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*सरदार पटेल के बड़े भाई विट्टलभाई… जिनकी निष्पक्षता के विरोधी भी थे कायल*

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सरदार वल्लभभाई पटेल के बड़े भाई विट्ठलभाई झावेरीभाई पटेल

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास सड़कों पर हुए जन-आंदोलनों, क्रांतिकारी घटनाओं और ब्रिटिश शासन के खिलाफ खड़े हुए जन-नायकों की गाथा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन संस्थागत प्रयासों का भी दस्तावेज है जिनके माध्यम से भारत में लोकतांत्रिक मूल्यों की नींव रखी गई। इस इतिहास के पन्नों में एक ऐसा नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज है, जिसने न केवल स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई बल्कि उस समय की सबसे बड़ी संवैधानिक संस्था के संचालन की गरिमा और आदर्श स्थापित किए। वह नाम है विट्ठलभाई झावेरीभाई पटेल।

प्रेरणादायी शख्सियत: वह भारत की पहली निर्वाचित केंद्रीय विधानसभा के अध्यक्ष बने और उन्होंने अपनी कार्यशैली, निष्पक्षता और दूरदर्शिता से भारतीय संसदीय परंपरा को ऐसा आकार दिया, जो आज भी प्रेरणा का स्रोत है। 27 सितंबर 1873 को गुजरात के आनंद जिले के करमसद नगर में जनमे विट्ठलभाई पटेल एक साधारण कृषक परिवार से थे। विट्ठलभाई के छोटे भाई सरदार वल्लभभाई पटेल आगे चलकर भारत के लौहपुरुष के रूप में विख्यात हुए, लेकिन विट्ठलभाई का व्यक्तित्व और योगदान अपने आप में अद्वितीय और स्वतंत्र महत्व रखता है।

लंदन से बार-एट-लॉ: युवावस्था में ही उन्हें कानून के अध्ययन में गहरी रुचि हो गई। इसी उत्साह ने उन्हें इंग्लैंड जाने के लिए प्रेरित किया, जहां उन्होंने लंदन के प्रतिष्ठित मिडल टेंपल से ‘बार-एट-लॉ’ की डिग्री प्राप्त की। भारत लौटकर विट्ठलभाई पटेल ने बंबई हाईकोर्ट में वकालत शुरू की। लेकिन विट्ठलभाई का मन केवल पेशेवर सफलता तक सीमित नहीं रहा।

कैसे बदली सोच: 1910 में उनकी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत हुई, जब वे बंबई विधान परिषद के सदस्य बने। 1910 और 1920 का दशक भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का निर्णायक काल था। विट्ठलभाई पटेल प्रारंभ में उदारवादी दृष्टिकोण के समर्थक रहे, लेकिन जालियांवाला बाग हत्याकांड और रॉलेट एक्ट जैसी घटनाओं ने उनके दृष्टिकोण को अधिक उग्र और राष्ट्रीय आंदोलन के निकट बना दिया।

वैधानिक तरीकों से विरोध: 1923 में उन्होंने स्वराज पार्टी का दामन थामा। यह पार्टी चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू के नेतृत्व में ब्रिटिश सरकार की नीतियों का वैधानिक मंचों पर विरोध करने के लिए बनी थी। स्वराज पार्टी की नीति यह थी कि विधान परिषदों में जाकर अंग्रेजी शासन के प्रशासनिक कार्यों को बाधित करेंगे, सवाल उठाएंगे, बहस करेंगे और इस तरह भारतीय जनता के अधिकारों की आवाज बुलंद करेंगे।

निष्पक्षता की धाक: 1925 में उनके जीवन का वह ऐतिहासिक क्षण आया, जब वह भारत की पहली निर्वाचित केंद्रीय विधानसभा के अध्यक्ष बने। इससे पहले इस पद पर केवल ब्रिटिश अधिकारी ही नियुक्त होते थे। उन्होंने अध्यक्ष के रूप में कार्य करते हुए संसदीय गरिमा और अनुशासन का उच्चतम स्तर स्थापित किया। उनकी निष्पक्षता के कारण विरोधी पक्ष के सदस्य भी उनके निर्णयों की प्रशंसा करते थे।

राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस: 1929 में स्वास्थ्य कारणों से वह यूरोप गए। उस समय लंदन में राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस की तैयारियां चल रही थीं। यूं तो वह आधिकारिक रूप से भारतीय प्रतिनिधिमंडल के सदस्य नहीं थे, लेकिन उन्होंने वहां भारतीय दृष्टिकोण को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। बाद में वह अमेरिका भी गए और वहां भारत की आजादी के पक्ष में कई भाषण दिए।

स्विट्जरलैंड में निधन: दुर्भाग्य से उनका स्वास्थ्य लगातार गिरता गया और 22 अक्टूबर 1933 को जिनेवा, स्विट्जरलैंड में उनका निधन हो गया। मृत्यु से पहले उन्होंने एक वसीयतनामा लिखा, जिसमें अपनी संपत्ति का बड़ा हिस्सा स्वतंत्रता संग्राम के कार्यों और नेताओं के सहयोग के लिए देने की इच्छा जताई। इससे उनकी राष्ट्रनिष्ठा और बलिदान भावना स्पष्ट होती है।

नियमों के पालन की अहमियत: आज जब संसद और विधानसभाओं की कार्यप्रणाली को लेकर समय-समय पर सवाल उठते हैं, विट्ठलभाई पटेल का दृष्टिकोण हमें यह याद दिलाता है कि लोकतंत्र में नियमों का पालन केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि उसकी आत्मा है। अध्यक्ष या स्पीकर का पद दलगत राजनीति से ऊपर उठकर संपूर्ण सदन की निष्पक्ष नेतृत्वकारी भूमिका निभाने का दायित्व है। बहस और संवाद लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत हैं, और इन्हें शिष्टाचार तथा गरिमा के साथ संचालित किया जाना चाहिए। जब भी हम संसद या विधानसभा की कार्यवाही को गरिमापूर्ण और सार्थक बनाने की बात करेंगे, विट्ठलभाई पटेल का नाम हमारे मार्गदर्शक के रूप में अवश्य उपस्थित रहेगा।

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