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सेंचुरी के श्रमिकों की ओर से श्रमिक जनता संघ का कुमारमंगलम बिरला जी को खुला पत्र….

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मा. कुमारमंगलम‌जी,   

               श्री. बसंत कुमार बिरला जी से स्थापन हुई ,1993-96  से मध्य प्रदेश में चलती आई, सेंचुरी यार्न और डेनिम मिल्स के श्रमिकों की ओर से हमने आपको कई पत्र लिखे लेकिन आपने कभी ना उसकी दखल ली, नहीं जवाब दिया। हमने तो घनश्याम दास बिरला के वसंत कुमार जी को लिखे पत्रसे  प्रभावित  और बिरला समूह के गांधी जी की आजादी आंदोलन में हुए योगदान से परिचित लोग हैं। घनश्यामदास जी ने उनके जगप्रसिद्ध पत्रसे दिया संदेश, “धन कभी कायम नहीं रहता…. उसे मौज – शोक में नहीं उड़ाना… अपने बच्चों के हाथ भी, व्यर्थ गंवाने के लिए नहीं सोपना…. उसे समाजसेवा में लगाना…” से निश्चितही प्रेरित है। 

   

        सेंचुरी कंपनी  जो 1000 से अधिक कायमी श्रमिक और कर्मचारियों की तथा करीबन 400 ठेका श्रमिकों की आजीविका का आधार रही ,उसका पिछले कुछ दशकभर का इतिहास आपके नेतृत्व में साकार हुआ और धक्कादायक रहा। इन यार्न और डेनिम मिल्स की अंदरूनी हकीकत एवं धरातल की स्थिति से आप परिचित नहीं होंगे, यह हम कैसे मान ले ? फिर भी यहां की खबर, देश – विदेश की सफर में ,आप तक पहुंचने ना देने वाले आपकेही मैनेजर और पदाधिकारीयोंने कोई चाल खेली होगी, तो यह पत्र भी जरूरी है। जरूरी यह भी है कि औद्योगिकरण को ही विकास माननेवाले तथा कॉरपोरेटिकरण हर क्षेत्रमें हो, यह चाहनेवाले, शासन – प्रशासनसे कंपनियोंके कारोबार को ही प्रगतिपथ पर ले जानेकी ख्वाहिश रखनेवाले, सभी को यह हकीकत समझ में आये। हम यह भी चाहते हैं कि श्रमिकों के साथ कानूनी न्याय दिलाने के लिए स्थापित श्रमिक संगठन (ट्रेड यूनियंस) को भी जानने मिले कि उनके गलत नजरियेसे श्रमिकोंको क्या और क्यों भुगतने पड़ता है और आपस में लड़ना न चाहते हुए हमे क्यों विवाद उठाना पड़ता है। आज देशकी हालात मजदूर भुगततेे हैं और आप जैसे उद्योगपति फिर भी सैकड़ों करोड़ोंका मुनाफा कमाते हैं…. लेकिन मजदूरों की आजीविका और जीवनके प्रति कितनी संवेदना प्रकट करते है, यह भी समाज ने जानना जरूरी है। इस पत्र का यही तो है उद्देश्य !     

      कुमार मंगलम जी, आपके शेयरहोल्डर्स तो वेही है,जिन्होंने 10 या 100रु के सैकड़ों या हजारों शेयर्स खरीदे हैं। आपकी सेंचुरी टेक्सटाइल और इंडस्ट्रीज लि. के शेयर्स में आपके पितामह बसंतकुमार जी से लेकर आपके अधिकारी श्री. डालमिया  जैसे के अत्यधिक शेयर है फिर भी आपको शेयर होल्डर्स याने धनपूंजीनिवेशकोंको हर साल न केवल आर्थिक स्थिति बल्कि आपके कार्य, प्रगति और भविष्य के सपने भी दिखाने होते हैं। आपने 2019-20 के वार्षिक अहवालमें बिरला सेंचुरी, पल्प/कागज उद्योग, सीमेंट उद्योग और रियल इस्टेट की चार क्षेत्रोंकी करामत दिखाकर, 450 करोड़ रुपए का(standalone) मुनाफा, वह भी लॉकडाउन में, कमाने का ब्यौरा  अभिमान के साथ पेश किया है। कोविड-19 के बावजूद आप की जीवटता, अमेरिका, यूरोप तक के मार्केटसमें आपके ही सेंचुरी ब्रांड के उत्पादनो  की राह देखते व्यापारी, आपने शुरू किये नये ब्रान्डस, नये कारखाने भी उल्लेखित है। आपके इस कार्यसंभार और वैश्विक कारोबारीके बढ़ते कदमों को सलाम!   

             यही जानकारी – आपके हर उत्पादन, हर कार्य में श्रमपूंजी निवेश करने वाले श्रमिकोंसे क्यों छुपायी जाती है? सार्वजनिक दायरेमें कोई बैलेंसशीट जाहिर हुई तो भी जाणकारोंका मानना होता है कि इसमें कोई सत्य नहीं कई प्रकार की आंकड़ोंकी  करामतही दिखती है। छोड़ो उस विवरण को…… लेकिन क्या यार्न/डेनिम  मिल्स के श्रमिकोंकी वर्षों की मेहनत से  बढ़ती गई इमारते, मशीनरी और निर्यात भी आपके नजर में नहीं आयी? श्रमिक और कर्मचारियोंका, मेहनत से ही बढ़ता गया योगदान, आपके कंपनी का उभरता स्थान- सम्मान और तिजोरी  में भरता गया दान भी क्या हिसाब में नहीं समाया ? यार्न मिल में 1993 में कार्यरत श्रमिकों की मेहनत की कमाई से ही ना आपका निर्यात व्यापार चला….. और मुनाफेसे डेनिम मिल खड़ी हो गई ? तो भी आपनके मैनेजमेंट द्वारा 20 साल कार्य करने बाद 300 श्रमिकों की  छंटनी कर दी, इसकी भी आजतक कोई खबर नही? या आपकी रायभी नहीं ली ? खैर…आपने ग्राहकों पर ध्यान देते हुए अपने रिपोर्ट तो पेश किये हैं ही लेकिन कभी श्रमिकोंकी स्थितिपर भी कोई रिपोर्ट आपने पेश की हो, तो बताइये!     

       कुमार मंगलमजी, “टैक्सटाइल तो देश के विकासमें बड़ा योगदान देनेवालीे इंडस्ट्री है। वह आपके पूरे कार्य में सम्मान का प्रतीक है। इसकी रोजगार निर्माण में भी प्रभावकारकता स्पष्ट है।… कोविड-19 के प्रभाव के बावजूद 2-4 महीनों में ही आपकी टेक्सटाइल कंपनियां फिर से स्थिरस्थावर होने वाली है। आपने ‘बिरला केअर’ या  ‘बिरला फायबर’ जैसी नई कंपनियों की स्थापना भी की है।… अमरिका और यूरोप का बाजार आपकी राह देख रहा है… आपकी ‘कंपनी में अभूत जीवटता है और उसी से हम आपदा का कुछ असर भुगतने के बाद भी प्रगति पथ पर रहेंगे “.. ये है आपके उस वक्तव्य के कुछ अंश, जो शेअरहोल्डर्स के नाम था और आपके 2019-20 के वार्षिक अहवाल में उद्धृत है।’उसी में आपकी बड़ी, व्यापक CTIL कंपनी का इस लॉकडाउन का वार्षिक नगद मुनाफा 450 करोड़(stand alone net profit) बताया गया है।2017-18 में तो 668 करोड था, लॉकडाउन में काफी हद तक बचा के रहा, तो क्या कम है? जबकि श्रमिकों के माथे बेरोजगारी की कुल्हाड़ टंगी रही और बच्चों – बुढों की भूख तक नहीं मिट पायी, किसानों की भी बर्बादी हुई ….तब आपने ही बरसों से दिलाया रोजगार, क्यों खत्म करना चाहा? प्रधानमन्त्री के PM Care Fund नाम के निजी खाते में आपने 500 करोड़ रू का दान डाला‌ ,तो महोदय, आपका कुल व्यापार मुनाफे के साथ ही चल रहा था, इसीलिए ना? उसका थोड़ा हिस्सा सेंचुरी की म. प्र. की मिल्स में निवेश करते तो क्या 1000 परिवारों की आजीविका नहीं बचती?     

     आपने न घनश्यामदास बिडला का संदेश माना है, न ही कानूनी कार्यवाही चाही है। कोर्ट के आदेशसेही वेतन देकर उत्पादन बंद होते भी मिल्स जारी है का न्यायालय तक दावा करना और शेअरहोल्डर्स को ‘Discontinued Operations ‘बताना, कहाँ तक सच है? श्रमिक का मालिक की पूंजीपर नहीं तो भी व्यापार चलाकर आजीविका सुरक्षा पर अधिकार सर्वोच्च न्यायालय ने अधोरेखित किया है। आप शायदही देखें होंगे ऐसे श्रमिकवादी फैसले! आज तो पढिये जरूर!     फिर से किसी मनजीत की कंपनी योंको यह श्रमपूंजी से बढ़ी संपत्ति गलत आधारों के साथ बेचने की कारागिरी आखिर क्यों? आपके ही पदाधिकारीयोंने 1 रू. मे दोनों मिल्स ,हमारे श्रमिकों की संस्था को चलाने देने का वादा किया – क्या आपको बताया तक नही? औद्योगिक ट्रिब्यूनल के समक्ष उस संबंधी हलफनामा पेश किया, उसका आपको संज्ञान तक नही?    

       आप तो कई सारे कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारी है। हर सेवा के लिए लाखों की आपकी कमाई घनश्यामदास जी के पत्र में उल्लेखित धन हैं। आपके पदाधिकारी की तनख्वाह भी कुछ लाख प्रतिमाह ….46 लाख रू. तक है । आप जैसे कमाईदार क्या श्रमिकों को बटाईदार  भी नही मानते? क्या उनका कोई हिस्सा नहीं तो स्थान- सम्मान भी नही? श्रमिकों के बिना मशीन चलाना, उत्पादन करना….. बेचना, कमाना अगर संभव नहीं तो उन्हीं से हासिल की संपदा हस्तांतरित क्या, बरबाद करने से पहले उन्हे जानने का भी हक नही?            

 कुमार मंगलम जी, सेंचुरी को सालों से पकड़कर  बैठे श्रमिक आज भी चाहते हैं, आप CSR नही, सामाजिक दायित्व स्वीकार कर आपकी एक प्रतिशत पूंजी लगाकर भी रोजगारमूलक कंपनी चलाये……. श्रमिकों को सहभागी बनाये, धन को सेवाकर्म में लगाये, नही  मौज-शौक मे! आपके मान्यवर पूर्वजों के पदचिन्ह पर चल कें दिखाये!     हाँ, आप अगर इस शांतिपथ के बदले श्रमिकों को से ही गृहयुद्ध चलाना चाहते हो , तो बताइए! हमे भी तय करनी होगी हमारी मंजिल, जिसे आपके नजरिये में उतारना भी तो जरुरी है!  

    जवाबी संवाद की अपेक्षा करे तो कब तक                                                                                                                                     

मेधा पाटकर                                                                                                                         

   – सेंचुरी के श्रमिकों की ओर से

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