महाराष्ट्र में करीब सालभर पहले हुए सियासी उठापटक पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुना दिया। फैसले की सबसे बड़ी बात ये है कि एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री बने रहेंगे। लेकिन उनकी ये जीत उद्धव ठाकरे के इस्तीफे की वजह से हुई।
कोर्ट ने कहा कि ‘उद्धव ठाकरे ने फ्लोर टेस्ट का सामना ही नहीं किया। खुद ही इस्तीफा दे दिया। ऐसे में अदालत इस्तीफा रद्द नहीं कर सकती है। हम पुरानी सरकार बहाल नहीं कर सकते हैं।’ सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि महाराष्ट्र गवर्नर का उद्धव सरकार से फ्लोर टेस्ट के लिए कहना गलत फैसला था। गवर्नर के पास बहुमत पर शक करने का ठोस आधार नहीं था।
फैसले के बाद पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने कहा- ‘मैं गद्दार लोगों के साथ सरकार कैसे चलाता। शिंदे सरकार में नैतिकता नहीं है, नहीं तो वो आज इस्तीफा दे देती।’ इस पर डिप्टी सीएम देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि उद्धव ने नैतिकता नहीं बल्कि हार की डर के चलते इस्तीफा दिया। मुख्यमंत्री बनने के लिए कांग्रेस और एनसीपी के साथ गए।
मामला क्या था
जून- 2022 में एकनाथ शिंदे गुट की बगावत के बाद महाराष्ट्र विकास अघाड़ी गठबंधन सरकार गिर गई थी। 30 जून को शिंदे ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। इस मामले में दोनों गुटों की तरफ से 6 याचिकाएं दायर की गई थीं।
- एकनाथ शिंदे के खिलाफ दलबदल कानून के तहत कार्यवाही शुरू करने से डिप्टी स्पीकर नरहरि जिरवाल को रोका जाए।
- उद्धव गुट की ओर से अजय चौधरी को शिवसेना विधायक दल का नेता बनाने को चुनौती दी गई।
- शिंदे गुट के विधायकों को केंद्र सरकार से सुरक्षा दिलाई जाए।
- दल बदल कानून के तहत शिंदे गुट के 16 विधायकों के खिलाफ डिप्टी स्पीकर को कार्यवाही करने से रोका जाए।
- 16 विधायकों को दल बदल कानून के तहत भेजे गए समन को खारिज किया जाए।
- शिंदे गुट की ओर से नियुक्त चीफ व्हिप को उद्धव गुट के विधायकों के खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही करने से रोका जाए।
शिंदे VS उद्धव विवाद के 6 किरदार, सुप्रीम कोर्ट ने किस पर क्या कहा
1. उद्धव ठाकरे और सरकार की बहाली पर
सुप्रीम कोर्ट: उद्धव ठाकरे की महाराष्ट्र विकास अघाड़ी सरकार बहाल नहीं की जा सकती है, क्योंकि उद्धव ठाकर ने विधानसभा में फ्लोर टेस्ट का सामना नहीं किया। उन्होंने उससे पहले ही इस्तीफा दे दिया। ऐसे में तत्कालीन राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी का फैसला भी न्यायोचित है, क्योंकि उन्होंने एकनाथ शिंदे को सरकार बनाने के लिए बुलाया। शिंदे को विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी भाजपा का समर्थन था।
क्या हुआ था: 28 जून को राज्यपाल कोश्यारी ने फ्लोर टेस्ट बुलाया। उद्धव इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गए पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक से इनकार कर दिया। 29 जून को उद्धव ने इस्तीफा दे दिया।
2. एकनाथ शिंदे और उनकी सरकार पर
सुप्रीम कोर्ट: शिंदे और 15 विधायकों को अयोग्य ठहराए जाने का फैसला स्पीकर उचित समय के भीतर करें। यानी एकनाथ शिंदे को अभी इस्तीफा नहीं देना पड़ेगा और वो मुख्यमंत्री बने रहेंगे।
क्या हुआ था: 25 जून 2022 को महाराष्ट्र के डिप्टी स्पीकर नरहरि जिरवाल ने शिंदे समेत 16 बागी विधायकों को अयोग्य करार दे दिया था। इसके खिलाफ शिंदे गुट सुप्रीम कोर्ट गया, डिप्टी स्पीकर को नोटिस भेजा गया।
3 और 4. भरत गोगावले और राहुल नारवेकर और उनके व्हिप पर
सुप्रीम कोर्ट: शिंदे गुट के भगत गोगावले को शिवसेना का व्हिप नियुक्त करने का स्पीकर का फैसला कानूनन गलत था। स्पीकर ने यह पहचानने की कोशिश नहीं की कि पार्टी की ओर से सुनील प्रभु (उद्धव गुट) आधिकारिक व्हिप हैं या फिर भरत। स्पीकर को उसे ही व्हिप मानना था, जिसे शिवसेना ने नियुक्त किया था।
क्या हुआ था: विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर ने ठाकरे गुट के सुनील प्रभु को हटाकर शिंदे खेमे के भरत गोगावले को शिवसेना का चीफ व्हिप बनाया। फिर गोगावले ने 4 जुलाई को सभी विधायकों को फ्लोर टेस्ट में शामिल रहने का व्हिप जारी किया था।
5. राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी और फ्लोर टेस्ट बुलाने पर
सुप्रीम कोर्ट: राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी का उद्धव को फ्लोर टेस्ट के लिए बुलाना सही नहीं था। राज्यपाल ने शिवसेना के उन विधायकों के गुट की बात पर भरोसा करके गलती की, जिन्होंने कहा था कि उद्धव के पास विधायकों का समर्थन नहीं है।
क्या हुआ था: कोश्यारी ने 28 जून को उद्धव ठाकरे से फ्लोर टेस्ट में बहुमत साबित करने को कहा था।
6. नबाम रेबिया केस
सुप्रीम कोर्ट: स्पीकर के विधायकों को अयोग्य करार देने के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान नबाम रेबिया केस का उदाहरण दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 5 जजों की बेंच ने रेबिया केस का फैसला दिया था। इस फैसले को 7 जजों की बड़ी बेंच के सामने विचार के लिए भेज रहे हैं।
क्या हुआ था: 2016 में अरुणाचल प्रदेश में CM नबाम तुकी को हटाने के लिए कांग्रेस पार्टी के 27 विधायक बागी हो गए। विधानसभा अध्यक्ष नबाम रेबिया इन्हें अयोग्य घोषित ठहराने वाले थे। इस बीच राज्यपाल राजखोआ ने रेबिया को हटाने का आदेश दिया। इसके बाद रेबिया सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। कोर्ट ने राष्ट्रपति शासन हटा दिया। कहा था कि सीएम की सिफारिश बिना राज्यपाल सत्र नहीं बुला सकता। पर अदालत ने रेबिया की वो याचिका खारिज कर दी, जिसमें उन्होंने सरकार बहाल करने की अपील की थी।
पहले जान लेते हैं महाराष्ट्र की राजनीति से जुड़े इस केस में अब तक क्या हुआ…
- 17 फरवरी को पीठ ने शिवसेना के उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे गुट की याचिकाओं पर सुनवाई की।
- 21 फरवरी से कोर्ट ने लगातार 9 दिन यह केस सुना था।
- 16 मार्च को सभी पक्षों की दलीलें पूरी होने पर कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था।
उद्धव गुट की मांग पर कोर्ट ने कहा- उद्धव इस्तीफा दे चुके अब बहाली कैसे करें?
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के आखिरी दिन यानी 16 मार्च को इस बात पर आश्चर्य जताया था कि कोर्ट उद्धव सरकार की बहाली कैसे कर सकता है क्योंकि उद्धव ने फ्लोर टेस्ट के पहले ही इस्तीफा दे दिया था। उद्धव ने अपनी याचिका में मांग की थी कि राज्यपाल का जून 2022 का आदेश रद्द किया जाए जिसमें उद्धव से सदन में बहुमत साबित करने को कहा गया था। इस पर उद्धव गुट ने कहा कि यथा स्थिति (स्टेटस को) बहाल की जाए, यानी उद्धव सरकार बहाल की जाए जैसा कोर्ट ने 2016 में अरुणाचल प्रदेश में नबाम तुकी सरकार की बहाली के ऑर्डर में किया था।
23 अगस्त को पांच जजों की बेंच को सौंप दिया केस
23 अगस्त, 2022 को, तत्कालीन CJI एनवी रमना की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों वाली बेंच ने दोनों गुटों की याचिकाओं पर कानून से जुड़े कई प्रश्न तैयार किए थे और केस को पांच जजों की बेंच को रेफर कर दिया था। याचिकाओं में दलबदल, विलय और अयोग्यता कई संवैधानिक प्रश्न उठाए गए हैं।
शिंदे और उद्धव की ओर से इन वकीलों ने की पैरवी
मामले में मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट की ओर से वरिष्ठ वकील नीरज किशन कौल, हरीश साल्वे, महेश जेठमलानी और अभिकल्प प्रताप सिंह ने दलीलें पेश की थीं। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मामले में राज्यपाल ऑफिस की पैरवी की। वहीं उद्धव गुट कि तरफ से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी, देवदत्त कामत और अधिवक्ता अमित आनंद तिवारी ने दलीलें पेश कीं।
उद्धव गुट ने राज्यपाल का आदेश रद्द करने की मांग की थी
उद्धव गुट ने मांग की थी कि राज्यपाल के जून 2022 के फ्लोर टेस्ट करने के आदेश को रद्द किया जाए। राज्यपाल का फैसला लोकतंत्र के लिए खतरनाक है और यह देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए घातक है।
उद्धव के वकील कपिल सिब्बल ने कहा था कि विधायिका और राजनीतिक दल के बीच संबंधों में राजनीतिक दल की प्रधानता होती है। सिब्बल ने तर्क दिया कि संविधान किसी भी गुट को मान्यता नहीं देता है चाहे बहुमत हो या अल्पमत। सिब्बल ने आगे तर्क दिया कि विधायकों की सरकार से असहमति सदन के बाहर थी सदन के अंदर नहीं।
CJI चंद्रचूड़ ने पूछा- क्या राज्यपाल समर्थन वापस लेने वालों की बात नहीं मान सकते?
CJI चंद्रचूड़ ने उद्धव ठाकरे खेमे के वकील से जानना चाहा था कि क्या राज्यपाल उन सदस्यों की बात नहीं मान सकते जो सरकार से समर्थन वापस लेना चाहते हैं। CJI ने कहा कि विधायकों का एक गुट था जो तत्कालीन उद्धव सरकार का समर्थन नहीं करना चाहता था। उसे अयोग्यता का सामना करना पड़ सकता है। इससे सदन की स्ट्रेंथ पर असर हो सकता है।
सिब्बल ने कहा ऐसा तब होता था जब दसवीं अनुसूची नहीं थी
कपिल सिब्बल ने जवाब दिया कि ऐसा तब होता था जब संविधान की दसवीं अनुसूची नहीं होती थी। उन्होंने कहा कि राज्यपाल किसी गुट के की मांग आधार पर विश्वास मत लेने को नहीं कह सकते, क्योंकि विश्वास मत की मांग गठबंधन पर आधारित होती है। महाराष्ट्र में अचानक कुछ विधायकों ने समर्थन वापस लेने का फैसला किया है।
उद्धव गुट ने कहा था कि अगर महाराष्ट्र में शिंदे सरकार चलने दी गई तो इसके देश के लिए दूरगामी परिणाम होंगे। क्योंकि तब किसी भी सरकार को गिराया जा सकता है। उद्धव गुट ने यह भी कहा था कि शिंदे गुट के पास दसवीं अनुसूची के मामले में कोई तर्क नहीं है।
उद्धव सरकार के साथ नहीं रहना चाहता था शिंदे गुट
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने महाराष्ट्र के राज्यपाल की ओर से बहस की। उन्होंने कोर्ट बताया कि शिंदे गुट के विधायकों ने राज्यपाल को लिखा था कि वे उद्धव सरकार के साथ बने रहना नहीं चाहते। इस पर राज्यपाल ने उद्धव ठाकरे को सदन में बहुमत साबित करने के लिए कहा था।
शिंदे गुट ने कहा- शक्ति परीक्षण राजभवन में नहीं सदन में होता है
शिंदे गुट ने सुप्रीम कोर्ट के सामने तर्क दिया था कि शक्ति परीक्षण राजभवन में नहीं होता बल्कि सदन के पटल पर होता है। राज्यपाल ने शक्ति परीक्षण का आदेश देकर कुछ भी गलत नहीं किया। शिंदे गुट की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील एनके कौल ने कहा कि राजनीतिक दल और विधायक दल आपस में जुड़े हुए हैं।
उद्धव ठाकरे गुट का यह तर्क कि अन्य गुट विधायक दल का प्रतिनिधित्व करते हैं न कि राजनीतिक दल का, एक भ्रम है। उन्होंने यह भी कहा कि असहमति लोकतंत्र की पहचान है।
शिवसेना पर दावे के केस में सुप्रीम कोर्ट बोला:विधानसभा अध्यक्ष को अयोग्यता पर फैसले से नहीं रोका होता तो शिंदे शपथ नहीं ले पाते
सुप्रीम कोर्ट ने एक मार्च को कहा था कि अगर महाराष्ट्र में विधानसभा अध्यक्ष को 39 विधायकों के खिलाफ लंबित अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला करने से नहीं रोका जाता तो शिवसेना नेता एकनाथ शिंदे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद की शपथ नहीं ले पाते। कोर्ट की पांच जजों की संविधानपीठ शिवसेना पर दावे के केस की सुनवाई कर रही है।
शिंदे की हुई शिवसेना, तीर-कमान निशान भी मिला:चुनाव आयोग बोला- उद्धव गुट ने चुनाव बगैर लोगों को नियुक्त किया, यह असंवैधानिक
चुनाव आयोग ने एकनाथ शिंदे गुट को असली शिवसेना मान लिया है। आयोग ने शिंदे गुट को शिवसेना का नाम और तीर-कमान का निशान इस्तेमाल करने की इजाजत दे दी। आयोग ने पाया कि शिवसेना का मौजूदा संविधान अलोकतांत्रिक है। उद्धव गुट ने बिना चुनाव कराए अपनी मंडली के लोगों को अलोकतांत्रिक रूप से पदाधिकारी नियुक्त करने के लिए इसे बिगाड़ा।

