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कुल्‍हड़ में चाय पीते नजर आये शशि थरूर… इस बदलाव के मायने

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नई दिल्ली: कांग्रेस नेता शशि थरू ठेठ देसी नेताओं से हमेशा कुछ अलग रहे हैं। फर्राटेदार अंग्रेजी, गंभीर चिंतन और हर बड़े मसले पर राय। इसी से उनकी पहचान बनी है। सोशल मीडिया पर उनके बेशुमार चाहने वाले हैं। उन्‍होंने दिल्‍ली यूनिवर्सिटी के सेंट स्‍टीफेंस कॉलेज के समय से पॉलिटिक्‍स में कदम रख दिए थे। लेकिन, उनकी छवि कभी हिंदी पट्टी के खांटी नेताओं जैसी नहीं रही। यहां तक थरूर ने 2009 में हवाई जहाज के इकोनॉमी क्‍लास को कैटल क्‍लास तक कह दिया था। विवाद गरमाने पर उन्‍होंने अपने बयान पर माफी मांगी थी। आज वही शशि थरूर लखनऊ में सड़क किनारे बाटी-चोखा लगाने वाले स्‍टॉल पर दिखे। कुल्‍हड़ में चाय पी। कांग्रेस अध्‍यक्ष पद के चुनाव (Congress President Election) से एक दिन पहले थरूर बिल्‍कुल अलग रंग-ढंग में थे। ऐसा करके शशि थरूर ने बिना कुछ कहे बहुत कुछ कह दिया। मीडिया में इन तस्‍वीरों के मतलब निकाले जाने लगे हैं।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं मल्लिकार्जुन खरगे और शशि थरूर के बीच सोमवार को पार्टी अध्यक्ष पद का चुनावी मुकाबला होना है। पार्टी में 24 साल बाद नेहरू-गांधी परिवार के बाहर से कोई अध्यक्ष बनेगा। प्रदेश कांग्रेस समितियों (पीसीसी) के 9,000 से अधिक प्रतिनिधि गुप्त मतदान के जरिये नए अध्यक्ष का चुनाव करेंगे। कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए पिछली बार चुनाव 2000 में हुआ था। तब जितेंद्र प्रसाद को सोनिया गांधी के हाथों जबरदस्त हार का सामना करना पड़ा था।

शश‍ि थरूर को भी है यह एहसास
कांग्रेस अध्‍यक्ष पद के चुनाव में थरूर के जीतने की संभावना नहीं के बराबर है। लेकिन, वह बराबर इस बात पर जोर देते रहे हैं कि पार्टी में बदलाव की चाहत रखने वाले सदस्‍यों को सिर्फ उन्‍हें वोट देना चाहिए। थरूर ने चुनाव प्रचार के दौरान असमान अवसरों के मुद्दे उठाए। लेकिन, खरगे और पार्टी के साथ यह भी माना है कि गांधी परिवार के सदस्य तटस्थ हैं। थरूर भी इस बात को अच्‍छी तरह समझते हैं कि कांग्रेस के ‘भीष्‍म पितामह’ के आगे उन्‍हें पार्टी में शायद ही बहुत बड़ा फेवर मिलेगा। यह और बात है अब थरूर कहीं आगे की सोच रहे हैं।

कुल्‍हड़ में चाय, बाटी-चोखा… क्‍या है मतलब?
कांग्रेस नेता शशि थरूर अब अपनी पुरानी अंग्रेजीदां वाली छवि को तोड़ना चाहते हैं। उन्‍हें हिंदी बेल्‍ट की ताकत का एहसास हो चुका है। व‍ह एक खास वर्ग तक सीमित नहीं रहना चाहते हैं। थरूर को पता लग चुका है कि राजनीति में आगे का रास्‍ता यही से जाता है। हाल में गौर करें तो उन्‍होंने बातचीत में हिंदी का इस्‍तेमाल बढ़ा दिया है। उनके हिंदी बोलने में भी जरूर अंग्रेजी एक्‍सेंट का असर दिखता है। लेकिन, धीरे-धीरे वह इसे खत्‍म कर रहे हैं। रविवार को लखनऊ में बाटी-चोखा के स्‍टॉल पर रुकना और कुल्‍हड़ में चाय पीना दिखाता है कि थरूरी पॉलिटिक्‍स में अब दूर की छलांग लगाने के लिए बेताब हैं। जनसंपर्क बढ़ाने की कवायद के साथ भी इसे देखा जा सकता है।

थरूर ठेठ कांग्रेसियों से अलग, आगे कुछ भी कहना मुश्किल!
थरूर मुखर हैं। मन की बात करते हैं। सही को सही और गलत को गलत कहने की क्षमता रखते हैं। सामने कोई भी खड़ा हो। गांधी परिवार को भी वह आईना दिखा चुके हैं। थरूर जी-23 के उस ग्रुप का हिस्‍सा थे जिन्‍होंने पार्टी में आमूलचूल बदलाव की मांग की थी। गांधी परिवार की जी-हुजूरी करने वालों में उनकी गिनती नहीं है। वह तीन बार लोकसभा चुनाव जीत कर सांसद बने हैं। यह उनकी लोकप्रियता को साबित करने के लिए काफी है। वह उन नेताओं में हैं जिनके लिए हर पार्टी में जगह खुली है। उन्‍हें कोई हांक नहीं सकता है। ये बातें उन्‍हें दूसरे कांग्रेसी नेताओं से बिल्‍कुल अलग खड़ा कर देती हैं।

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