
दक्षिण-पश्चिम मानसून के तीन दिन की देरी के साथ 4 जून को केरल और 19 जून को मध्य प्रदेश पहुंचने की उम्मीद है। मौसम विभाग के मुताबिक इस अनुमान में चार दिन आगे-पीछे हो सकते हैं। मौसम विभाग से 2005 से 2022 के बीच अब तक सिर्फ एक बार (2015 में) देश में मानसून के दस्तक की सही तारीख बताने में चूक हुई है। अच्छी बात यह है कि तमाम आशंकाओं के उलट देश में 96% बारिश के साथ मानसून सामान्य ही रहेगा।
वहीं इंदौर, भोपाल, उज्जैन समेत पश्चिमी मध्य प्रदेश में सामान्य या उससे अधिक(94 से 110%) बारिश होने की संभावना है। जबलपुर, मंडला, बालाघाट समेत पूर्वी मध्य प्रदेश में सामान्य या उससे कम बारिश(90 से 100%) होने की संभावना है। मौसम विभाग के मुताबिक 96% से 104% बारिश को सामान्य माना जाता है। जून से सितंबर के बीच औसतन 868.6 मिमी बारिश होती है।
दूसरी तरफ, निजी मौसम एजेंसी स्काईमेट के मुताबिक देश में 7 जून को दस्तक देगा और इस साल 94% के साथ सामान्य से कम बारिश होगी। यदि ऐसा होता है तो देश में बीते 4 साल से हो रही सामान्य बारिश का क्रम टूट जाएगा। मानसून में 3 दिन के प्लस-माइनस की त्रुटि की आशंका है। मजबूत मानसून देश के लिए बहुत मायने लगता है। 70% बारिश इसी सीजन में होती है। यह कृषि को संजीवनी देती है। इकोनॉमी में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी 19% है। इस बीच, मंगलवार को अचानक मौसम ने करवट ली। दोपहर के वक्त इंदौर के कुछ इलाकों में 10 मिनट तेज बारिश हुई।
अल-नीनो से कम बारिश हो, जरूरी नहीं; 7 दशकों में 15 बार ऐसा हुआ, पर 6 बार सामान्य से ज्यादा वर्षा
मौसम विभाग के बारिश के अनुमान कितने सटीक?
मौसम विभाग की सटीकता लगातार बढ़ रही है। बीते तीन वर्षों में उसके अनुमान काफी सटीक रहे हैं। 2019 व 2020 में मौसम विभाग ने क्रमश: 96% और 100% बारिश का पूर्वानुमान जताया था। वास्तविक बारिश क्रमश: 110% और 109% हुई। वर्ष 2021 में 98% बारिश का अनुमान था और वास्तविक बारिश 99% रही।
मानसून देरी से पहुंचने की मुख्य वजह क्या दिखती है?
मौसम विज्ञानी डीएस पई कहते हैं कि मानसून की दस्तक सिर्फ प्री-मानसून में समुद्री और जमीनी सतह के तापमान पर निर्भर नहीं करती है। यह कई अन्य फैक्टर पर निर्भर करती है। हालांकि प्री-मानसून में जमीनी क्षेत्र पर गर्मी सामान्य से अधिक रहती है तो वह मानसून को खींचने में मदद करती है। इस बार जमीनी क्षेत्र में मध्य मई तक पर्याप्त नमी रही। मानसून के आगमन के लिए मिट्टी की ऊपरी सतह का पर्याप्त गर्म होना जरूरी है, इसीलिए मानसून सामान्य की तुलना में तीन दिन या अधिक देरी से आ रहा है।
मानसून में इस बार अल-नीनो पैटर्न का प्रभाव रहेगा?
जून से सितंबर तक के मानसूनी सीजन के दौरान अल-नीनो के विकसित होने की आशंका 90% है। भारत में जब भी मानसून सीजन के दौरान अल-नीनो विकसित होता है तो कम बारिश होने से लेकर सूखे जैसी घटनाएं देखी गई हैं। लेकिन मौसम विभाग का तर्क है कि अल-नीनो में कम बारिश ही हो, यह जरूरी नहीं है। बीते सात दशकों में 15 बार अल-नीनो की घटना हुई है और उसमें से छह बार सामान्य से ज्यादा भी बारिश हुई। अल नीनो एक मौसमी घटना है। यह तब होती है जब समुद्र में मध्य और ईस्टर्न पेसिफिक ओशियन का तापमान सामान्य से ज्यादा होता है।
मानसून की रफ्तार कैसे रहने की संभावना है?
स्काईमेट के विज्ञानी महेश पलावत के मुताबिक दक्षिण भारत में यह बेहद सुस्त रफ्तार से आगे बढ़ेगा। इससे पूरे जून महीने में मध्य व उत्तरी भारत में गर्मी रह सकती है। मानसून की देरी की वजह यह है कि दक्षिणी हिंद महासागर से फैबिन समुद्री तूफान गुजर रहा है, इसके अवशेष को साफ होने में एक हफ्ते का वक्त लग सकता है। इस तूफान की वजह से मानसूनी हवा आगे नहीं बढ़ पा रही है। ऊपर से, अरब सागर में एक एंटी साइक्लोनिक सर्कुलेशन मानसून को पश्चिमी तट के करीब आने से रोक रहा है।