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सऊदी अरब और अमेरिका के रिश्तों में दरार:रूस की ओर झुक रहा सऊदी अरब!

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सऊदी अरब अब खुलकर अमेर‍िका को जवाब देने लगा है. उधर-रूस बचाव में उतर आया है

ईरान जंग ने कुछ ऐसा कर द‍िया है, जिसने दशकों पुराने गठबंधनों की नींव हिला कर रख दी है. वाशिंगटन को उम्मीद थी कि इस युद्ध में उसका अस्सी साल पुराना और सबसे भरोसेमंद खाड़ी सहयोगी सऊदी अरब, आंख मूंदकर उसके साथ खड़ा होगा. लेकिन रियाद के रुख ने व्हाइट हाउस और कैपिटल हिल में बेचैनी पैदा कर दी है. अमेरिकी नेता धमकी देने लगे हैं.ज‍िस का सऊदी भी जवाब दे रहा है. रही सही कसर रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के बयानों ने पूरी कर दी है. यह सबकुछ स्पष्ट रूप से इशारा कर रहा है कि सऊदी का झुकाव अब रूस की ओर हो रहा है और वह अब खाड़ी देश अमेरिका की उंगलियों पर नाचने को तैयार नहीं हैं.

अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने खुलेआम सऊदी अरब की वफादारी पर सवाल उठा दिए हैं. ग्राहम ने बेहद तल्ख लहजे में पूछा कि अगर सऊदी ईरान के खिलाफ युद्ध में भाग लेने के लिए तैयार नहीं है, तो अमेरिका को उसके साथ ड‍िफेंस डील क्‍यों करनी चाह‍िए. ग्राहम की हताशा इस बात से झलकती है कि अमेरिका इस क्षेत्र में ईरान के खिलाफ अभियानों पर अरबों डॉलर फूंक रहा है, उसके नागरिक मारे जा रहे हैं, लेकिन सऊदी अरब सैन्य कार्रवाई से पूरी तरह बच रहा है. ग्राहम का कहना है कि जब यह युद्ध खाड़ी देशों के दरवाजे तक पहुंच चुका है, तो वे केवल पर्दे के पीछे रहकर सऊदी अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता. इसका नतीजा गंभीर होगा.

क्‍यों गुस्‍से से लाल हुआ सऊदी अरब

किन लिंडसे ग्राहम की इस धमकी ने सऊदी अरब में एक ऐसा उबाल ला दिया, जिसकी उम्मीद शायद वाशिंगटन ने नहीं की होगी. सऊदी अरब के अधिकारियों और आम जनता ने स्पष्ट कर दिया है कि वे अमेरिका के थोपे गए युद्ध का ईंधन नहीं बनेंगे. न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र में सऊदी अरब के मिशन के अटैची सऊद बिन सलमान अल-दोसारी ने करारा जवाब देते हुए कहा कि साझेदारी साझा जिम्मेदारी और सम्मान पर आधारित होती है, और रियाद कोई क‍िसी का गुलाम नहीं है. वह फैसले लेने के ल‍िए आजाद है. सऊदी अरब अपने हितों को सर्वोपरि रखता है और जब भी सैन्य कार्रवाई का फैसला होगा, वह रियाद का अपना फैसला होगा, किसी और के इशारे पर नहीं.

आग तुमने लगाई तो हम क्‍यों जलें

सऊदी अवाम का गुस्सा सोशल मीडिया पर साफ फूट पड़ा है. सऊदी नागरिकों ने ग्राहम को याद दिलाया कि यह युद्ध अमेरिका और इजरायल ने शुरू किया है और इसका खामियाजा खाड़ी देश क्यों भुगतें. लोगों ने 2019 के अरामको हमलों का हवाला देते हुए अमेरिका की उस बेवफाई को उजागर किया जब सऊदी अरब के तेल ठिकानों पर हमले के बावजूद वाशिंगटन ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया था. सऊदी जनता का सीधा सवाल है कि जो अमेरिका अपने सहयोगियों को अकेला छोड़ देता है, उसके लिए खाड़ी देश अपना घर क्यों जलाएं.

चतुराई के साथ कूदा रूस

वाशिंगटन और रियाद के बीच बढ़ती इस दरार के बीच रूस ने बेहद चतुराई से कदम रखा है. रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के बयान इस बात की पुष्टि करते हैं कि मास्को इस खालीपन को भरने के लिए पूरी तरह तैयार है. लावरोव ने सऊदी अरब को अपना रणनीतिक साझेदार और विश्वसनीय मित्र करार दे दिया. उन्होंने पश्चिमी देशों पर आरोप लगाया कि अमेरिका और इजरायल का मुख्य उद्देश्य सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों को युद्ध में घसीटना है ताकि सऊदी-ईरान के बीच हाल ही में सामान्य हुए संबंधों को फिर से बिगाड़ा जा सके. लावरोव ने सऊदी अरब की कूटनीतिक परिपक्वता की जमकर तारीफ की और कहा कि रियाद ने हमेशा शांति और राजनीतिक समाधान का रास्ता चुना है. रूस और सऊदी अरब दोनों एक सुर में तत्काल युद्धविराम और नागरिक बुनियादी ढांचे पर हमले रोकने की मांग कर रहे हैं. लावरोव का यह समर्थन सऊदी अरब के उस रुख को अंतरराष्ट्रीय वैधता प्रदान करता है जिसमें वह खुद को इस विनाशकारी युद्ध से दूर रखना चाहता है.

जंग में सऊदी के न कूदने की वजह

सऊदी अरब का यह रुख केवल ईरान के डर से नहीं है, बल्कि यह एक सोची-समझी राष्ट्रीय रणनीति का हिस्सा है. वाशिंगटन स्थित नीति विश्लेषक ताकी नासिरात के अनुसार, सऊदी अरब ने इस युद्ध की शुरुआत नहीं की है और वह अपनी अर्थव्यवस्था और पर्यटन को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित करना चाहता है. सऊदी अरब अमेरिकी सुरक्षा गारंटी पर गंभीर संदेह कर रहा है. सऊदी अरब ने अमेरिका को राजनयिक समर्थन और खरबों डॉलर का निवेश इस उम्मीद में दिया था कि संकट के समय अमेरिका उसकी ढाल बनेगा, न कि उसे ही आग में कूदने के लिए मजबूर करेगा.

सऊदी अरब और रूस के बीच बढ़ती नजदीकी में ‘ओपेक प्लस’ की क्या भूमिका है?

सऊदी अरब और रूस विश्व के दो सबसे बड़े तेल उत्पादक देश हैं और दोनों ‘ओपेक प्लस’ गठबंधन का नेतृत्व करते हैं. पिछले कुछ वर्षों में, दोनों देशों ने वैश्विक तेल बाजार में कीमतों को स्थिर रखने के लिए अक्सर अमेरिका की इच्छा के विरुद्ध जाकर एक साथ तेल उत्पादन में कटौती की है. उदाहरण के लिए, 2022 और 2023 में जब अमेरिका ने तेल उत्पादन बढ़ाने का भारी दबाव डाला था, तब भी सऊदी अरब ने रूस के साथ मिलकर उत्पादन में कटौती का फैसला किया था, जिसने दोनों देशों के बीच मजबूत आर्थिक विश्वास की नींव रखी.

ऐसा क्या हुआ जिसने सऊदी अरब के विश्वास को कमजोर किया?

सऊदी अरब के अमेरिका पर अविश्वास का एक बड़ा कारण 2021 में जो बाइडन प्रशासन का वह फैसला था, जब यमन युद्ध में मानवाधिकारों के उल्लंघन का हवाला देते हुए अमेरिका ने सऊदी अरब को सटीक मार करने वाले हथियारों और अन्य आक्रामक हथियारों की बिक्री पर रोक लगा दी थी. अमेरिका की इस अस्थिर नीति ने सऊदी अरब को यह अहसास कराया कि संकट के समय वाशिंगटन पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहा जा सकता, जिससे रियाद ने रूस और चीन जैसे वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं की ओर देखना शुरू किया.

सऊदी अरब का ‘विजन 2030’ इस युद्ध से दूरी बनाने का सबसे बड़ा कारण क्यों माना जा रहा है?

क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का ‘विजन 2030’ सऊदी अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से मुक्त कर एक वैश्विक निवेश और पर्यटन हब बनाने की एक अति-महत्वाकांक्षी योजना है. इसके तहत ‘नियोम’ (NEOM) जैसी ट्रिलियन डॉलर की फ्यूचरिस्टिक सिटी बनाई जा रही है. किसी भी क्षेत्रीय युद्ध में शामिल होने का मतलब है इन विदेशी निवेशों का रुक जाना और बुनियादी ढांचे का तबाह होना. रियाद किसी भी कीमत पर अपनी इस आर्थिक क्रांति को युद्ध की भेंट नहीं चढ़ाना चाहता.

सऊदी अरब और ईरान के बीच शांति समझौते में चीन का क्या ऐतिहासिक योगदान था?

अमेरिका की मध्य पूर्व में कमजोर होती पकड़ का सबसे बड़ा प्रमाण मार्च 2023 में देखने को मिला था, जब चीन की मध्यस्थता में सऊदी अरब और ईरान ने बीजिंग में एक ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर कर सात साल बाद अपने राजनयिक संबंध बहाल किए थे. अमेरिका को इस पूरी प्रक्रिया से बाहर रखा गया था. यही वह शांति समझौता है जिसका जिक्र लावरोव कर रहे हैं और जिसे बचाने के लिए सऊदी अरब वर्तमान युद्ध से खुद को दूर रख रहा है.

BRICS में सऊदी अरब की एंट्री का वाशिंगटन-रियाद संबंधों पर क्या रणनीतिक असर पड़ा है?

अगस्त 2023 में रूस और चीन के नेतृत्व वाले ब्रिक्स (BRICS) समूह में शामिल होने का निमंत्रण स्वीकार कर सऊदी अरब ने पश्चिमी देशों को एक कड़ा संदेश दिया था. ब्रिक्स में सऊदी अरब की मौजूदगी यह दर्शाती है कि वह अब पश्चिमी-वर्चस्व वाली वैश्विक वित्तीय प्रणाली (जैसे G7) से परे जाकर एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का हिस्सा बन रहा है. यह कदम सीधे तौर पर मास्को और बीजिंग के साथ रियाद के बढ़ते रणनीतिक तालमेल को पुख्ता करता है, जो अमेरिका के लिए एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती है.

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