अग्नि आलोक

*जातीभंगा में पाकिस्तानी फौज और रजाकारों ने बहाई थी खून की नदियाँ*

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जातीभंगा नरसंहार का इंसाफ आज भी अधूरा,जब लाइन में खड़ा करके किया गया 3500 हिन्दू पुरुषों का नरसंहार, आज तक महिलाओं को नहीं मिला न्याय

बांग्लादेश की आज़ादी की लड़ाई खून-खराबे और अत्याचार की कहानियों से भरी हुई है। पश्चिमी पाकिस्तान (आज का पाकिस्तान) हर हाल में पूर्वी पाकिस्तान (जो बांग्लादेश बना) पर कब्ज़ा बनाए रखना चाहता था। लेकिन जब वहाँ के लोगों ने आवाज़ उठाई तो दमन और हिंसा शुरू हो गई। हालात इतने बिगड़ गए कि करीब एक करोड़ लोग जान बचाकर भारत भागे। इससे भारत में भारी शरणार्थी संकट पैदा हो गया। आखिरकार, भारत को दख़ल देना पड़ा और बांग्लादेश को आज़ादी की राह दिखाई।

इसके बावजूद, पाकिस्तानी हुकूमत ने 1971 में बांग्लादेश की आज़ादी की माँग करने वालों पर बेरहमी से कहर बरपाया। खासतौर पर हिंदू समुदाय को दोहरे अपराध की सजा दी गई। पहली उनकी आज़ादी की माँग और दूसरा उनका गैर-मुस्लिम होना। पाकिस्तानी सेना और उनके कट्टरपंथी सहयोगियों ने हिंदुओं को निशाना बनाकर भयानक कत्लेआम किया। ऐसा ही एक दिल दहला देने वाला नरसंहार आज से करीब 54 साल पहले हुआ। 23 अप्रैल, 1971 को ठाकुरगाँव जिले के जातीभंगा (अब विधापल्ली) गाँव में।

1971 में भारत आ रहे बांग्लादेशी शरणार्थी। (साभार : Harvard Internation Review)Indian Cuisine

जातीभंगा में क्या हुआ था ?

26 मार्च, 1971 को शेख मुजीबुर रहमान ने पाकिस्तान से बांग्लादेश की आज़ादी का ऐलान कर दिया। इसी के साथ आज़ादी की लड़ाई शुरू हो गई। लेकिन, इसके बाद हालात और भी भयानक हो गए। पाकिस्तानी सेना ने रज़ाकार, अल-बदर और अल-शम्स जैसे कट्टरपंथी संगठनों के साथ मिलकर निर्दोष लोगों पर जुल्म ढाना शुरू कर दिया। जो भी आज़ादी चाहता था उसे बेरहमी से मारा जाने लगा।

इसी डर से ठाकुगाँव जिले के बालिया, शुखनपुकुरी, जगन्नाथपुर, चकहाल्दी, सिंगिया, चांदीपुर, बसुदेवपुर, मिलनपुर, गौरीपुर, खमार भोला, पलाशबाड़ी और देविग जैसे कई गाँवों के हज़ारों हिंदू परिवार अपनी जान बचाकर महिलाओं और बच्चों के साथ भारत भागने लगे।

23 अप्रैल की सुबह, इन्हीं गाँवों के सैकड़ों लोग जातीभंगा में इकट्ठा हुए थे ताकि वहाँ से आगे भारत की ओर निकल सकें। लेकिन एक स्थानीय गद्दार ने पाकिस्तानी सेना को इसकी खबर दे दी। सेना दो ट्रकों में वहाँ पहुँच गई। हिंदू पुरुषों को लाइन में खड़ा किया गया और फिर मशीनगनों से ताबड़तोड़ गोलियाँ बरसाईं गईं। कुछ को धारदार हथियार से मारा गया। ये कत्लेआम सुबह से शुरू होकर दोपहर तक चला।

इसमें करीब 3500 मासूम लोगों की जानें गईं। सैकड़ों औरतें विधवा हो गईं। इसके बाद शवों को पास की पथराज नदी में फेंका गया। काफी शवों को ज़मीन में गड्ढा खोदकर एक साथ दफना दिया गया। उस दिन की खून की नदियाँ आज भी जातीभंगा की मिट्टी में दर्ज हैं। इसके बाद ठाकुरगाँव जिले का ये नरसंहार बांग्लादेश की आज़ादी की लड़ाई का सबसे दर्दनाक और बड़ा कत्लेआम बन गया।

जातीभंगा नरसंहार का इंसाफ आज भी अधूरा

जातीभंगा नरसंहार इतिहास के काले पन्ने में दर्ज हो गया। 2009 में बांग्लादेश सरकार ने जातीभंगा नरसंहार की जगह पर एक स्मारक बनवाया। यह उस दर्दनाक दिन की याद में किया गया। जब सैकड़ों बेगुनाहों की ज़िंदगी छीन ली गई थी। इसके बाद 2011 में पीड़ितों और बचे हुए लोगों ने मिलकर एक शोक रैली निकाली। कुछ समय बाद मरने वालों की याद में एक श्रद्धांजलि सभा रखी गई, जिसमें लोगों ने खुलकर अपनी आवाज़ उठाई। उन्होंने माँग की कि उन दरिंदों को सज़ा दी जाए, जिन्होंने यह खूनी खेल रचा था।

सरकार ने उसी साल अगस्त में 89 विधवाओं को 2 हज़ार टका की एकमुश्त सहायता प्रदान की। ठाकुरगाँव सदर उपजिला के अधिकारी तौहीदुल इस्लाम ने आश्वासन दिया था कि आगे चलकर जातीभंगा गाँव की 500 विधवाओं को इस योजना में शामिल किया जाएगा। लेकिन दुख की बात ये है कि इतने सालों बाद भी इंसाफ अधूरा है।

2014 में ठाकुरगाँव के जगन्नाथपुर गाँव में जब जातीभंगा नरसंहार दिवस मनाया गया तो वहाँ दर्द और गुस्से की लहर फिर उमड़ पड़ी। ‘जातीभंगा गणहत्यादिबश पालन समिति’ ने शोक यात्रा निकाली, जिसमें सैकड़ों महिलाएँ शामिल हुईं। ये वो औरतें थीं, जिन्होंने उस दिन अपने पति, पिता या भाई खो दिए थे। हर कोई एक आवाज़ में माँग कर रहा था, “जिन्होंने इतने लोगों की जान ली उन्हें सज़ा मिलनी चाहिए। अब और इंतज़ार नहीं। न्याय होना चाहिए और सबके सामने होना चाहिए।”

23 अप्रैल, 1971 को पाकिस्तानी सेना और उनके स्थानीय सहयोगियों के हाथों अपने पतियों की क्रूर हत्या से विधवा हुई महिलाएँ, जातीभंगा नरसंहार दिवस की याद में ठाकुरगाँव सदर उपजिला के जगन्नाथपुर में शोक जुलूस में शामिल हुईं (साभार : The Daily Star

कत्लेआम के चश्मदीदों का दर्द

इस सभा में प्रत्यक्षदर्शी धनी चरण ने नरसंहार की खौफनाक यादें साझा करते हुए बताया, “हम भारत भागना चाहते थे क्योंकि वहाँ रहना अब सुरक्षित नहीं था। जब हम जातीभंगा पहुँचे तो सूरज ढल चुका था। हमने सोचा रात यहीं रुक जाते हैं और सुबह आगे निकलेंगे। लेकिन रज़ाकारों ने हमारी खबर पाकिस्तानी फौज को दे दी। इसके बाद पाकिस्तानी सैनिक आए और चारों तरफ से घेर लिया। फिर पुरुषों को लाइन में खड़ा कराया गया और उन्हें गोलियों से भून दिया गया। करीब 3 हज़ार लोगों को उसी दिन मौत के घाट उतार दिया गया।”

अन्य महिलाएंँ जिन्होंने नरसंहार होते हुए देखा, वो आज भी उस दिन को याद कर काँप उठती हैं। इनमें पबनशोरी, गोठन बाला और रोशनी रानी जैसी कई महिलाओं के नाम शामिल हैं। ये केवल एक घटना नहीं थी। 25 मार्च, 1971 को ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ के नाम पर पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में हजारों बेकसूर बंगालियों की हत्या की थी। इस नरसंहार में पीस कमेटी, रज़ाकार, अल-बद्र और अल-शम्स जैसे संगठनों की भूमिका भी थी।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता नहीं मिली

संयुक्त राष्ट्र की नरसंहार परिभाषा के अनुसार, 1971 की ये घटनाएँ साफतौर पर जनसंहार की श्रेणी में आती हैं लेकिन अब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार नहीं किया गया है। ये घटनाएँ सिर्फ इतिहास नहीं हैं। बल्कि ये गवाही हैं उस जुल्म, अत्याचार और नफरत की जो पाकिस्तान और उसके इस्लामी चरमपंथियों ने बांग्लादेश के लोगों जिनमें खासकर हिंदू समुदाय पर ढाए हैं।

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