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भारत में एआई न्यूज़ एंकर में बड़ी संख्या महिलाओं की

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एआई न्यूज एंकरों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “यह सिर्फ एक कृत्रिम गुड़िया है, जो पहले से लिखी गई सामग्री पढ़ रही है.”

ऐसे कई न्यूज़रूम जहां एआई एंकर न्यूज़ बुलेटिन और अन्य वीडियो के लिए सामग्री इकट्ठा और तैयार करते हैं, वहां भी संपादकों की एक टीम ही उसकी समीक्षा करती है.

ओडिया चैनल की एक वरिष्ठ व्यावसायिक सहयोगी लिटिशा मंगत पांडा ने बताया कि ओडिशा टीवी की लीसा, एआई फ्रेमवर्क का इस्तेमाल करके बुलेटिन के लिए स्क्रिप्ट का ड्राफ्ट तैयार करती है, रियल-टाइम अपडेट पर आधारित होने की वजह से इससे प्रोडक्शन “तेज़ और ज़्यादा दक्षता” से चलता है. हालांकि, ये सुनिश्चित करने के लिए कि कोई भ्रामक या गलत जानकारी न प्रसारित हो, सारी जानकारी का “सत्यापन और तथ्यों की जांच” की जाती है, खासकर संवेदनशील मुद्दों को लेकर इस चीज़ का विशेष ध्यान रखा जाता है. पांडा ने कहा, “संपादक हर एआई-जनरेटेड अपडेट को प्रसारित करने से पहले दो बार जांचते हैं.”

अगर एआई न्यूज़ एंकरों द्वारा तैयार की गई सामग्री की सटीकता से जुड़ी चिंताओं को एक तरफ रख भी दिया जाए, तो भी ये एंकर अभी उत्कृष्टता से मीलों दूर हैं.

बिग टीवी के कोंडा ने माना कि एआई एंकर द्वारा होस्ट किए जाने वाले बुलेटिन “बहुत नीरस” होते हैं और उनमें एक मानव प्रस्तुतकर्ता (एंकर) द्वारा स्क्रीन पर लाई जाने वाली “भावनात्मक बारीकियों” का अभाव होता है.

एआई एंकरों द्वारा समाचार पेश किए जाने के मुद्दे न्यूज़रूम की सीमाओं से कहीं आगे तक जाते हैं.

‘एआई न्यूज़ एंकर में लैंगिक पूर्वाग्रह दिखता है’

भारत में बड़ी संख्या में एआई न्यूज़ एंकर महिलाएं हैं.

मसलन, इंडिया टुडे समूह द्वारा पेश किए गए छह एआई न्यूज़ एंकरों में से पांच महिला हैं. इन पांच में से, नैना, जो भोजपुरी में समाचार प्रस्तुत करती हैं, को इंडिया टुडे द्वारा न्यूज़ बुलेटिन में “भोजपुरी भाभी” कहकर भी बुलाया जाता है.

ज्यादातर चैनलों का यही हाल है: न्यूज़18 की एआई एंकर कौर, ओडिशा टीवी की लीसा, पावर टीवी की सौंदर्या और बिग टीवी की माया, सभी समाचार एंकर महिला के तौर पर हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि एआई एंकर उन्हीं लैंगिक पूर्वाग्रहों को दिखाते हैं, जो भारत के मीडिया में पसरे पड़े हैं और उन्हीं को बल देते हैं. 

न्यूज़लॉन्ड्री से बात करते हुए वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया विश्लेषक अम्मू जोसेफ ने कहा, “पारंपरिक टीवी न्यूज़ में भी महिलाओं को रिपोर्टर के बजाय एंकर के रूप में पर्दे पर आना आसान लगता है. एआई बस इन पूर्वाग्रहों की नकल कर रहा है.”

बिग टीवी के कोंडा ने जोसेफ द्वारा बताए गए पूर्वाग्रहों को स्वीकार करने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई. उन्होंने कहा, “आम तौर पर, एंकर महिलाएं होती हैं. हमारी कंपनी में भी 14 एंकर हैं- 12 महिलाएं और केवल दो पुरुष.” 

उन्होंने ये दावा भी किया कि “लोगों को महिला एंकरों को समाचार पढ़ते देखना पसंद है” और उन्हें “ज्यादा आकर्षक” माना जाता है.

लितिशा मंगत पांडा ने माना कि ओडिशा टीवी की लीसा को जानबूझकर एक युवा भारतीय महिला के रूप में डिजाइन किया गया था, ताकि वो “अपनी सी ही” लग सके. “एक महिला व्यक्तित्व को सुलभ, आकर्षक और भरोसेमंद माना जाता था.”

हालांकि, विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि इस तरह के फैसले, भारतीय दर्शकों के बारे में कथित विचारों के बजाए लिंग आधारित रूढ़ियों से ज्यादा प्रभावित होते हैं.

यूट्रेक्ट यूनिवर्सिटी में समावेशी एआई संस्कृतियों की प्रोफेसर पायल अरोड़ा ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया, “यह एक सामाजिक धारणा को दिखाता है, जहां महिला आवाज़ों को ज्यादा अधीन और मिलनसार के तौर पर देखा जाता है.”

अरोड़ा फेमलैब की सह-संस्थापक भी हैं. फेमलैब, नारीवादी नजरिए से तकनीक के विकास पर रिसर्च करने वाला एक प्रोजेक्ट है. अरोड़ा बताती हैं कि एआई सहायक और एआई समाचार एंकर मुख्य रूप से महिला इसलिए हैं, क्योंकि “एआई तकनीक ऐतिहासिक रूप से पुरुष उपयोगकर्ताओं को ध्यान में रखकर डिज़ाइन की गई है.”

कई विशेषज्ञ सुंदरता के पारंपरिक मानदंडों को भी मुद्दा बताते हैं, क्योंकि महिला एआई समाचार एंकर इन्हीं मूल्यों को ध्यान में रखकर डिज़ाइन की जाती हैं.

अम्मू जोसेफ ने कहा, “एआई एंकर, पत्रकारिता कौशल के बजाय सुंदरता के पूर्वानुमानित आदर्शों पर आधारित प्रतीत होते हैं.”

जोसेफ के साथ सहमति जताते हुए वरिष्ठ पत्रकार और शोधकर्ता पामेला फिलिपोस ने कहा, “भले ही आपके पास बुद्धिमान एंकर हों जो पारंपरिक सौंदर्य मानकों पर खरे नहीं उतरते, उनके खिलाफ पहले से ही पूर्वाग्रह है. एआई न्यूज एंकर, एक महिला प्रस्तुतकर्ता को कैसा दिखना चाहिए इसकी एक संकीर्ण छवि को मजबूत करते हैं; युवा, पतली, गोरी-चमड़ी और पारंपरिक रूप से आकर्षक.”

तकनीक को किस प्रकार समाज को आगे ले जाना चाहिए न कि पीछे, इस पर बात करते हुए वे कहती हैं, “अगर पत्रकारिता में एआई का प्रयोग, केवल अच्छा दिखने और लैंगिक मान्यताओं को प्राथमिकता देने में होता रहेगा तो यह न केवल पूर्वाग्रहों को चुनौती देने में विफल रहेगा बल्कि उन्हें और ज़्यादा मजबूत ही करेगा.”

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