*कानून और संविधान के उल्लंघन से हो रहा है अन्याय और अत्याचार!!*
*आज सूखी पड़ी नर्मदा, फिर लायेगी बाढ़ तो ‘बिना पुनर्वास डूब’*
नर्मदा घाटी में, नर्मदा और मानव बचाने के लिए पिछले करीबन 40 सालों से चल रहे संघर्ष ने बहुत कुछ पाया है लेकिन आज भी जिन्होंने अपना घर, खेती छिनी जाने के बावजूद पुनर्वास नहीं पाया, उन्होंने काफी कुछ खोया है| ऐसे निरपराध लोगों में सम्मिलित है, गरीब श्रमिक, आदिवासी, किसान, मजदूर, दलित, कारीगर, कुछ व्यापारी भी! इनकी कानूनी पात्रता होते हुए भी उन्हे पुनर्वास से बाहर छोड़ना बड़ा अन्याय और न्यायिक अवमानना है| टिनशेड में 2019 से या 2023 से पड़े रहे गरीब, 2023 में बैकवॉटर लेवल्स बदलने के अवैध खेल से डूबग्रस्त हुए मजदूर, किसान, मछुआरे सभी हैरानी भुगत रहे हैं| वैकल्पिक खेती की पात्रता होते हुए भी 2017 के सर्वोच्च अदालत के आदेश अनुसार 60 लाख रुपए भी नहीं मिले या मकान के लिए भूखंड नहीं मिला या भूखंड मिला तो भी गृहनिर्माण का अनुदान नहीं मिला तो जीने के, अजीविका के अधिकार पर आघात भुगत रहे है| मछुआरों के संघ को न पंजीयन, नही महाराष्ट्र की सहकारी समितियों के जैसी सहायता दी जा रही है| डूबग्रस्त कुम्हार, केवट, जैसे पीढ़ियों से रहे समाजसेवकों को भी 2017 के आदेशों के अनुसार पुनर्वास के लाभ नहीं मिले हैं|
2023 की भयावह डूब में इंसान, मवेशियों की मृत्यु नहीं, हत्या हुई…. ध्वस्त हुए हजारों मकान और हजारों एकड़ खेती तो 2024 तक पुनर्वास का कार्य आगे न बढ़ने से हमें उपवास, धरना, बड़ी रैली, जलसत्याग्रह से आवाज उठानी पड़ी, जब बहुत सारे आश्वासन मिले| टिनशेड वालों की पात्रता जांचने, धार तहसील में अतिक्रमित खेत जमीन देकर फंसाये गये लोगों को वैकल्पिक खेती का अधिकार देने जैसे मुद्दों पर लिखित भी आश्वासन होते हुए कार्य आगे नहीं बढ़ा| 2024 में केवल उपरी बांधों के प्रवाहों का नियमन, सरदार सरोवर से गेट कम- अधिक खोलना और प्रधानमंत्री जी के बांध पर होते रहे जन्मदिन समारोह को रद्द करना, इतना हुआ| पुनर्वसाहटों में आजतक रास्ते, पानी जैसी समस्याओं का भी हल नहीं हुआ है!
मध्यप्रदेश में 32000 तक भूखंड आबंटित किये गये जिनकी रजिस्ट्री नहीं हुई है, कईयों को भूखंड मिले ही नहीं तो कईयों को केवल कागज पर मिले हैं| इन सभी मुद्दों पर उच्च न्यायालय, इंदौर खंडपीठ में नवंबर 2024 में प्रस्तुत की गयी याचिका में आजतक नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण ने तथा राज्यशासन ने जवाब ही प्रस्तुत नहीं किया तो मुख्य न्यायाधीश महोदय ने उन्हें 10 हजार रु. का दंड करने के बावजूद यह भी क्यों?
सवाल यही है कि नर्मदा घाटी के विस्थापितों को आधे रास्ते में छोड़ने का कारण क्या है? सभी तहसीलों में पुनर्वास अधिकारियों के पद वर्षो से और शिकायत निवारण प्राधिकरण के 5 सदस्य न्यायाधीशों के पद सितंबर 2024 से रिक्त क्यों है? गुजरात राज्य के लिए कानूनी बंधनकारकता होते हुए भी गुजरात ने उर्वरित पुनर्वास के तथा मध्यप्रदेश की डूबग्रस्त वनजमीन और शासकीय जमीन की भरपाई के करोड़ों रुपए के खर्च की राशि देने से क्यों इंकार किया है? अगर राज्य शासन को भी राशि का आबंटन जरूरी था तो नर्मदा पर नये-नये बांध, आदिवासियों के ‘पेसा’ कानून के तहत् जारी विरोध के बावजूद आगे बढ़ाने के लिए हजारों करोड़ रुपये राशि आबंटित की लेकिन सरदार सरोवर के उर्वरित कार्य के लिए नाम मात्र 150 करोड़ ही क्यों? इन तमाम सवालों का जवाब और सुलझाव के लिए जिला अधिकारी, आयुक्त, अपर मुख्य सचिव- एनवीडीए के उपाध्यक्ष आदि के साथ संवाद होगा या फिर से उतरना पड़ेगा सत्याग्रही संघर्ष पर?
नर्मदा नदी को निर्मल रहने न देने के लिए भी कौन है दोषी? नदी एक जीवित इकाई और पेयजल सहित जन-जन का जीवनाधार होते हुए भी आजतक जबलपुर से बड़वानी तक किसी भी शहर में STP न होते हुए गंदा पानी बह रहा है नर्मदा में| इसमे क्रूझ चलाने के विरोध में राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण- भोपाल और सर्वोच्च न्यायालय के मध्यप्रदेश पर्यटन विभाग को दिये आदेशों का पालन होगा या उल्लंघन? नर्मदा का पानी कच्छ तक, सौराष्ट्र तक की जरूरत पूरी करने की लिए सरदार सरोवर बना, जिस पर 75,000 करोड रुपए खर्च किया गया, यह गुजरात शासन ने घोषित किया, जबकि हमारी जानकारी से 90,000 करोड़ खर्च हुआ है….. फिर भी कच्छ सौराष्ट्र के किसान वंचित है.. गांव-गांव को पीने का पानी खरीदना मुश्किल हो रहा है और कच्छ के रण में लाखों लिटर्स पानी खुला छोड़कर (नहर निर्माण अधूरा होने से, टूटफूट से..) बर्बाद किया जा रहा है|
इस स्थिति में गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश के भी नर्मदा घाटी के लोग पानी के लिए तरसने की हकीकत, कई किलोमीटर तक चलकर पानी लाने के लिए मजबूर महिलाओं के फोटोज, वीडियो के साथ धक्कादायक खबर बन गयी है? क्या नर्मदा माता और जनता के अधिकार के लिए 40 वे साल भी संघर्ष जारी रखना ही पड़ेगा?
भगवान सेप्टा श्यामा मछुआरा कमला यादव देवीसिंह तोमर गजानंद यादव मेधा पाटकर

