ईरान युद्ध ने भारत को एक मुश्किल मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है. लेकिन विदेश मंत्री एस जयशंकर ने जिस तरह इससे निपटने के लिए हर मोर्चे खोल रखे हैं, वह भी अभूतपूर्व है. 15 दिन में 15 से ज्यादा देशों के नेताओं से बातचीत इसका सबूत है.
विदेश मंत्री एस जयशंकर (File Photo)
ईरान युद्ध पूरी दुनिया की बर्बादी की कहानी लिख रहा है. भारत पर भी इसका असर पड़ा है. लेकिन इस खौफनाक मंजर के बीच नई दिल्ली में खामोशी नहीं है, बल्कि कूटनीति का एक ऐसा महामंथन चल रहा है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है. विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इन पंद्रह दिनों में 15 अलग-अलग देशों के विदेश मंत्रियों और शीर्ष नेताओं से सीधी बात कर भारत के लिए राह खोली है. अकेले रविवार को ही जयशंकर ने यूएई, सऊदी अरब, और इंडोनेशिया के विदेश मंत्रियों से बात की. भारत न सिर्फ अपने हितों की ओर देख रहा है, बल्कि यूएई और मिडिल ईस्ट के नेताओं से कई बार बात कर मैसेज दे रहा कि भारत मुश्किल घड़ी में भी उनके साथ खड़ा है.
मिडिल ईस्ट जंग ने भारत के सामने कई मुश्किलें खड़ी कर दी हैं.एक ओर तो तेल-गैस का सवाल है, तो दूसरी ओर उन लाखों भारतीयों की सुरक्षा का जिम्मा है जो खाड़ी देशों में रहकर अपने वतन की अर्थव्यवस्था में अहम योगदान देते हैं. ऐसे में जयशंकर का फोन घनघनाना और एक के बाद एक वैश्विक समकक्षों से ‘दो टूक’ बात करना यह साबित करता है कि भारत अब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रतिक्रिया देने वाला देश नहीं, बल्कि एजेंडा सेट करने वाला देश बन चुका है. हालिया दिनों में सऊदी अरब, यूएई, इंडोनेशिया, ईरान, रूस, जर्मनी और दक्षिण कोरिया के साथ हुई उनकी बातचीत इसी रणनीति का हिस्सा है.
सऊदी-यूएई संग मिलकर तलाशा जा रहा शांति का रास्ता
मध्य पूर्व के मौजूदा संकट में कोई भी स्थायी समाधान बिना अरब देशों के मुमकिन नहीं है. यही वजह है कि जयशंकर ने सबसे पहले खाड़ी के दो सबसे प्रभावशाली देशों सऊदी अरब और यूएई के साथ संपर्क साधा. सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान और यूएई के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री शेख अब्दुल्ला बिन जायद के साथ उनकी लगातार बातचीत हो रही है. यूएई के नेताओं से रविवार को भी बात हुई. इन दोनों देशों के साथ भारत के रिश्ते पिछले एक दशक में अभूतपूर्व ऊंचाइयों पर पहुंचे हैं और अब यह रिश्ते केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि रणनीतिक साझेदारी में तब्दील हो चुके हैं.
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भारत ने बिना किसी लाग-लपेट के अपनी चिंताएं सामने रखी हैं और अरब देशों का नजरिया भी पूरी ईमानदारी से सुना है. सऊदी अरब और यूएई दोनों ही देश इस वक्त उस नाजुक मोड़ पर खड़े हैं जहां वे ईरान के साथ सीधे टकराव से बचना चाहते हैं, लेकिन साथ ही वे अपने क्षेत्र में अस्थिरता भी नहीं चाहते. भारत इन दोनों देशों के साथ मिलकर यह सुनिश्चित कर रहा है कि युद्ध की आग को होर्मुज की खाड़ी से आगे न फैलने दिया जाए. क्षेत्रीय स्थिरता इस समय केवल अरब देशों की जरूरत नहीं है, बल्कि यह भारत के अपने आर्थिक वजूद के लिए भी अनिवार्य है.
‘लुक ईस्ट’ का नया अध्याय
जयशंकर की कूटनीति केवल मध्य पूर्व या पश्चिमी देशों तक सीमित नहीं रही. उन्होंने इस संकट की आंच को महसूस कर रहे एशियाई देशों को भी साथ लेने की शानदार पहल की है. 12 मार्च को इंडोनेशिया के विदेश मंत्री सुगियोनो के साथ उनकी विस्तृत बातचीत इस बात का सुबूत है कि भारत इस जंग के प्रभाव को वैश्विक नजरिए से देख रहा है. इंडोनेशिया केवल दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश नहीं है, बल्कि वह भारत का एक अहम रणनीतिक और समुद्री भागीदार भी है.
जयशंकर और सुगियोनो के बीच पश्चिम एशिया के संकट पर चर्चा हुई, यह बताता है कि दोनों देश इस युद्ध के कारण इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में पड़ने वाले प्रभावों को लेकर सतर्क हैं. इस बातचीत में न केवल वैश्विक मुद्दों पर चर्चा हुई, बल्कि द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने और जल्द ही ज्वाइंट कमीशन की बैठक बुलाने पर भी सहमति बनी. इंडोनेशियाई विदेश मंत्री ने खुद इस चर्चा को बेहद क्रिएटिव बताया. जयशंकर का दक्षिण कोरिया के विदेश मंत्री से बात करना इस मायने में अहम है कि दक्षिण कोरिया भी भारत की ही तरह ऊर्जा आयात पर भारी रूप से निर्भर है. ऐसे में एशियाई अर्थव्यवस्थाओं को एक साथ लाकर भारत प्रेशर बनाने की कोशिश कर रहा है.
महाशक्तियों के बीच भारत का अभूतपूर्व ‘बैलेंसिंग एक्ट’
कूटनीति की असली परीक्षा तब होती है जब आपको दो धुर विरोधी खेमों के साथ एक ही समय पर तालमेल बिठाना हो. जयशंकर ने पिछले कुछ दिनों में जिस तरह से रूस, जर्मनी और खुद विवाद के केंद्र में मौजूद ईरान के साथ बातचीत की है, वह दुनिया के किसी भी अन्य राजनयिक के लिए शायद असंभव होता. एक तरफ ईरान है, जो इस पूरे संघर्ष का मुख्य केंद्र बिंदु है. ईरान के साथ बातचीत करके भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह किसी के दबाव में आकर अपने पुराने साझेदारों को अलग-थलग नहीं करेगा. भारत जानता है कि चाबहार पोर्ट जैसी अहम परियोजनाएं और मध्य एशिया तक पहुंच ईरान के रास्ते ही जाती है.
दूसरी तरफ, जयशंकर ने जर्मनी जैसे प्रमुख पश्चिमी देश के साथ भी संपर्क बनाए रखा है, जो इजरायल और अमेरिका के खेमे का अहम हिस्सा है. इसके अलावा, रूस के साथ बातचीत यह सुनिश्चित करती है कि भारत हर खेमे से जुड़ा हुआ है. यह भारत की स्ट्रेटजिक ऑटोनॉमी का नया चेहरा है. जब दुनिया पश्चिमी और रूसी-ईरानी धड़ों में साफ-साफ बंटी हुई नजर आ रही है, तब नई दिल्ली एक ऐसा दुर्लभ कूटनीतिक पुल बना हुआ है, जिसके पास हर खेमे तक सीधे अपनी बात पहुंचाने की ताकत और स्वीकार्यता है. यह इस बात का सबूत है कि भारत अब किसी एक गुट का पिछलग्गू नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र ध्रुव बनकर उभर रहा है.
क्यों बेचैन है पूरी दुनिया और क्यों डटा है भारत?
इन तमाम कूटनीतिक मुलाकातों और टेलीफोन कॉल्स के सेंटर में सिर्फ एक ही बात है, ईरान की ओर से होर्मुज का बंद कर देना. तेल मार्केट में कोहराम मचा हुआ है, होर्मुज का यह संकरा रास्ता कोई आम समुद्री मार्ग नहीं है, बल्कि यह दुनिया की एनर्जी की नस है. फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी को जोड़ने वाले इस जलमार्ग से दुनिया के कुल कच्चे तेल और LNG का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है. अगर यह रास्ता कुछ हफ्तों के लिए भी पूरी तरह बंद हो जाए, तो दुनिया एक भयानक आर्थिक मंदी के गर्त में गिर सकती है.
भारत के लिए यह स्थिति किसी दुःस्वप्न से कम नहीं है क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है और इसका एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से आता है. तेल की कीमतों में उछाल का सीधा असर भारत की महंगाई दर, चालू खाते के घाटे और आम आदमी की जेब पर पड़ता है. ऐसे में जयशंकर की सक्रियता सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक मोर्चे पर देश को बचाने की एक मजबूत ढाल है. भारत यह सुनिश्चित कर रहा है कि चाहे जो भी हालात हों, भारतीय तेल टैंकरों और मालवाहक जहाजों को इस इलाके में बिना किसी रुकावट के सुरक्षित रास्ता मिलता रहे.

