू करने का निर्णय आगे बढ़ाती है, जो मजदूरों के संगठन की स्वतंत्रता, सामूहिक सौदेबाजी, हड़ताल के अधिकार और 8 घंटे के कार्यदिवस जैसे अधिकारों को छीनती है, तो देश की मेहनतकश जनता एक निरंतर संयुक्त संघर्ष पर उतरेगी।

मजदूर-किसान संसद ने भारत सरकार से भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौता को अस्वीकार करने, बिजली (संशोधन) विधेयक और बीज विधेयक 2025 को वापस लेने, VB GRAM G अधिनियम को रद्द करने तथा मनरेगा को पुनर्स्थापित कर उसे मजबूत बनाने की मांग की। साथ ही मनरेगा में 200 दिनों का रोजगार और ₹700 दैनिक मजदूरी सुनिश्चित करने की मांग की गई।

मजदूर-किसान संसद ने केंद्र सरकार द्वारा राज्यों को वित्तीय संसाधनों से वंचित करने और सत्ता के केंद्रीकरण की निंदा की। साथ ही जीएसटी अधिनियम 2017 में संशोधन कर राज्यों की कराधान शक्तियाँ बहाल करने तथा विभाज्य पूल (सेस और सरचार्ज सहित) में राज्यों को वर्तमान 33% के बजाय 60% हिस्सा देने की मांग की।

इस मजदूर-किसान संसद की अध्यक्षता एक पैनल ने की जिसमें शहनाज़ रफीक (INTUC), मुकेश कश्यप (AITUC), नारायण सिंह (HMS), ए. आर. सिंधु (CITU), आर.के. शर्मा (AIUTUC), लता (SEWA), राघव सिंह (AICCTU), गजराज सिंह (UTUC) केंद्रीय ट्रेड यूनियनों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे तथा पी. कृष्णप्रसाद (AIKS), राजन क्षीरसागर (AIKS-AB), युधवीर सिंह (BKU), हंसराज राणा (AIKKMS), धरमपाल सिंह (AIKKMS), सतीश आज़ाद (KKU), प्रेम सिंह गहलावत (AIKM), जोगिंदर सिंह नैन (NKU-Nain) और सुनील तराई (किसान समिति) संयुक्त किसान मोर्चा का प्रतिनिधित्व कर रहे थे।

वक्ताओं में संयुक्त किसान मोर्चा से अशोक धावले (AIKS), रेवुला वेंकैया (AIKS-AB), युधवीर सिंह (BKU टिकैत), सत्यवान (AIKKMS), आशीष मित्तल (AIKKMS), शशिकांत (KKU), डॉ. सुनीलम (KSS), पुरुषोत्तम शर्मा (AIKM), जोगिंदर नैन (BKU-Nain), मनीष भारती (JKA) और कर्नैल सिंह इकोलाहा (AISKS) शामिल थे। केंद्रीय ट्रेड यूनियनों से अशोक सिंह (INTUC), अमरजीत कौर (AITUC), एच.सी. त्यागी (HMS), सुदीप दत्ता (CITU), राजेंद्र सिंह (AIUTUC), लता (SEWA), राजीव डिमरी (AICCTU) और शत्रुजीत (UTUC) ने भी संसद को संबोधित किया।

केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच और संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा जारी संयुक्त विज्ञप्ति

जारीकर्ता — मीडिया सेल | संयुक्त किसान मोर्चा
संपर्क: 9447125209 | 9830052766
samyuktkisanmorcha@gmail.com

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