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मलियाना कांड :पुलिस ही आरोपी, न सबूत जुटाए, न जांच की; केस ऐसे हुआ कमजोर

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मेरठ

‘23 मई 1987 को हम लोग नमाज पढ़कर मस्जिद से घर लौटे थे। तभी भीड़ आ गई, कुछ लोगों के हाथ में राइफल और रिवॉल्वर थी और कई सरिया और लाठी लिए हुए थे। दोपहर के 2.45 बज रहे थे। भीड़ में आए लोगों ने जो सामने मिला, उसे पीटना शुरू कर दिया। गोलियां भी चलाने लगे।’

‘भीड़ के कुछ लोग हमारे घरों में घुस गए और सामान लूटने लगे। शोर मचा तो आस-पास के लोग इकठ्ठा होने लगे, ये देखकर वो हमारे घरों में आग लगाकर भाग गए। फायरिंग और सरिये-लाठी से हुई मारपीट में मौके पर ही 7 लोगों की मौत हो गई।’

मलियाना नरसंहार केस में 36 साल पहले मोहम्मद याकूब ने पुलिस के पास जो पहली शिकायत दर्ज कराई थी, ये उसी का हिस्सा है। पूरी तहरीर और पुलिस FIR में यूपी पुलिस की उस 44वीं प्रोविंशियल आर्म्ड कॉन्स्टेबुलरी (PAC) का जिक्र तक नहीं है, जिस पर मलियाना के पीड़ित फायरिंग करने का आरोप लगाते हैं, लेकिन ऐसा हुआ कैसे कि 72 लोगों की हत्या हुई और कोई दोषी भी साबित नहीं हुआ…

जनहित याचिका, एक पुलिसवाला और एक पत्रकार
दो साल पहले 19 अप्रैल 2021 को सीनियर जर्नलिस्ट कुरबान अली ने IPS अधिकारी विभूति नारायण राय के साथ मिलकर मलियाना केस में इलाहाबाद हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की। कुरबान अली ने 1987 के मेरठ दंगों की रिपोर्टिंग की थी।

वहीं, विभूति नारायण उस वक्त गाजियाबाद के SP थे। बाद में उन्होंने मलियाना नरसंहार के एक दिन पहले हुए हाशिमपुरा कांड का केस लड़ा और उस पर किताब भी लिखी। विभूति नारायण यूपी पुलिस के डायरेक्टर जनरल होकर रिटायर हुए।

विभूति नारायण राय बताते हैं कि मलियाना केस में पुलिस ने गलत FIR दर्ज की थी, सबसे पहली गलती तो यहीं से शुरू हुई। ट्रायल के दौरान कई साल तक FIR ही गायब रही। इसी वजह से ट्रायल हो ही नहीं रहा था। जैसे ही हाईकोर्ट में हमारी जनहित याचिका पर सुनवाई की तारीख तय हुई तो वो खोई हुई FIR मिल गई। यहीं से मलियाना केस में पहली बार तेजी आई।

मोहम्मद याकूब की ओर से दर्ज कराई FIR का हिस्सा, जिसमें पूरी घटना के बारे में बताया गया है।

मलियाना नरसंहार केस में विभूति नारायण राय और कुरबान अली ने मिलकर इलाहाबाद हाईकोर्ट में जो जनहित याचिका दायर की है, उसमें ये मांगें उठाई गईं…

मेरठ कोर्ट में जज लखविंदर सूद ने जो फैसला सुनाया, हमने उस पूरे फैसले को पढ़ा। मलियाना केस में हुई पहली FIR से लेकर, इस केस के सबूतों और गवाहों से होकर गुजरे। वहीं दोनों पक्षों के वकीलों से भी बात की और समझने की कोशिश की कि आखिर 72 लोगों की हत्या के मामले में कैसे एक भी आरोपी दोषी साबित नहीं हुआ?

शुरुआत में इस केस में 94 लोगों को आरोपी बनाया गया, लेकिन 36 साल में कई लोगों की मौत हो गई। आखिरी फैसले में बचे हुए 41 आरोपियों को बरी कर दिया गया।

इन्वेस्टिगेशन में क्या हुआ?
तहरीर के आधार पर घायलों के बयान लिए गए। निशानदेही करके घटना का नक्शा बनाया गया। आरोपियों को गिरफ्तार करके उनके बयान लिए गए। सबूतों के आधार पर 94 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट फाइल की गई।

पुलिस ने कोर्ट में घायलों की मेडिकल रिपोर्ट, मौका-ए-वारदात के नक्शे, फोटो पेश किए। मामले में कुल 14 गवाहों को पेश किया गया, लेकिन सभी की गवाही नहीं हो सकी। इन गवाहों में वो दो लोग भी शामिल हैं, जिन्हें हमने अपनी पहली स्टोरी में शामिल किया था, वकील अहमद और रईस अहमद। वकील अहमद को हाथ और कमर पर गोली लगी थी और रईस को मुंह पर गोली लगी थी।

5 बातें, जो बताती हैं कि पुलिस ने जांच सही तरीके से नहीं की

  1. याकूब, जिनकी तहरीर पर FIR दर्ज की गई, वो बताते हैं कि घटना वाले दिन पुलिस उन्हें भी थाने ले गई थी और उनकी बहुत पिटाई की गई थी, इसके बाद उनके नाम से FIR लिखवाई गई और दस्तखत करवाए गए।
  2. FIR में आरोपियों के नाम वोटर लिस्ट से चुनकर लिख दिए गए। नतीजा ये हुआ कि इन आरोपियों में से कुछ लोगों की मौत 1987 के कई साल पहले ही हो चुकी थी। कोर्ट के सामने ऐसी चीजों ने केस को कमजोर किया।
  3. हम इस केस में जितने भी गवाहों से मिले, सभी ने केस में PAC की फायरिंग की बात कही, लेकिन FIR में PAC का नाम तक नहीं है। जानबूझकर FIR से ही PAC को बचा लिया गया।
  4. मौका-ए-वारदात से फायरिंग किए गए खोखे, कारतूस वगैरह कुछ भी रिकवर नहीं किए गए।
  5. लोगों के घरों से लूटा गया माल भी बरामद नहीं किया गया।

‘जिन्हें गोलियां लगी हैं, कोर्ट ने उनकी गवाही कबूल नहीं की’
मलियाना केस में पीड़ित पक्ष के वकील अलाउद्दीन सिद्दीकी कहते हैं, ‘हम कोर्ट के जजमेंट पर कुछ नहीं कह सकते हैं, लेकिन हम फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट का रुख करेंगे। हमें पूरी उम्मीद है कि हाईकोर्ट में आरोपियों को सजा होगी ही।’

सिद्दीकी आगे कहते हैं, ‘7 ऐसे गवाह कोर्ट तक गए थे, जिन्हें गोलियां लगी थीं, लेकिन इसके बावजूद कोर्ट ने इसे एविडेंस नहीं माना। कोर्ट ने इस आधार पर गवाहों को मानने से यकीन किया है कि प्रत्यक्षदर्शी ये नहीं बता पा रहे कि किस व्यक्ति ने किसे मारा, कौन क्या कर रहा था, किसके हाथ में कौन सा हथियार था।’

‘अगर दंगे में चार-पांच सौ लोगों की भीड़ आ रही है तो कौन देख पाएगा कि किसने क्या किया। किस व्यक्ति के हाथ में पिस्टल, राइफल, तलवार, भाला, मशाल थी, ये डिटेल हर व्यक्ति के बारे में कैसे बता पाएगा।’

फैसले में जज ने ये भी सवाल उठाया है कि गवाहों से 93 आरोपियों की आइडेंटिफिकेशन परेड भी नहीं कराई गई। सिद्दीकी कहते हैं, ‘आरोपी और पीड़ित पड़ोसी हैं, ऐसे में इसकी जरूरत ही नहीं थी। कोर्ट का कहना था कि कोई इंडिपेंटेंड गवाह नहीं है, समझने की बात है कि दंगे की स्थिति में पीड़ित और आरोपी के अलावा कौन होगा। 42 लोगों के पोस्टमॉर्टम हुए हैं, 36 लोगों के दस्तावेज मेरे पास हैं। क्या ये लोग अपने आप मर गए। 42 में से 30 लोग तो सिर्फ जलने या घुटन की वजह से मारे गए।’

सिद्दीकी कहते हैं, ‘हाईकोर्ट का आदेश था कि जितने भी पुराने मामले हैं उन्हें 2022-23 में निपटाना है। इसलिए इनमें 31 मार्च 2023 तक फैसला देना है। केस में जो भी 2-4 गवाह आए और सुनवाई करके मामले को रफा-दफा करते हुए सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया। केस में कुल 40 के आसपास गवाह हो सकते थे, लेकिन कोर्ट ने सिर्फ 5-6 को ही सुना और फैसला दे दिया।’

‘अगर गोलियों के खाली खोखे बरामद कर लिए जाते तो केस पलट जाता’
आरोपियों की तरफ से जिरह करने वाले वकील छोटे लाल बंसल कहते हैं कि प्रॉसिक्यूशन के मुताबिक 23 जून 1987 को FIR कराई गई, लेकिन वादी ने कहा कि ये अगले दिन यानी 24 मई को कराई गई। हमारी तरफ से कभी तारीख नहीं बढ़वाई गई।’

‘पिछले 20 साल से ये केस बिना एविडेंस चलता रहा। पुलिस ने सरकार की तरफ से जैसा कहा गया, वैसी FIR दर्ज की। ये बात सही है कि पीड़ित पक्ष के साथ गलत हुआ है।’

बंसल के मुताबिक, ‘पुलिस ने मौका-ए-वारदात से फायरिंग के बाद गोलियों के खोखे तक बरामद करना जरूरी नहीं समझा। अगर खाली कारतूस होते तो साबित हो जाता कि ये PAC की राइफल से किए गए फायर हैं या नहीं। केस में मलियाना के जो भी गवाह आए, उन्होंने डिफेंस के पक्ष का समर्थन किया है।’

‘हाईकोर्ट में जनहित याचिका लगी और मलियाना केस रफा-दफा हुआ’
मलियाना केस में हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर करने वाले पत्रकार कुरबान अली कहते हैं, ‘मेरठ कोर्ट ने जो फैसला सुनाया है, उससे साफ है कि केस निपटा दिया गया है। इस केस में 36 पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट कोर्ट में पेश की गई थीं, इनमें से सिर्फ 8 की ही जांच की गई। कुल 35 गवाह थे, जिनमें से सिर्फ 4-5 लोगों की गवाही हुई।’

‘इस्माइल जिनके परिवार के 11 लोग मारे गए, उन्हें गवाही तक के लिए नहीं बुलाया गया। केस निपटाने के लिए ये सब किया गया।’

कुरबान ये मानते हैं कि FIR में कुछ फर्जी नाम भी आरोपियों में शामिल कर दिए गए थे, जो मलियाना की घटना से कई साल पहले मर चुके थे। करीब 20 लोग इस कार्रवाई के दौरान मर गए, 30 से ज्यादा लोगों को पुलिस ने लापता बता दिया। जिस तरह से हाशिमपुरा केस में 32 साल बाद फैसला हुआ, इसी तरह से मलियाना में भी लोगों को न्याय मिलना चाहिए।

‘मलियाना को न्याय दिलाने के लिए कोई तैयार ही नहीं’
विभूति नारायण राय के मुताबिक पूरी FIR में पुलिस (PAC) के शामिल होने का जिक्र ही नहीं है। पुलिस का नाम ही FIR में नहीं था, इसलिए उनकी राइफलों की जांच ही नहीं की गई। कारतूस भी बरामद नहीं किए गए। ऐसे में कैसे साबित होता कि जो फायरिंग हुई वो पुलिसवालों की राइफल से हुई थी।

विभूति नारायण राय कहते हैं, ‘उस वक्त कांग्रेस की सरकार थी। राजनीतिक नेतृत्व भी उस वक्त चुनाव में व्यस्त था, डेढ़ साल में चुनाव होने वाले थे। ऊपर से बाबरी मस्जिद का दरवाजा खुलने के बाद सांप्रदायिक तनाव बना हुआ था, लेकिन इसके बाद मुलायम सिंह (समाजवादी पार्टी), मायावती (BSP), कल्याण सिंह (BJP) की सरकारें आईं। अगर कोई भी सरकार चाहती तो ट्रायल की शुरुआत में ही काफी चीजें इस केस में सुधारी जा सकती थीं। अफसोस, मलियाना को कोई न्याय दिलाना ही नहीं चाहता था।’

36 साल पहले हुए मलियाना नरसंहार के सभी आरोपी बरी हो गए, हमने मलियाना जाकर इसके पीड़ितों से मुलाकात की, पढ़िए ये ग्राउंड रिपोर्ट…

72 मुस्लिमों की हत्या का जिम्मेदार कोई नहीं, पीड़ित बोले- गोली आर-पार हो गई, और क्या सबूत दें

31 मार्च, 2023 को मलियाना नरसंहार के 36 साल बाद मेरठ की लोअर कोर्ट ने इस केस में सभी 41 आरोपियों को बरी कर दिया है। करीब 800 सुनवाई के बाद ये फैसला आया। मलियाना में अब भी कई लोग हैं, जिनके शरीर पर उस दिन चलीं गोलियों के निशान हैं। जिन्होंने अपने बच्चों और बुजुर्गों को मरते देखा, घरों को जलते देखा। इन लोगों का सवाल है, अगर सभी आरोपी बेगुनाह थे, तो उस दिन 72 लोगों को किसने मारा, हमारे घर किसने जलाए थे…

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