5 हजार साल पुराना एक संप्रदाय जिसके पास दुनिया की सबसे छोटी सर्वेश्वर प्रभु का शालिग्राम की मूर्ति है। इतनी छोटी कि बिना लेंस के आप नहीं देख सकते। महज चार साल की उम्र में ही कुंडली देखकर गद्दी का युवराज चुन लिया जाता है।
मान्यता ये कि इस संप्रदाय के पहले आचार्य ने शाम ढलने के बाद भी नीम के पेड़ पर एक संन्यासी को भगवान सूर्य के दर्शन कराए थे। वह संप्रदाय है निम्बार्क यानी नीम पर सूर्य। आज पंथ में कहानी उसी निम्बार्क संप्रदाय की…
श्रीनिम्बार्कचार्य पीठ का मुख्य प्रवेश द्वार।
सुबह 7 बजे का वक्त। राजस्थान के अजमेर से करीब 50 किलोमीटर दूर सलेमाबाद (अब श्रीनिम्बार्क तीर्थ) जाने के लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट की सुविधा नहीं है। कोविड के बाद से ही यहां बसें बंद हैं। मैं एक निजी वाहन से श्रीनिम्बार्क तीर्थ के लिए निकल जाती हूं।
संकरी सड़क, दोनों तरफ बेर के पेड़ और बकरियों के झुंड। करीब सवा घंटे के सफर के बाद श्रीनिम्बार्क तीर्थ पहुंची।
श्रीनिम्बार्क तीर्थ मंदिर का बड़ा सा भव्य द्वार है, जिसके ऊपर संप्रदाय के प्रतीक चिन्ह यानी सुदर्शन चक्र, शंख और तिलक बने हुए हैं। निम्बार्काचार्य को सुदर्शन चक्र का अवतार माना जाता है। दीवारों पर दोनों तरफ श्रीराधेश्याम लिखा है।
अंदर जाने पर मंदिर किसी बड़ी हवेली जैसा दिखता है। दीवारों पर हाथियों की पेंटिग्स उकेरी गई हैं। एक कतार से तीन मंदिर हैं। पहला मंदिर निम्बार्क परंपरा के आचार्यों का है, फिर राधा-माधव का और उसके बाद सर्वेश्वर भगवान का मंदिर है।
दीवारों पर हाथियों की पेंटिग्स उकेरी गई हैं।
बाएं से दाएं- निम्बार्क संप्रदाय के आचार्यों का मंदिर, राधा माधव मंदिर और श्री सर्वेश्वर मंदिर।
राधा-माधव यानी भगवान का युगल रूप राधा और कृष्ण। निम्बार्क संप्रदाय युगल रूप में ही भगवान की उपासना करता है। इस मंदिर के दरवाजे चांदी के बने हैं। उसके ऊपर भगवान कृष्ण की लीलाएं उकेरी गई हैं।
सोने-चांदी और हीरे से जड़े गहनों से सजे राधा-कृष्ण चांदी के सिंहासन पर विराजमान हैं। राधा जी की मूर्ति खास अष्ट धातु की बनी है। जबकि कृष्ण जी की मूर्ति के बारे में कहा जाता है कि वह स्वयंभू हैं यानी खुद ही प्रकट हुए हैं।
मंदिर के पुजारी नारायणजी इसकी कहानी बताते हैं, ‘मुगलकाल में मंदिरों पर हमले हो रहे थे। तब भगवान कृष्ण की मूर्ति यहां से ले जाकर रूपनगढ़ के किले में रख दी गई। वहां मूर्ति कई महीनों तक रही। जब माहौल ठीक हुआ तो वहां के राजा ने तय किया कि कृष्ण जी बहुत दिन अकेले रह लिए, अब वे राधा जी के साथ ही यहां से जाएंगे।
इसके बाद राधा जी की अष्ट धातु की मूर्ति बनाई गई। बारात निकाली गई। कृष्ण के साथ उनका विवाह कराया गया। इसके बाद फिर से श्रीनिम्बार्क क्षेत्र में दोनों की मूर्ति स्थापित की गई।’
राधा-माधव यानी राधा-कृष्ण की मूर्ति। निम्बार्क संप्रदाय युगल रूप में ही भगवान की उपासना करता है।
राधा-माधव भगवान के ठीक बगल में सर्वेश्वर भगवान का मंदिर है। वे सोने के सिंहासन पर विराजमान हैं। जिन्हें लाल रंग के छोटे पर्दे में रखा गया है। राधा-कृष्ण की युगल मूर्ति के प्रतीक के रूप में सर्वेश्वर शालिग्राम की पूजा होती है।
यहां दुनिया के सबसे छोटी मूर्तियों में से एक भगवान सर्वेश्वर की एक मूर्ति है, जो आधे चने के दाने के बराबर है। इसे गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी शामिल किया गया है।
मंदिर के पुजारी रूई के फाहे पर मूर्ति लेकर बैठे हैं। मैग्नीफाइड ग्लास की मदद से बारी-बारी से भक्तों को सर्वेश्वर भगवान के दर्शन करा रहे हैं। कहते हैं- ‘इनका दर्शन करना सौभाग्य की बात है। किस्मत वालों को ही इनका दर्शन करने को मिलता है।’
भगवान सर्वेश्वर की मूर्ति। इसे लेंस के जरिए ही देखा जा सकता है।
मंदिर में चहल-पहल है, लेकिन बहुत भीड़ नहीं है। मंदिर के पुजारी बताते हैं- ‘यहां भीड़ इतनी होती है कि पैर रखने की भी जगह नहीं होती। अभी मुख्य आचार्य ऑस्ट्रेलिया गए हैं कथा करने के लिए। इसी वजह से लोगों की भीड़ कम है।
वे बताते हैं, ‘हर दिन पांच आरती होती हैं। सुबह 5.30 बजे मंगला आरती होती है। उसके बाद दूध और पंचामृत से अभिषेक किया जाता है। फिर भगवान का श्रृंगार किया जाता है। सुबह माखन-मिश्री का भोग लगता है। इसके बाद सुबह 8.30 बजे श्रृंगार आरती होती है। उसमें हलवा का भोग लगता है।
दोपहर 12 बजे राजभोग आरती लगती है। इसमें पूड़ी, सब्जी और खीर का भोग लगता है। शाम 7 बजे संध्या आरती में फल और मेवे और 8.30 बजे शयन आरती में दूध, पूड़ी, सब्जी और खीर का भोग लगता है। भोग पकाने के लिए सिर्फ कुएं के पानी का ही इस्तेमाल किया जाता है।
थोड़ी आगे बढ़ती हूं, तो संस्कृत के श्लोक कानों में गूंजने लगते हैं। मंदिर परिसर में ही एक संस्कृत विद्यालय है, जहां 9वीं से लेकर ग्रेजुएशन (शास्त्री) तक की पढ़ाई मुफ्त होती है। छात्रों के रहने और खाने की सुविधा भी मुफ्त है।
सभी सफेद रंग के धोती-कुर्ते में छात्र भोजन करने से पहले मंत्रोच्चारण कर रहे हैं। भोजन के दौरान तीन बार मंत्र बोला जाता है।
यहां भोजन छात्रों की देखरेख में ही बनता है। मंदिर में एक विशाल गौशाला भी है। यहां आने वाले भक्तों को गाय की छाछ पिलाई जाती है। जितनी मर्जी उतनी पियो। मैंने भी छाछ का स्वाद लिया।
मंदिर के संस्कृत विद्यालय में छात्रों को पढ़ाते हुए आचार्य।
मंदिर में दर्शन के लिए आईं एक भक्त बताती हैं, ‘हर साल मैं यहां आती हूं। जन्माष्टमी के मौके पर तो आना ही आना होता है, क्योंकि यहां की जन्माष्टमी खास होती है। इसे देखने के लिए विदेशों से भी लोग आते हैं।
सात दिन पहले से ही भव्य रासलीला शुरू हो जाती है। जिसमें बड़े-बड़े कलाकार आते हैं। जन्माष्टमी के दिन शाम में आंगन में एक मलखंब (खंभा) बनाया जाता है। उस पर मुल्तानी मिट्टी की मोटी परत चढ़ा दी जाती है।
लगातार पानी गिराकर उसे फिसलनदार बना दिया जाता है। खंभे के सबसे ऊपर फल, मिठाइयां, दही और खिलौने बांध दिए जाते हैं। इसके बाद यादव परिवार के युवा खंभे पर चढ़ते हैं और बार-बार नीचे फिसल जाते हैं।
आखिर में जो ऊपर चढ़ने में कामयाब होता है, उसे सारे फल, मिठाइयां और खिलौने इनाम के रूप में मिलते हैं। इसी तरह जल कुंड में भी प्रतियोगिता होती है। उसमें आचार्य ऊपर से नारियल फेंकते हैं और युवा तैरकर नारियल इकट्ठा करते हैं।
जन्माष्टमी और राधा अष्टमी पर यहां के पवित्र सरोवर में स्नान किया जाता है। सरोवर के ही पास निम्बार्क संप्रदाय के पूर्व आचार्यों की समाधियां भी हैं। भक्त यहां दीया जला रहे हैं। उनकी मान्यता है कि यहां 108 बार परिक्रमा करने से बीमारियां दूर हो जाती हैं।
मंदिर परिसर में ही सरोवर है। जन्माष्टमी और राधा अष्टमी पर इसमें स्नान किया जाता है। फिलहाल सरोवर में काई जमी है।
शेरशाह सूरी ने बेटे के नाम पर रखा सलेमाबाद नाम
मंदिर के पुजारी नारायण के मुताबिक इस शहर का पुराना नाम श्रीनिम्बार्क क्षेत्र था। 16वीं सदी में सूरी सम्राज्य के राजा शेरशाह सूरी ने इस शहर का नाम सलेमाबाद रखा था। इसको लेकर वे एक किस्सा भी सुनाते हैं-
‘’एक बार शेरशाह यहां मंदिर में आए थे। लोगों के कहने पर उन्होंने तीर्थ के तत्कालीन आचार्य परशुरामदेवाचार्य के दर्शन किए। शेरशाह ने आचार्य को एक महंगी दुशाला भेंट की।
आचार्य ने दुशाला अग्निकुंड में डाल दी। इस पर शेरशाह ने कहा कि इतनी महंगी दुशाला आपने अग्निकुंड में क्यों डाल दी। आचार्य ने मुस्कुराते हुए अग्निकुंड से कई दुशालाएं निकाल दीं। शेरशाह आचार्य के चमत्कार से बहुत प्रभावित हुए।
उन्होंने मंदिर में कलावा बांधा और बेटा होने की मन्नत मांगी। कुछ साल बाद शेरशाह को बेटा हुआ। जिसका नाम सलीम रखा गया। उसी के नाम पर इस शहर का नाम सलेमाबाद हो गया। बाद में इसे फिर से श्रीनिम्बार्क क्षेत्र किया गया।’’
निम्बार्क पीठ की स्थापना की कहानी
पुजारी नारायणजी बताते हैं, ‘श्रीनिम्बार्क क्षेत्र में एक सरोवर है। पहले पुष्कर जाने वाले भक्त यहां स्नान करते थे फिर पुष्कर जाते थे। उन दिनों एक तांत्रिक रास्ते में भक्तों को तंग करता था। परेशान होकर भक्तों ने संप्रदाय के श्री हरिव्यासदेवाचार्यजी महाराज से गुहार लगाई, जो उस वक्त मथुरा में थे।
उन्होंने अपने शिष्य और 36वें आचार्य श्री परशुरामाचार्यजी को इस काम के लिए श्रीनिम्बार्क क्षेत्र भेजा। परशुरामाचार्य जी ने यहां से तांत्रिक को भगाया। फिर वे यहीं बस गए। उन्होंने यहां आचार्य पीठ की स्थापना की। इस तरह यहां अखिल भारतीय श्री निम्बार्काचार्य पीठ की स्थापना हुई।
श्री हरिव्यासादेवाचार्य की प्रतीकात्मक तस्वीर। इन्हीं की प्रेरणा से श्री निम्बार्काचार्य पीठ की स्थापना हुई।
सबसे पहले ब्रह्मा जी ने दिया था उपदेश
वैष्णव संप्रदाय में चार मत हैं। श्री संप्रदाय, ब्रह्म संप्रदाय, रुद्र संप्रदाय और निम्बार्क संप्रदाय। निम्बार्क संप्रदाय की स्थापना निम्बार्काचार्य ने की थी। इसे हंस, सनकादि और देवर्षि संप्रदाय भी कहते हैं। कई विद्वानों का मानना है कि इस संप्रदाय की स्थापना 5 हजार साल पहले हुई थी।
सबसे पहले ब्रह्मा जी ने इसका उपदेश अपने मानस पुत्र सनकादि को दिया। सनकादि ने देवर्षि नारद को उपदेश दिया। इसके बाद देवर्षि नारद ने निम्बार्काचार्य को उपदेश दिया। तब से यह परंपरा चली आ रही है।
निम्बार्काचार्य के जन्म को लेकर भी विद्वानों के अलग-अलग मत हैं। कुछ लोग इनका जन्म 3096 ईसापूर्व मानते हैं, जबकि कुछ विद्वानों का मत है कि इनका जन्म 12वीं सदी में हुआ था। मथुरा में ध्रुव टीले पर इस संप्रदाय का सबसे पुराना मंदिर है।
इन दिनों आचार्यश्री श्रीश्यामशरण देवाचार्यजी महाराज पीठासीन हैं। इनसे ही गुरुमंत्र लिया जाता है। गुरुमंत्र के बाद तुलसी की माला धारण करनी होती है।

