इंदौर
वरिष्ठ फोटोग्राफर और पद्मश्री अवार्डी भालू मोंढे को दस साल की लड़ाई के बाद आखिरकार भारतीय नागरिकता वापस मिल गई है। इस नागरिकता के लिए उनकी शासन, प्रशासन के साथ कानूनी लड़ाई दस साल से चल रही थी। इसके लिए मोंढे ने गृह मंत्रालय दिल्ली से लेकर भोपाल गृह विभाग, इंदौर कलेक्टोरेट में पांच सौ से ज्यादा चिट्ठियां लिखीं और जरूरी दस्तावेज बार-बार दिए, करीब नौ किलो वजन की उनकी फाइल यहां से वहां चली आखिर में हाई कोर्ट इंदौर में केस चला और तीन साल की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने शासन और जिला प्रशासन इंदौर को उन्हें नागरिकता सर्टिफिकेट देने का आदेश दिया, जिस पर अब जाकर अमल हुआ है।
मोंढे बताते हैं कि फोटोग्राफी काम के लिए वह 1964 में लंदन चले गए थे, वहां काम बढ़ गया और यूरोप टूर बढ़े तो पांच साल रहने पर लंदन से ब्रिटिश पासपोर्ट और वहां की नागरिकता मिल गई, इसके चलते भारतीय नागरिकता खत्म हो गई और मैंने भारत का पासपोर्ट जमा कर दिया। 1975 के बाद वापस भारत आ गया और काम के लिए यूरोप आना-जाना लगा रहा, लेकिन साल 2010 में मैंने भारतीय नागरिकता वापस लेने का फैसला लिया।
संघर्ष की दास्तां… कलेक्टर चाय पिलाते,नागरिकता की बात टाल देते
जब इंदौर कलेक्टोरेट में चक्कर लगाए तो किसी को यहां पर नियमों की जानकारी ही नहीं थी। मेरे एक मित्र ने मुझे इंदौर में कलेक्टर रह चुके गोपाल रेड्डी जो उस समय गृह मंत्रालय नई दिल्ली में थे, उनसे मिलवाया, उन्होंने मुझे बताया कि भारतीय नागरिक आप रह चुके हैं और यहीं पैदा हुए हैं तो वापस नागरिकता मिल जाएगी। लेकिन मप्र शासन और जिला प्रशासन को नियम बताने के बाद भी लगातार चिट्ठियों का ही दौर चलता रहा और कई बार मेरे भोपाल, दिल्ली के चक्कर लगे। 2010 से सभी कलेक्टर मुझे जानते हैं, चाय भी पिलाते थे, लेकिन बात नागरिकता की आती तो टाल देते।

