22,000 करोड़ की संपत्ति की नहीं हो सकी खोज
भोपाल। सरकार द्वारा तमाम माफियाओं के खिलाफ जारी मुहिम के बाद अब सूबे के मुखिया शिवराज सिंह चौहान के निशाने पर भले ही सरकारी कर्मचारी और अधिकारी आने वाले हैं, लेकिन ऐसे में यह सवाल बना हुआ है कि क्या शिव उन कर्मचारियों और अफसरों पर भी अपना त्रिनेत्र खोलेंगे, जो लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू में भ्रष्ट्राचार की जांच में दोषी पाए जा चुके हैं। इसके अलावा उन पर भी कार्रवाई का लोगों को इंतजार है जो सरकार को करोड़ों की क्षति पहुंचाकर अब भी मलाईदार मनमाफिक जगहों पर पदस्थ हैं और दोनों हाथों से मलाई को चट कर रहे हैं। ऐसे में लोगों इस दौरान वे कर्मचारी खासतौर पर निशाने पर रहने वाले हैं , जो एक ही जिले में सालों से जमे हुए हैं। इसकी वजह से उनके द्वारा माफियाओं से मजबूत गठजोड़ कर लिया गया है। हालांकि सरकार पर हावी सरकारी तंत्र उनकी इस मुहिम को कितना कारगर बनने देगा अभी यह देखना बाकी है। इसकी वजह है उज्जैन के बाद मुरैना में हुई जहरीली शराब कांड की घटना। दोनों ही मामलों की एसआईटी जांच में साफ हो चुका है कि जहरीली शराब की बिक्री पुलिस एवं आबकारी विभाग की मिलीभगत से होती है। इसके साथ ही यह भी पाया गया है कि सरकारी तंत्र में भी माफिया ने गहरी पकड़ बना ली है। यही वजह है कि अब सरकार अगला सख्त कदम सरकारी अमले को लेकर उठाने की तैयारी कर चुकी है। इसमें जिलों में सालों से जमे पुलिस, आबकारी, खनिज , वन के अलावा राजस्व विभाग के अधिकारी एवं कर्मचारियों को दूसरे जिलों में पदस्थ किया
जाएगा। इसके साथ ही जिनके खिलाफ गंभीर जांचें लंबित है, उन्हें भी दंडित किया जाएगा। इसके संकेत हाल ही में मुख्यमंत्री ने उच्च स्तरीय बैठक में अफसरों को साफतौर पर दे दिए हैं। बैठक में कहा गया कि जिलों में पुलिस, आबकारी एवं वन विभाग के अधिकारी लंबे समय से पदस्थ रहते हैं उनका तबादला होने पर वे कुछ समय बाद फिर अपनी पदस्थापना पुराने ही जिले में करा लेते हैं। ऐसे कर्मचारियों की अवैध शराब, अवैध खनन में पुलिस, आबकारी और वन विभाग के अमले की जमकर मिलीभगत रहती है। यही नहीं कई कर्मचारी और अधिकारी तो ऐसे हैं जो एक ही जिले में एक से लेकर डेढ़ दशक से जमे हुए हैं। ऐसे अमले की माफिया से बेहद मजबूत गठजोड़ रहता है। इसकी वजह से सरकारी सख्ती के बाद भी माफिया पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। मुरैना की घटना से मुख्यमंत्री बेहद नाराज हैं, यहीं वजह है कि वे अब भ्रष्ट अधिकारियों व कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई का मन बना चुके हैं।
प्रावधानों से मिलती है राहत
दरअसल अफसरशाही के दबाब में प्रदेश में कई ऐसे फैसले लिए जा चुके हैं , जिसकी वजह से भ्रष्ट अफसरों व कर्मचारियों पर कार्रवाई होने में न केवल देरी होती है, बल्कि कई मामलों में तो अभियोजन की स्वीकृति तक नहीं मिलने से मामला न्यायालय में ही नहीं जा पाता है। हाल ही में इसी तरह का एक फैसला प्रदेश सरकार ले चुकी है , जिससे सरकारी अमले को पूरा सुरक्षा कवच मिल गया है। लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू के हाथ अब पूरी तरह से बांधे जा चुके हैं। अब किसी भी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी को पूछताछ तक के लिए बुलाने के लिए विभाग से अनुमति अनिवार्य कर दी गई है। इसी तरह से पहले ही चालान पेश करने के लिए अनुमति का प्रावधान किया जा चुका है।
नहीं हो पा रहे चालान पेश
प्रदेश में अकेले लोकायुक्त के ही करीब दो सैकड़ा से अधिक मामले ऐसे हैं, जिनके चालान पेश नहीं हो पा रहे हैं। इसकी वजह है विभागों द्वारा बीते चार सालों से इन मामलों में अनुमति न दी जाना। इस वजह से भ्रष्ट अफसरों व कर्मचारियों की पौ बारह बनी हुई है। इसी तरह के कई मामले ईओडब्ल्यू के भी हैं। इन मामलों में सरकार भी लापरवाह बनी हुई है। अनुमति न मिलने की वजह से होने वाली देरी के चलते कई कर्मचारी तो सेवानिवृत्त तक हो गए हैं, लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं हो सकी है।
यह हैं हालात
प्रदेश में अकेले लोकायुक्त को जिन मामलों में चालान पेश करने हैं, उनकी अनुमति के मामले 23 विभागों में सालों से लंबित चल रहे हैं। कई बार पत्र लिखने के बाद भी चालान पेश करने की अनुमति नहीं दी जा रही है। इनमें सर्वाधिक मामले सामान्य प्रशासन और पंचायत ग्रामीण विकास विभाग में लंबित हैं। इन लंबित मामलों में प्रशासनिक सेवा से लेकर निचले स्तर तक के कर्मचारियों के मामले शामिल हैं।
नहीं किया जाता सेवानिवृत्त
दरअसल हाल ही में बीते दो सालों में अकेले ढाई हजार ऐसे कर्मचारी और अधिकारी सेवानिवृत्त हुए हैं जो लोकायुक्त या फिर ईओडब्ल्यू की जांच में फंसे हुए हैं। इसकी वजह से उनके पेंशन के मामले जरुर अटक गए हैं, लेकिन उन्हें सरकार बर्खास्त करना तो दूर अनिवार्य सेवानिवृत्ति तक नहीं दे सकी है। यही नहीं बीते दो सालों से लगातार विभागों से लेकर कलेक्टरों तक से उन कर्मचारियों की जानकारी मांगी जा रही है जिन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी जा सके उनकी तग जानकारी अफसरशाही सरकार को नहीं दे रही है। इससे समझा जा सकता है कि किस तरह से अफसरों द्वारा सरकार की मंशा को पलीता लगाया जा रहा है।
मध्यप्रदेश की नौकरशाही भ्रष्ट्राचार में दूसरे नंबर पर
केन्द्र सरकार के निशाने पर अब प्रदेश के एक सैकड़ा से अधिक नौकरशाह आने वाले हैं। यह वे अफसर हैं जिनके खिलाफ पीएमओ और डीओपीटी में जांच चल रही है। इस जांच के दायरे में उप्र के 198 नौकरशाहों के बाद मप्र के 137 नौकरशाह हैं। इसकी पुष्टि अभी हाल ही में केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी)ने भी अपनी एक रिपोर्ट में किया है।
सीबीडीटी की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि किस तरह तीन आईएएस अफसरों सुशोभन बनर्जी, संजय माने, वी मधु कुमार और राज्य पुलिस सेवा के अधिकारी अरूण मिश्रा ने हवाला के माध्यम से कालेधन को ठिकाने लगाया है। इन चारों के खिलाफ ईओडब्ल्यू ने केस दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। वहीं मप्र सरकार अन्य अधिकारियों के भ्रष्टाचार की कुंडली खंगाल रही हैमंत्रालयीन सूत्रों का कहना है कि प्रदेश में ऐसी कोई योजना नहीं है जिसका दोहन अफसरों द्वारा नहीं किया जा रहा है। मप्र के 400 से अधिक अधिकारियों-कर्मचारियों के खिलाफ लोकायुक्त में मामला दर्ज है, वहीं 104 लोग ऐसे हैं जिन्हें न्यायालय से भ्रष्टाचार सहित अन्य मामलों में सजा हो चुकी है, लेकिन वे जमानत लेकर नौकरी कर रहे हैं। यही नहीं करीब 207 नौकरशाहों के पैसों से प्रदेश के रीयल एस्टेट, कंस्ट्रक्शन, शिक्षा, चिकित्सा और औद्योगिक संस्थान आबाद हो रहे हैं।
करीब आठ साल पहले मंत्रालय में बंटे एक पर्चे की पड़ताल में यह तथ्य सामने आया था की मप्र के नौकरशाहों ने डीओपीटी को अपनी अचल संपत्ति का ब्यौरा देते हैं उसमें अपनी अधिकांश नामी और बेनामी संपत्ति को छुपा जाते हैं। उस समय अनुमान लगाया गया था कि अफसरों ने करीब 22,000 करोड़ रूपए की संपत्ति का विवरण छुपाया है। इसकी शिकायत पीएमओ और डीओपीटी को भी की गई थी। उस पर्चे के आधार पर वर्ष 2013 में पीएमओ ने जब विभिन्न स्रोतों से इसकी जांच कराई तो यह तथ्य सामने आया कि मप्र के अफसर केंद्र और राज्य सरकार ने विभिन्न योजनाओं के लिए मिलने वाले बजट में जमकर घपलाबाजी कर रहे हैं। ये नौकरशाहों ने अपनी अवैध कमाई का बड़ा हिस्सा खेती, रियल स्टेट, बड़ी-बड़ी कंपनियों और ठेकों में निवेश कर रहे हैं। लेकिन आज 8 साल बाद भी उक्त 22,000 करोड़ रूपए की संपत्ति का अता पता नहीं लग पाया।
नहीं देते संपत्ति का आॅनलाइन ब्यौरा
मप्र में ऐसे अफसरों की तादाद काफी ज्यादा है, जो बार-बार आदेश दिए जाने के बावजूद अपनी संपत्ति का ब्यौरा आॅनलाइन नहीं करते हैं। अब ऐसे अफसरों पर भी शिंकजा कसने की तैयारी कर ली गई है। नियुक्ति एवं कार्मिक विभाग ने मप्र में तैनात सभी आईएएस अफसरों का ब्यौरा मांगा है। सभी आईएएस अफसरों को 31 जनवरी तक अपनी अचल संपत्ति का ब्यौरा आॅनलाइन देने को कहा गया है। हाल में एक संसदीय समिति ने संपत्ति का ब्यौरा नहीं देने वाले आईएएस अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की सिफारिश की थी। जिसके बाद कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग ने अधिकारियों को कई बार रिमाइंडर भेजे थे, लेकिन अधिकारियों के कान पर जूं नहीं रेंगी।
तो तालियां ही नहीं नाचेंगे भी लोग
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान खुद सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि वे जब मंच से कलेक्टर को डांटते हैं तो लोग जमकर तालियां बजाते हैं। अगर भ्रष्टाचारियों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी तो मुख्यमंत्री जी लोग तालियां बजाने के साथ नाचेंगे भी और सरकार के गुण भी गाएंगे।

