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*महाराष्ट्र में पायरोलिसिस संयंत्रों से  आदिवासी गांवों में जीवन जीने का संकट*

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शाम होते ही एक नीले रंग के बहुत बड़े से टीन शेड से सटी हुई ऊंची सी चिमनी से धुआं निकलना शुरू हो जाता है. यह धुआं मुरबीचापाड़ा नाम के आदिवासी गांव की तरफ उड़ रहा है. शेड के लगभग 10-15 मीटर दूर लगी हुई घास और पेड़ों पर कालिख छाई हुई है. साथ ही रबर के जलने की तेज़ बदबू भी हवा में फैली है. सिर्फ कुछ पल वहां ठहरने से ही गले में जलन महसूस होने लगती है. 

मुरबीचापाड़ा एक छोटा सा आदिवासी गांव है, जो महाराष्ट्र के पालघर जिले में है. 

अपने गांव की ओर इशारा करते हुए 46 वर्षीय वंदना हडाल कहती हैं, “पूरे दिन जलते हुए टायरों की बू हवा में तैरती रहती है.”

वह कहती हैं, “छोटे-छोटे बच्चे बीमार पड़ जाते हैं, कपड़े और बर्तन तक काले हो जाते हैं. खेतों में इतनी मोटी कालिख जम जाती है कि ठीक से खाना तक नहीं खा पाते हम.”

यही हकीकत है वाडा तहसील के इर्द-गिर्द बसे कई गांवों की, जहां तकरीबन 45 पाइरोलिसिस प्लांट्स आदिवासी बस्तियों के बिलकुल करीब चलते हैं. पाइरोलिसिस प्लांट वो औद्योगिक इकाइयां होती हैं, जहां बेकार टायरों को तकरीबन 500 डिग्री सेल्सियस तक गर्म किया जाता है ताकि उनमें से स्टील, तेल और कार्बन निकाला जा सके, इसे ही ‘पाइरोलिसिस’ कहा जाता है.

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