~डॉ. प्रिया मानवी
मंकीपॉक्स एक बिरले दीखने वाली बीमारी है. वायरस से होती है. इसका वायरस उसी प्रजाति का है जिसके चेचक के वायरस हैं या वे वायरस जिनसे चेचक के टीके बनते थे. पहली बार इसे 1958 में देखा गया था – बंदरों के दो गिरोह में जिन्हे शोधकार्य के लिए रखा गया था. इसका नाम मंकीपॉक्स वहीँ से आया.
मनुष्यों के इस वायरस से संक्रमित होने की बात सबसे पहले 1970 में डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कांगो में देखी गयी थी, जब वहां चेचक उन्मूलन का काम बहुत जोर-शोर से चल रहा था. उसके बाद मध्य और पश्चिमी अफ्रीका के कई देशों में इसके संक्रमण देखे गए – आइवरी कोस्ट, गैबन, लाइबेरिया, नाइजीरिया, सिएरा लियॉन. सबसे अधिक संक्रमण डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कांगो में मिले हैं.
अफ्रीका के बाहर भी इसके संक्रमण देखे गए हैं – अंतर्राष्ट्रीय यात्रा और पशुओं के निर्यात के चलते. पिछले वर्ष तक यूएसए, इजराइल, सिंगापूर और यूके में इसके मामले मिल चिके `चुके थे
अभी तक इसका ठीक ठीक पता नहीं चला है कि इस वायरस का प्राकृतिक स्रोत कहाँ है – किस जंतु में. इतनी जानकारी भर है कि अफ्रीकन चूहे और बंदरों में वायरस रह सकता है और उनसे मनुष्य संक्रमित हो सकते हैं.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (विस्वास) की 16 मई की विज्ञप्ति के अनुसार 7 मई को यूके में मंकीपॉक्स का के एक मामले की सम्पुष्टि हुई थी. संक्रमित हाल में नीजेरिया की यात्रा से वापस लौटा था. कल विस्वास की एक नयी विज्ञप्ति में बताया गया कि 13 मई को यूके में मंकीपॉक्स के दो सम्पुष्ट और एक संभावित मामला मिले हैं
कल तक यह पता नहीं चला था कि उन संक्रमणों का स्रोत कहाँ है. यह भी स्पष्ट नहीं है कि यूके में रोग कितना फैला है. विस्वास ने कुछ और संक्रमितों के मिलने की आशंका बतायी है.
आज की रिपोर्ट है कि यूके के अलावा पुर्तगाल, स्पेन, और कुछ और यूरोपीय देशों में संक्रमण देखे गए हैं. प्रकोप बहुत ज्यादा नहीं है – अब तक 68 संक्रमित. इनके सिवा कनाडा में ‘कुछ’ और यूएसए में एक के संक्रमित होने की खबर है. रोग का ऐसे अचानक फैलने लगना असामान्य है.
रोग कष्टसाध्य हो सकता है. प्रारंभिक लक्षण हैं बुखार, बदन में दर्द, लिम्फ नोड्स का फूलना और अंत में हाथ और पैरों पर चेचक के दानों के समान दाने – द्रव से भरे और कष्टप्रद. वाइरस का एक रूप बहुत खतरनाक है – दस प्रतिशत मृत्युदर. इंग्लैंड में जो रूप है वह नरम है, मृत्युदर एक प्रतिशत से कम. रोग प्रायः दो से चार सप्ताह में ठीक होता है.
दो दिन हुए, केरल सरकार ने मंकीपॉक्स की चेतावनी दी. अभी तक कोई मामला नहीं मिला है लेकिन पाया गया है कि विदेशों से भारत आते संक्रमण प्रायः केरल में सबसे पहले पंहुचते हैं.
तीन दिन पहले तक ग्यारह गैर-अफ्रीकी देशों में इस संक्रमण के 120 सम्पुष्ट मामले मिले हैं. चूंकि अफ्रीका के बाहर यह रोग अनजान प्राय रहा है इसलिए अचानक इसका इतना फैलना चिंता की बात मानी जा रही है.
ध्यान रहे कि 1970 से, जब से इस संक्रमण को देखा जा रहा है, मार्च 2022 तक अफ्रीका के बाहर मिले कुल मामले भी 120 नहीं हैं जितने बस अप्रील-मई 2022 में मिल गए.
लेकिन मंकीपॉक्स का वायरस सार्स कोवी 2 जैसा नहीं है. यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक उतनी आसानी से नहीं जाता और चूंकि यह चेचक के वायरस से सम्बन्ध रखता है.
इसका इलाज और इसके लिए टीके पहले से उपलब्ध हैं. इसके फैलने से वैज्ञानिक चिंतित अवश्य हैं, व्याकुल बिलकुल नहीं.
19 मई को पुर्तगाल के शोधकर्ताओं ने वहाँ मिले वायरस के जेनोम का शुरुआती खाका (ड्राफ्ट जेनोम) प्रकाशित किया था.
कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि यह कुछ अधिक ही शुरुआती है और वायरस की जेनेटिक सामग्री समझने के लिए अभी बहुत काम करने पड़ेंगे.
लेकिन इस शुरुआती खाके से यह पता चल रहा है कि अभी अफ्रीका के बाहर वायरस का पश्चिम अफ्रीका रूपांतर फैल रहा है.
यह अपेक्षाकृत नरम है इससे मृत्युदर एक प्रतिशत से कम देखी जाती है. वायरस के मध्यअफ्रीका रूपांतर से हुए रोग में मृत्यु दर दस प्रतिशत है.
लेकिन यह पता नहीं है कि पुर्तगाल में मिला वायरस पश्चिमी अफ्रीका के वायरस से कितना भिन्न है या अभी अफ्रीका के बाहर मिल रहे वायरस सभी एक ही रूप के हैं या उनके रूपांतर हो रहे हैं.
मंकीपॉक्स वायरस डीएनए वायरस है. आरएनए वायरसों में (जैसे सार्स कोवी 2) रूपांतर जल्द होते हैं. हमने देखा है कि कोविड के वायरस के ऐसे भी रूप मिल रहे हैं जो टीके से नहीं मानते और जो पहले हुए संक्रमण से देह में बनी प्रतिरक्षा की भी नहीं सुनते. मंकीपॉक्स से, उम्मीद है, वैसी परेशानियाँ देखने को नहीं मिलेंगी.
सार्स कोवी 2 बिना कोई लक्षण लाए भी फैल सकता है. मंकीपॉक्स ऐसा नहीं करता. इसके संक्रमितों में लक्षण उभरते ही हैं. फिर भी यह ऐसे लोगों में दिख रहा है जिनके आपस में कोई सम्बन्ध नहीं थे, जो एक दूसरे से कभी नहीं मिले थे, इस बात को कुछ वैज्ञानिक घोर चिंता की बात मानते हैं
समलैंगिकों में मंकीपॉक्स का प्रसार अधिक देखा गया है. अभी तक इसका कोई कारण स्पष्ट नहीं हुआ है. कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि संयोगवश समलैंगिक समूह का कोई व्यक्ति संक्रमित हो गया होगा जिससे उसके संपर्क में आते व्यक्ति भी संक्रमित हो रहे हैं.
यूके में मंकीपॉक्स के पहले मामले के सम्पुष्ट हुए अब तीन सप्ताह से अधिक हो गए. इस बीच बीस से अधिक गैर-अफ्रीकी देशों में चार सौ से अधिक व्यक्तियों में इस वायरस के होने की सम्पुष्टि मिली है.
चिंता की बात यह है कि अनेक देशों में असम्बद्ध जनसमूहों में वायरस को देखा जारहा है. इससे लगता है कि वायरस शायद गुप्त रूप से, बिना पहचान में आये फ़ैल रहा है.
इसे लेकर वैज्ञानिक अभी चार अहम सवालों से जूझ रहे हैं :
1. वर्तमान प्रकोप का आरम्भ कैसे हुआ?
वर्तमान संक्रमण में मिले वायरसों की जेनेटिक सामग्रियों से एक महत्वपूर्ण जानकारी यह मिली है कि जो वायरस अफ्रीका के बाहर मिल रहा है वह पश्चिमी अफ्रीका में मिलते रूपांतर के अनुरूप है. यह कम घातक होता है – मृत्युदर एक प्रतिशत से कम. वहीँ मध्य अफ्रीका के वायरस से मृत्युदर दस प्रतिशत तक देखी गयी है. इस प्रकोप में जितने वायरस अब तक जांचे गए हैं – छ भिन्न देशों से – सभी लगभग एक समान हैं (लगभग क्योंकि पूरे जेनोम को अभी तक नहीं पढ़ा जा सका है) इस लिए बहुत संभव है कि कोई (अभी तक अज्ञात) व्यक्ति पश्चिमी अफ्रीका गया होगा और वहां किसी संक्रमित मनुष्य या पशु के संपर्क से स्वयं संक्रमित हो होकर वापस आया होगा.
यह असंभव तो नहीं लेकिन बहुत संभावित बहुत संभावित नहीं लग रहा कि वायरस पहले ही से बिना पहचान में आये अफ्रीका से बाहर मौजूद रहा हो, क्योंकि मंकीपॉक्स संक्रमण के छुपे रहने (अलाक्षणिक) की बात नहीं देखी गयी है.
2. इस नए प्रकोप के पीछे वायरस में आया कोई जेनेटिक बदलाव तो नहीं?
इसका उत्तर बहुत कठिन है. अभी तक वैज्ञानिक यह भी नहीं खोज पाए हैं कि मध्य अफ्रीका के वायरस का कौन सा जीन उसे पश्चिमी अफ्रीका के वायरस की अपेक्षा अधिक घातक या अधिक संक्रामक बनाता है, जब कि दोनों वायरसों की पहचान हुए अब सत्रह साल बीत चुके हैं.
पॉक्स वायरस के सभी रहस्यों को अभी तक नहीं समझ पाने का एक कारण वायरस का बहुत बड़ा होना है. मंकीपॉक्स वायरस का जेनोम हमारे परिचित सार्स कोवी 2 के जेनोम से छह गुने से अधिक बड़ा है. यानी इसके जेनोम को समझने में उसकी अपेक्षा छः गुने से अधिक समय लगेगा.
फिर अफ्रीका में अपर्याप्त संसाधन रहे हैं. अनुदान देने वाली संस्थाओं ने इस वायरस पर शोध को बहुत महत्वपूर्ण नहीं समझा था, अब तक. वायरस के क्रमिक विकास (एवोलूशन) को समझने के लिए इससे संक्रमित पशुओं से इसे ले कर उनके जेनोम भी पढ़ने पड़ेंगे. वायरस छोटे जंतुओं को, जैसे चूहे, गिलहरियां, आसानी से संक्रमित कर सकता है. लेकिन अभी तक यह पता नहीं चला है कि इस वायरस का प्राकृतिक स्रोत कौन सा पशु है.
3. क्या अभी फैल रहे इसके प्रकोप को रोका जा सकता है?
संक्रमण के हालिया दौर को देखने के बाद कुछ देशों ने चेचक के टीके जमा करने शुरू कर दिए हैं. मंकीपॉक्स का वायरस चेचक के वायरस से बहुत अधिक मिलता जुलता है इस लिए माना जाता है कि चेचक के टीके इसके ऊपर भी काफी असरदार होंगे.
जहां कोविड के टीकों से प्रतिरक्षा मिलने में दो सप्ताह लग जाते हैं, चेचक का टीका, यदि संक्रमण के चार दिनों के अंदर पड़ जाए तो पूरी सुरक्षा दे देता है, क्योंकि इस वायरस का उद्भवन काल (इन्क्यूबेशन) लंबा होता है.
यदि टीके का प्रयोग हुआ भी तो कोविड की तरह पूरी जनसंख्या को टीके नहीं लगाने पड़ेंगे बल्कि संक्रमित व्यक्ति से संपर्क में आने वालों को ही टीके लगाए जाएंगे; साथ में उन्हें जिन्हे संक्रमण के खतरे अधिक हैं जैसे स्वास्थ्य-कर्मी. यदि मनुष्यों में इसके प्रसार को रोकने में सफलता मिल भी जाती है तो वैज्ञानिकों की चिंता है कहीं यह पशुओं में घर नहीं बना ले.
वैसा हो जाने पर यह संक्रमण भविष्य में बार बार दिखता रहेगा. यूरोप में संक्रमितों के पालतू पशुओं को विशेषकर चूहे, गिनीपिग आदि को एकांत में, सरकारी देख रेख में कुछ दिन रखने की अनुशंसा की गयी है.
इस की संभावना बहुत नहीं है लेकिन वैज्ञानिकों की चिंता है कि यदि ऐसा नहीं किया गया और वायरस पशुओं में चला गया तब जब तक हमें पता चलेगा बहुत देर हो चुकी होगी.
4. क्या वायरस का यह प्रसार इसके पिछले प्रसारों से भिन्न है?
इस वायरस का प्रसार दानों के सम्पर्क में आने से, शारीरिक द्रव से और श्वास में निकलते जलकण से होता है.
लेकिन स्पेन और बेल्जियम के स्वास्थ्य अधिकारी वहां हुए दो रेव पार्टियों में भाग लिए लोगों की विशेष जांच कर रहे हैं क्योंकि आशंका है कि वायरस अब शायद लैंगिक संबंधों के चलते भी फैलने में सक्षम हो गया हो. सार्स कोवी 2 मानव शरीर के बाहर बहुत कम देर टिक पाता है,
यह वायरस बहुत देर तक. इसके चलते चादर, दरवाजों के हत्थे भी संक्रमण के खतरनाक स्रोत माने जा रहे हैं.
समलैंगिक समूहों में इसके संक्रमण देखे गए हैं लेकिन वैज्ञानिक इसे बस एक संयोग बता रहे हैं – उनके विचार से, संयोग से कोई समलैंगिक संक्रमित हो गया होगा और उससे ऐसे समूहों में संक्रमण फैला होगा.
एक बात पक्की है कि जब मामला ठंढा पडेगा तब अनुदान देने वाली संस्थाओं को अपनी प्राथमिकताएं फिर से देखनी पड़ेंगी.
गैर-अफ्रीकी देशों से मंकीपॉक्स संक्रमण की आती रपटों को देखते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने परसो इसके प्रबंधन पर नीतिनिर्देश निर्गत किये, यद्यपि अभी तक इसका कोई मामला भारत में नहीं मिला है.
मंत्रालय ने कहा, अभी तक हम यह नहीं जान सके हैं कि प्राकृतिक रूप से यह वायरस किस पशु में रहता है. कुछ छोटे पशु, जैसे चूहों और गिलहरियों की कुछ प्रजातियां और मानवेतर द्विपादी इस वायरस से संक्रमित हो जाते हैं. वायरस का रोगोद्भवन काल (इन्क्यूबेशन पीरियड) यानी शरीर में इसके आने के बाद लक्षणों को उभरने में लगता समय प्रायः छह से तेरह दिन है, लेकिन यह पाँच से इक्कीस दिन भी हो सकता है.
दानों के निकलने के एक या दो दिन पहले से, सभी दानों की पपड़ी गिरने तक या सभी दानों के सूखने तक कोई संक्रमित व्यक्ति दूसरों में संक्रमण फैला सकता है.
मंत्रालय के अनुसार, वे सभी व्यक्ति जिन्होंने पिछले इक्कीस दिनों में प्रभावित देशों की यात्रा की हो और जिनमे इसके एकाधिक लक्षण मिल रहे हों उन्हें संक्रमण का संभावित मामला समझा जाएगा.
उनके संपर्क में आये व्यक्तियों के, संक्रमण काल (ऊपर देखें) पूरा होने तक नित्य परीक्षण किये जाने हैं यह देखने के लिए कि उनमे कोई लक्षण उभर रहे हैं या नहीं._
रोग को फैलने नहीं देने के बस दो उपाय हैं: निगरानी और नए मामलों की जल्द से जल्द पहचान.
इस बीच अफ्रीका के वन्य पशुओं से आते किसी उत्पाद से दूर रहना है. जो यात्री विदेश जा रहे हों उन्हें बीमार व्यक्तियों के संपर्क में आने से बचना है और ऐसे किसी व्यक्ति के भी जिसकी त्वचा पर घाव दिखें
[चेतना विकास मिशन]

