एस पी मित्तल,अजमेर
29 सितंबर को दिल्ली में जब कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात हुई तो राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने आंखों से आंसू टपकाते हुए माफी मांगी। गहलोत ने सोनिया से कहा कि मुख्यमंत्री चुनने में कांग्रेस की परंपरा को उन्हीं ने तोड़ा है। यह उनकी नाकामी है कि 25 सितंबर को जयपुर में वे कांग्रेस विधायक दल की बैठक में हाईकमान पर निर्णय वाला एक लाइन का प्रस्ताव पास नहीं करवा सके। चूंकि उन्होंने कांग्रेस की परंपरा को तोड़ा है, इसलिए कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने का उन्हें नैतिक अधिकार नहीं है। ऐसी परिस्थितियों में वे मुख्यमंत्री पद पर भी नहीं रहना चाहते हैं। उन्हें यह पसंद नहीं कि लोग उन्हें सत्ता का लालची नेता कहें। 25 सितंबर को गहलोत ने जयपुर में जिस प्रकार केंद्रीय पर्यवेक्षकों को बेइज्जत करवाया, उसमें गहलोत का सोनिया गांधी के सामने आंसू बहाना लाजमी था, लेकिन अब लाख टके का सवाल है कि क्या अशोक गहलोत, सचिन पायलट से माफी मांगेंगे? गहलोत के इशारे पर ही मंत्री शांति धारीवाल, महेश जोशी, प्रताप सिंह खाचरियावास, धर्मेन्द्र राठौड़ आदि ने पायलट को अपशब्द कहे। ऐसा तब कहा गया, जब सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाना चाहते हैं। एक तरह से इन मंत्रियों ने गांधी परिवार के खिलाफ ही बगावत की। सचिन पायलट को भी पता है कि गहलोत के समर्थन के बगैर मुख्यमंत्री बनना संभव नहीं है। इसलिए अब गहलोत को बताना चाहिए कि क्या वे पायलट को मुख्यमंत्री बनवाएंगे? जहां तक माफी मांगने का सवाल है तो पायलट भी चाहेंगे कि गहलोत उनसे माफी मांगे। पायलट पहले गहलोत को अपने पिता के समान बता चुके हैं। कांग्रेस के राजनीतिक क्षेत्रों में चर्चा है कि गांधी परिवार अशोक गहलोत की माफी तभी स्वीकार करेगा, जब गहलोत, पायलट को मुख्यमंत्री बनवाएंगे। गहलोत के समर्थक आज पायलट को गद्दार बता रहे हैं, लेकिन गांधी परिवार जनता है कि पायलट के समर्थन की वजह से ही गहलोत चार वर्ष तक मुख्यमंत्री रह पाएं। पिछले तीनों राज्यसभा चुनाव में तीनों सीटें भी पायलट के समर्थन से कांग्रेस को मिल पाई। भले ही श्रेय गहलोत ने खुद लिया हो। इतना ही नहीं 2018 के विधानसभा चुनाव में भी पायलट के प्रभाव के कारण भाजपा का एक भी गुर्जर उम्मीदवार चुनाव नहीं जीत सका। धारीवाल, खाचरियावास, महेश जोशी, धर्मेन्द्र राठौड़ जैसे सत्ता की मलाई खाने वाले नेता आज भले ही पायलट को गद्दार कहें, लेकिन गांधी परिवार को पता है कि अगले वर्ष होने वाला चुनाव सचिन पायलट के सहयोग के बगैर नहीं जीता जा सकता, क्योंकि गहलोत के मुख्यमंत्री रहते कांग्रेस कभी भी चुनाव नहीं जीती है। 2013 में तो कांग्रेस को मात्र 21 सीटें ही मिलीं। भाजपा शासन में पायलट को प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया। पायलट और उनकी टीम ने पांच वर्ष तक संघर्ष किया। उसी का परिणाम रहा कि कांग्रेस को बहुमत मिला, लेकिन तब गांधी परिवार में सोनिया गांधी ने अपने वीटो का इस्तेमाल कर गहलोत को मुख्यमंत्री बनवा दिया। अब जब गहलोत को कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनवाकर पायलट को मुख्यमंत्री बनाने का प्रयास किया तो गहलोत ने खुली बगावत कर दी है। बदली हुई परिस्थितियों में गांधी परिवार में सचिन पायलट की मजबूत स्थिति है। ऐसे में सवाल उठता है कि धारीवाल, जोशी, खाचरियावास, परसादी लाल मीणा जैसे नेताओं का क्या होगा? मुख्यमंत्री बदलते ही धर्मेन्द्र राठौड़ तो आरटीडीसी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ेगा।

