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पांचों चुनावी राज्यों में पश्चिम बंगाल को सबसे अहम मानता है संघ परिवार

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भाजपा ने इस बार आक्रामक चुनावी रणनीति अपनाई

पांच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों के बीच पश्चिम बंगाल एक बार फिर राजनीतिक और वैचारिक टकराव का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभर रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा, दोनों ही इस चुनाव को सिर्फ सत्ता परिवर्तन का अवसर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और वैचारिक प्रभाव के विस्तार के रूप में देख रहे हैं। यही वजह है कि भाजपा ने इस बार शुरुआत से ही आक्रामक रणनीति अपनाते हुए टीएमसी से पहले 144 उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी और ममता बनर्जी को सीधी चुनौती देने के लिए शुभेंदु अधिकारी को भवानीपुर और नंदीग्राम जैसे अहम क्षेत्रों से मैदान में उतार दिया।

दूसरी ओर, ममता बनर्जी की राजनीति इस बार बंगाली अस्मिता और क्षेत्रीय राष्ट्रवाद के इर्द-गिर्द सिमटती नजर आ रही है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या यह चुनाव केवल राज्य की सत्ता का संघर्ष है या फिर इसके पीछे राष्ट्रीय राजनीति और सुरक्षा से जुड़ा बड़ा संदेश छिपा हुआ है। पश्चिम बंगाल के चुनाव के संदर्भ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की हाल ही में संपन्न अखिल भारतीय कार्यकारिणी की समलखा बैठक में पश्चिम बंगाल के चुनाव के संबंध में महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए हैं। दरअसल,यह चुनाव केवल सरकार बनाने या बदलने का मामला नहीं रह गया है, बल्कि इसके पीछे वैचारिक टकराव, सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे व्यापक मुद्दे भी जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी इस चुनाव को विशेष महत्व दे रहे हैं और इसे पूर्वी भारत में अपनी वैचारिक पकड़ मजबूत करने का सुनहरा अवसर मान रहे हैं।

टीएमसी के पहले घोषित किए भाजपा ने उम्मीदवार

भाजपा ने इस बार अपनी चुनावी रणनीति में स्पष्ट आक्रामकता दिखाई है। आमतौर पर जहां राजनीतिक दल चरणबद्ध तरीके से उम्मीदवारों की घोषणा करते हैं, वहीं भाजपा ने टीएमसी से पहले ही 144 उम्मीदवारों की सूची जारी कर यह संकेत दे दिया कि वह इस चुनाव को लेकर पूरी तरह तैयार और आत्मविश्वास से भरी हुई है। यह कदम केवल संगठनात्मक मजबूती का प्रदर्शन नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की रणनीति भी माना जा रहा है। इसके साथ ही शुभेंदु अधिकारी को भवानीपुर और नंदीग्राम जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों से मैदान में उतारकर भाजपा ने सीधे ममता बनर्जी को चुनौती देने की कोशिश की है। नंदीग्राम, जहां से ममता बनर्जी ने अपने राजनीतिक करियर का बड़ा मोड़ लिया था, वहीं अब उनके खिलाफ उसी क्षेत्र में मजबूत प्रतिद्वंद्वी खड़ा करना भाजपा की रणनीतिक चाल है।
हालांकि ममता बनर्जी ने रक्षात्मक रणनीति अपनाते हुए केवल भवानीपुर से लड़ने का फैसला किया है। ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस इस बार अपेक्षाकृत डरी हुई नजर आ रही है। उनकी राजनीति का केंद्र इस बार भी बंगाली अस्मिता और बांग्ला उप-राष्ट्रवाद पर टिका हुआ है। हालांकि यह मुद्दा बंगाल की राजनीति में हमेशा प्रभावी रहा है, लेकिन बदलते राजनीतिक परिदृश्य में यह सवाल उठ रहा है कि क्या केवल क्षेत्रीय पहचान के आधार पर चुनावी नैरेटिव को लंबे समय तक बनाए रखा जा सकता है। भाजपा लगातार इस नैरेटिव को चुनौती देते हुए विकास, भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठा रही है।
संघ परिवार के लिए पश्चिम बंगाल का चुनाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण इसलिए भी है क्योंकि यह राज्य लंबे समय तक वामपंथी विचारधारा का गढ़ रहा है और अब तृणमूल कांग्रेस के प्रभाव में है। ऐसे में संघ इसे वैचारिक विस्तार के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर के रूप में देख रहा है।

समलखा बैठक में लिए गए महत्वपूर्ण निर्णय

हाल ही में हरियाणा के समलखा में संपन्न संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी की बैठक में भी पश्चिम बंगाल के चुनाव को लेकर विशेष चर्चा हुई और इसे राष्ट्रीय दृष्टि से महत्वपूर्ण माना गया। संघ का मानना है कि बंगाल की भौगोलिक स्थिति, बांग्लादेश से लगती सीमा और वहां की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियां इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से भी संवेदनशील बनाती हैं।
यही कारण है कि भाजपा इस चुनाव को केवल एक राज्य की सत्ता तक सीमित नहीं रख रही, बल्कि इसे राष्ट्रीय मुद्दों से जोड़ने की कोशिश कर रही है। सीमा पार से घुसपैठ, सांप्रदायिक तनाव और राजनीतिक हिंसा जैसे मुद्दे भाजपा के प्रचार का अहम हिस्सा बन चुके हैं। वहीं, टीएमसी इन आरोपों को खारिज करते हुए भाजपा पर बाहरी हस्तक्षेप और बंगाल की संस्कृति को कमजोर करने का आरोप लगा रही है।

इस बार सबसे दिलचस्प रहेगा बंगाल का चुनाव

इस पूरे राजनीतिक परिदृश्य में यह स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल का चुनाव इस बार बहुआयामी संघर्ष बन चुका है। एक ओर भाजपा और संघ परिवार इसे वैचारिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से देख रहे हैं, तो दूसरी ओर ममता बनर्जी इसे बंगाली अस्मिता और क्षेत्रीय स्वाभिमान की लड़ाई के रूप में प्रस्तुत कर रही हैं। यही टकराव इस चुनाव को और अधिक दिलचस्प और निर्णायक बना देता है। सवाल यही है कि क्या भाजपा अपनी आक्रामक रणनीति और राष्ट्रीय मुद्दों के सहारे बंगाल में नई जमीन तैयार कर पाएगी, या फिर ममता बनर्जी एक बार फिर क्षेत्रीय पहचान और अपने राजनीतिक अनुभव के दम पर सत्ता को बरकरार रखेंगी। जो भी परिणाम होगा, उसका प्रभाव केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी तय करेगा।

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