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न रेता का रेट कम हुआ न अनशन ही हुआ, कुछ न कुछ तो गड़बड़ हुआ

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सीधी की रेता सीधी के ही लोगों को रेत ठेकेदार द्वारा मनमानी करते हुए भारी कीमत चुकाने को मजबूर कर दिया गया है। जिसके चलते जहां आम लोगों का निर्माण कार्य प्रभावित हुआ है वहीं सरकारी निर्माण कार्य भी प्रभावित हो रहे हैं। गरीब का और बुरा हाल है प्रधानमंत्री आवास के हितग्राहियों को प्रदान की जाने वाली राशि बालू भर के लिए होती है। ठेकेदार द्वारा रेता की मनमानी कीमत तय करने में अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की हिस्सेदारी ही मूल कारण है। जिले के सांसद और विधायकों का मौन धारण ही रेत में मची लूट में उनकी साझेदारी साबित करता है। महंगी रेत से निजात मिलने की आस लोगों में तब जीवित हुई थी जब राज्यसभा सांसद द्वारा अपने लोक स्वराज यात्रा के समापन भाषण में महंगी रेत पर चिंता व्यक्त करते हुए अधिकारियों को आदेशित किए थे कि महंगी रेत से जिले वासियों की लूट बंद कराएं ऐसा नहीं होने पर सांसद जी ने 11 नवंबर से कलेक्ट्रेट के समक्ष अनशन की चेतावनी दी थी। 11 नवंबर चला गया न अनशन न अनशन कारी का पता रहा, हां महँगी रेत पहले जैसे ही सीधी के लोगों की कमर तोड़ रही है। अनशन की हुंकार नतीजे बिना विलीन होना कुछ न कुछ गड़बड़ झाला का संकेत करता है। यह स्थिति जहां लोक स्वराज यात्रा को हवा हवाई बताती है वही सीधी के लोगों कि यह उम्मीद जाती रही कि निचले सदन (लोकसभा) के सदस्य और विधान सभा के सदस्यों की रेत कारोबारी से हिस्सेदारी क्यों न हो उच्च सदन (राज्यसभा) के सदस्य महंगी रेता और रेत ठेकेदार पर लगाम लगाएंगे।

 *उमेश तिवारी सीधी (मध्य प्रदेश)*

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