चक्कू, छुरी, गोली का स्वाद चखाओ न श्रीमान* _चौराहों पर वसूली से फ़ुर्सत मिल जाये तो जरा बस्तियों में भी जाकर झांकिये, निगरानी बढ़ाये_ _तंग बस्ती मोहल्लों में बदमाश बनने, बदमाशी करने का नई उम्र को लगा शौक_ _हत्या, घेरकर निर्दयता से पीटने का चलन, आम आदमी दहशत में_
*ये क्या हो गया अपने इंदौर को? ऐसा एक दिन नही बीत रहा जब कोई हत्या नही हो रही या कोई विभत्स अपराध। अब तो गैंगवार तक शुरू हो गई। शहर पहले से ही नाइट्रा, एमडी, ड्रग, पूड़ियाओ की गिरफ्त में हैं। सरकार समर्थित “रँगीन रातों” की बेहयाई-नंगाई भी बदस्तूर जारी है। इन सबका कोई इलाज़ नजर ही नही रहा। इंदौर, देशभर में दागदार हो रहा है कि जरा जरा सी बात पर इन्दौर में हत्या हो जाती हैं। गुंडे और गुंडई बढ़ती जा रही हैं। समाधान जिनके पास हैं, उनको न जाने किसका इंतजार हैं? उधर गुंडे बदमाश वर्दी के ख़ौफ़ को ठेंगे पर नही, चाकू की नोक पर रखकर घूम रहे हैं। बेख़ौफ़। ख़ौफ़ में है हमारा इन्दौर।*_
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*नितिनमोहन शर्मा।*
*टांग तोड़ने से क्या होगा श्रीमान? कभी चाकू, छुरे, तलवार, गोली का स्वाद भी चखाओ न इन्हें। इनकी उम्र पर मत जाओ। न इनकी “बिल्लास” भर की कद काठी देखो। न छटाँग भर का बदन देखो। इनको बस ठोको। लट्ठ तो आपके इन पर असर नही करते। ये नाइट्रा, एमडी जैसे ड्रग लेते है, लट्ठ झेल लेते हैं। आप भी डर जाते हो कि “हाथ पैर में दम नही और हम किसी से कम नही ” वाला ये टटपुँजिया मर नही जाय। आप डरो मत। जमकर ठोको।*
*ये बदमाश बनने सड़को पर उतरे हैं। सपना है इनका बदमाशी करने का। बिजनेस करना चाहते है ये अपराध का, ख़ौफ़ का। आप इनका बिजनेस जमने ही मत दो। इनके टांग, हाथ पर प्लास्टर चढ़ाने से कुछ नही होना-जाना। न जाने कब से ये इंदौर ऐसे गुंडों हत्यारो के ऐसे प्लास्टर चढ़े फोटो आपकी अभिरक्षा में देख रहा हैं। इंदौरी बेचारा जरूर टूटे हाथ पैर देखकर खुश हो गया लेकिन ये डरे नही। न अपराध से। न आपसे।*
*इनका इलाज अब इनके ही हथियार से करना होगा। इनको भी स्वाद चखाओ ने कभी गोली का कि जब बंदूक से छूटकर बदन में घुसती है तो क्या क्या चीर देती हैं। चक्कू-छुरी की धार का भी अहसास कराओ न ताकि पता चले कि “फकाफक” चाकू मारने का दर्द क्या होता हैं। ज्यादा नही त9 कम से कम इनके ” पुट्ठे ” ही ” छेद ” दो ताकि “नित्यक्रिया” पर टॉको के खिंचाव के साथ रोज अहसास हो कि चाकू का घांव कैसा होता हैं। इसके बगैर ये आपसे डरने वाले नही। क्योकि ये बदमाशी के बिजनेस में उतरे लोग हैं।*
*इनकी कमसिन शक्ल पर मत जाओ। नियत को समझो। कालिख़ रोज आपकी वर्दी पर लग रही हैं। बदमान रोज आपका महकमा हो रहा हैं। इंदौर शहर रोज बदमान हो रहा हैं। ” सरकार ” का “सपनो का शहर” देशभर में दागदार होता जा रहा है कि यहां जरा सी बात पर जान ले लेते हैं गुंडे। अब ये आप पर है कि ये कालिख़ कैसे साफ हो। पुलिसिया तौर तरीकों से हटकर ही कुछ करना होगा। नही तो हमारा ये इंदौर ” गैंग ऑफ वासेपुर” बन जायेगा।*
*आप लोगो को तो कोई फर्क पढ़ना नही। वो और कोई दौर होगा जब की पुलिस और अफसर ऐसे बदमाशो की चुनोतियाँ को, चुनौती के रूप में लेते थे। गुंडों से आन द स्पॉट दो दो हाथ करते थे। उठाकर पटक भी देते थे और उसी इलाके से कॉलर पकड़कर घसीट लाते थे जहां गुंडे की रंगदारी रहती थी। वक्त रहते गोली की भाषा भी समझाई जाती थी। किसी भी नामचीन को इस शहर की पुलिस ने पनपने नही दिया। या तो खुद सबक सिखाया, या प्रतिद्वंद्वी को आगे कर दिया। लेकिन शहर को गैंग आफ वासेपुर नही बनने दिया।*
*ये कोई पुरखो के जमाने की बात नही हैं। ये चंद साल पहले की पुलिसिया दमदारी की दास्तां हैं। तब तो आपके महकमे के पास न इतना अमला था। न इतने संसाधन थे। न “कमिश्नरी” जैसे अधिकार थे। हौसला था। हिम्मत थी। जज्बा था। जुनून था पुलिस की नोकरी का। इज्जत थी वर्दी की। सम्मान था महकमे का। तभी तो इस शहर में कोई गुंडा राज नही कर पाया। एक से बढ़कर एक नामचीन दादा-बहादर, गुंडे-बदमाश हुए लेकिन थाने के एक जवान का भी रुतबा था। बदमाश उसको ही पूरा थाना मानते थे और डरते थे।*
*अब तो पुलिस का जवान तो दूर, पूरे थाने से ही नही डरते। नतीजा सामने हैं। अब गुंडाराज क्यो है? वर्दी का ख़ौफ़ क्यो नही हैं? कहा से आएगा ख़ौफ़? जब राजनीतिक नियुक्तियों की तर्ज पर अफसर से लेकर अमले की पोस्टिंग हो। इस शहर के भले के लिए नही, इस शहर को जितना बन पड़े “निचोड़ने” के लिए। ये सत्ता से प्रश्रय प्राय पोस्टिंग्स गुंडई पर अंकुश के लिए नही, ” मेटर” निपटाने के लिये। नेताओ के पसन्द के सम्बंधित इलाको में नियुक्ति का चलन है अब तो। इस चलन में आप हम ओर ये शहर वर्दी के पुराने रुआबदार चाल चलन तलाशे तो खाली हाथ ही रहना हैं। तभी तो “बिल्लासभर” के बदमाश शहर के साथ साथ इंदौर के पूरे पुलिस तंत्र पर हावी है और पुलिस का ख़ौफ़ ठेंगे पर नही, चाकू की नोक पर रखे घूम रहे हैं।*

