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घाटी के विस्थापितों के पुनर्वास में अडंगे ना डालें मध्य प्रदेश सरकार ,न्यायालय के आदेश का पालन किया जाए

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नर्मदा घाटी के विस्थापित के पुनर्वास और अन्य मांगे पूरी किए जाने के लिए विभिन्न संगठनों ने दिया ज्ञापन*

 इंदौर ।आज इंदौर के संभाग आयुक्त के माध्यम से विभिन्न राजनीतिक दलों, किसान संगठनों और ट्रेड यूनियन के नेताओं ने प्रदेश के मुख्यमंत्री को ज्ञापन देकर मांग की कि पिछले 37 साल से नर्मदा घाटी के विस्थापितों को न्याय दिलाने में अडंगे ना डाले जाएं । किसान संघर्ष समिति, सोशलिस्ट पार्टी इंडिया, जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय, भूमि अधिकार आंदोलन, ए आई के एस सी , संयुक्त किसान मोर्चा, एआईटीसीटीयू ,भारतीय किसान मजदूर सेना, समाजवादी समागम सहित विभिन्न संगठनों के नेताओं ने आज इंदौर के संभाग आयुक्त के माध्यम से मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजकर मांग की है कि नर्मदा घाटी के विस्थापितों के पक्ष में नर्मदा ट्रिब्यूनल का फैसला आने पुनर्वास नीति और न्यायालयों के आदेशों का पालन नहीं हो रहा है। बिना पुर्नवास के  किसान और मजदूरों को धकेला जा रहा है । आखिर कौन सी मजबूरी है मध्य प्रदेश सरकार की के विस्थापितों को न्याय में लगातार अडंगे डाले जा रहे हैं । शिकायत निवारण प्राधिकरण में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद 5 पूर्व न्यायाधीशों की नियुक्ति नहीं होना भी सरकार की लापरवाही को उजागर करता है । यह ना केवल अदालतों का अपमान बल्कि जीने के अधिकार का भी उल्लंघन है और विस्थापितों के साथ अन्याय है।

इसी के साथ ज्ञापन में मांग की गई है कि इंदौर के 186 किसानों के करीब पौने तीन करोड़ रुपए 5 व्यापारिक फर्मे लेकर फरार हो गई है उनसे तत्काल वसूली कर किसानों का भुगतान कराया जाए ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने वालों में प्रमुख है रामस्वरूप मंत्री, बबलू जाधव, सोशलिस्ट पार्टी इंडिया की इंदौर इकाई के अध्यक्ष एमके चौधरी, एआईटीयूसी के प्रमोद नामदेव, भारतीय किसान मजदूर सेना के लाखन सिंह डाबी, एसपीआई के कैलाश यादव ,किसान संघर्ष समिति के दिनेश सिंह कुशवाहा,आदि शरीक थे ।

मुख्यमंत्री के नाम दिए ज्ञापन में कहागया हैं की आपके करीबन 17 सालों के मध्य प्रदेश  में चले शासन काल में नर्मदा घाटी के सरदार सरोवर से विस्थापितों का अहिंसक संघर्ष हमने देखा और जाना है। आपने 2017 में,  बांध को पूरी ऊंचाई तक पहुंचाने का निर्णय लिया था और सर्वोच्च अदालत का आदेश होने के बाद कई मुद्दों पर आदेश भी पारित किए थे।      आज तक 37 साल बाद भी नर्मदा ट्रिब्यूनल फैसला, पुनर्वास नीति और न्यायालयों के आदेशों का पालन पूर्ण होने से  कानून का उल्लंघन हो रहा है। बिना पुनर्वास डूब में धकेले गये किसान मजदूर आज भी संघर्ष करने के लिए मजबूर है, ऐसा क्यों ?

       लगता है विस्थापितों का दर्द  शासन को महसूस नहीं हो रहा है ? आपने पुनर्वास अधिकारियों को पद से हटाया क्यों है ? शिकायत निवारण प्राधिकरण में 5 भूतपूर्व न्यायाधीशों की नियुक्ति, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय का आदेश है, क्यों नहीं हो रही है ? यह कानूनी उल्लंघन केवल अपराध ही नहीं, अन्याय भी है।     आप मध्यप्रदेश के परिवारों के  पुनर्वास के कार्य को क्यों नहीं उजागर करते हैं ? गुजरात से पूरा खर्च लेकर कार्य समयबद्धता के साथ पूरा क्यों नहीं करना चाहते? 

    जबकि बांध की लागत 60,000 करोड़ रुपए तक पहुंचकर भी 6700 करोड़ रुपए का घाटा कैसे हुआ? जो सीएजी रिपोर्ट में बताया जा रहा है।         नर्मदा का जल प्रवाह भी प्रभावित होकर आज नर्मदा प्रदूषित है, सिंचाई और मत्स्य व्यवसाय पर भी असर आ चुका है, तो भी आप और नए बांध और लिफ्ट परियोजनाएं क्यों आगे बढ़ा रहे हैं?

इसी के साथ हम चाहते हैं कि इंदौर के 186 किसानों के गेहूं खरीदी के 2:45 करोड़ रुपए लेकर 2019 से 5 व्यापारिक फर्म के कर्ताधर्ता फरार हैं मंडी समिति ने उनकी संपत्ति भी जब्त की है लेकिन अभी तक किसानों का भुगतान नहीं हुआ है यह भी सरकार की किसान विरोधी कार्यवाही को उजागर करता है यदि आप किसान हितेषी हैं तो इन किसानों के बकाया भुगतान की भी तत्काल निर्देश दें

     इन तमाम मुद्दों पर संघर्षरत विस्थापितों को और हम नर्मदा के घाटी में दशकों से चले सत्यवादी संघर्ष और निर्माण कार्य को जानने वाले सामाजिक कार्यकर्ता और जन संगठनों को भी आपको जवाब देने होंगे। हम नर्मदा घाटी के पीढ़ियों पुराने, प्रकृति के साथ जीते रहे भाई बहनों के साथ हैं और रहेंगे। हम कानून और न्याय की अवमानना को नहीं मानेंगे ।

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