नई दिल्ली. अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा भले ही हो गया हो लेकिन देश के भीतर ही अतिवादी संगठन के खिलाफ आवाजें मजबूत होने लगी हैं. हमेशा से तालिबान के कब्जे से बाहर रहे पंजशीर प्रांत में मजबूत विरोध की तैयारी शुरू हो गई है. अफगानिस्तान में ताजिक मूल के लोगों में हीरो के तौर पर पहचान रखने वाले अहमद शाह मसूद के बेटे अमहद मसूद इस विद्रोह के अगुवा हैं. मसूद के साथ खुद को अफगानिस्तान का केयरटेकर राष्ट्रपति घोषित करने वाले अमरुल्लाह सालेह भी इसके नेता हैं. लेकिन अब इन दोनों के साथ एक ऐसे वारलॉर्ड का नाम भी शामिल हो गया है जिसे तालिबान के खिलाफ पटखनी देने के लिए पहचाना जाता है. अफगानिस्तान के पूर्व उपराष्ट्रपति और देश के ताकतवर वारलॉर्ड अब्दुल रशीद दोस्तम के भी विरोधी गुट में शामिल होने की खबरें हैं.
द ट्रिब्यून पर प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक विरोधी गुट के नेताओं ने यह दावा किया है कि उन्हें अब्दुल रशीद दोस्तम का साथ मिल चुका है. गुट का कहना है कि दोस्तम की उज्बेक सेना भी अब उनकी तरफ से लड़ेगी. कहा जा रहा है कि दोस्तम के साथ विरोधी गुट के नेताओं की जल्द बैठक होगी और फिर साथ मिलकर आगे की लड़ाई लड़ी जाएगी.
विरोधी गुट को मिलेगी मजबूती
उज्बेक मूल के दोस्तम के साथ आने पर विरोधी गुट काफी ज्यादा मजबूत होगा. साल 2001 में जब अमेरिकी सेना ने तालिबान पर हमला बोला था तब दोस्तम ने नॉर्दन एलायंस का हिस्सा बनकर लड़ाई लड़ी थी. दोस्तम पर तालिबान के खिलाफ क्रूरता के भी आरोप लगे थे. उन पर तालिबानियों की क्रूर हत्याओं के आरोप लगे थे. हालांकि दोस्तम ने लगातार इससे इंकार किया. बाद में वो देश के उपराष्ट्रपति भी रहे. साथ ही विरोधी गुट की तरफ से यह दावा भी किया गया है कि उसने चारीकार इलाके पर कब्जा कर लिया है जो रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है.
दुनिया के सामने नरम छवि पेश करने की कोशिश कर रहा तालिबान
बता दें कि तालिबान इस बार दुनिया को नरम छवि दिखाने की कोशिश कर रहा है. लेकिन देश में लगातार ऐसी घटनाएं हो रही हैं जिनसे साबित हो रहा है कि नरम छवि सिर्फ एक मुखौटा भर है. अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने भी कहा है कि तालिबान सिर्फ दुनिया के देशों से मान्यता पाने के लिए ऐसा कर रहा है. सच ये है कि वो अपने कट्टरपंथी विश्वास के प्रति पहले से ज्यादा समर्पित हुआ है.
