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*इंदौर त्रासदी की कहानी दो डॉक्टरों की जुबानी:59 इलाकों में सालों से जहर पी रहे थे लोग*

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 इंदौर शहर देशभर में स्वच्छता और बेहतर शहरी व्यवस्था की मिसाल माना जाता रहा है. वही शहर इन दिनों एक ऐसी त्रासदी से जूझ रहा है, जिसने पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया. भगीरथपुरा इलाके में पीने के पानी में सीवर का गंदा पानी मिल गया और यह जहर धीरे-धीरे घर-घर पहुंचता चला गया. लोग पेट दर्द, उल्टी और दस्त जैसी शिकायतें लेकर अस्पताल पहुंचने लगे. शुरुआत में किसी को अंदाजा नहीं था कि यह कोई मामूली मामला नहीं, बल्कि एक भयावह स्वास्थ्य संकट बनने जा रहा है. इस गंदे जहरीले पानी से मासूम बच्चों सहित कम से कम 15 लोगों की जान चली गई, जबकि 200 के करीब लोग अस्पताल में भर्ती हैं और उनमें से 32 का इलाज आईसीयू में चल रहा है.

यहां पूरा संकट 25 दिसंबर को सामने आना शुरू हुआ, जब पेट से जुड़ी समस्याओं के चलते करीब 70 मरीज अस्पताल की ओपीडी में पहुंचे थे. डॉक्टरों को लगा, यह मौसम से जुड़ी सामान्य बीमारी होगी. लेकिन चार दिन बाद तस्वीर बदल चुकी थी. 29 दिसंबर को मरीजों की संख्या 129 हो गई, 30 दिसंबर को 240 और 31 दिसंबर तक यह आंकड़ा 310 तक पहुंच गया. हर दिन बढ़ते ये नंबर सिर्फ आंकड़े नहीं थे, बल्कि उन घरों की कहानी थे, जहां अचानक बीमारी ने दस्तक दी थी.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्वी इंदौर जोन की जिम्मेदारी संभाल रहे डॉक्टर नितिन ओझा बताते हैं कि सबसे दर्दनाक पल वह था, जब उन्हें समझ आया कि संक्रमण कई दिनों से फैल रहा था. गंदा पानी चुपचाप पाइपलाइनों से बहता रहा और लोग उसे पीते रहे. जब तक पहली मौत सामने आई, तब तक बहुत देर हो चुकी थी. डर और अफरातफरी का माहौल बन गया. लोग उबला पानी पीने लगे, लेकिन कई घरों तक वह सलाह समय पर नहीं पहुंच पाई.

इतने कैसे बिगड़ गए हालात
59 इलाकों में सालों से जहर पी रहे थे लोग, अब कलेक्टर खुद चख रहे टैंकर का पानी
डॉक्टर ओझा कहते हैं कि शुरुआती दिनों में कई मरीज निजी क्लीनिकों और छोटे अस्पतालों में चले गए. वहां कुछ को राहत मिली, लेकिन कई गंभीर मरीजों को संभालना मुश्किल हो गया. बुजुर्गों की हालत तेजी से बिगड़ने लगी. पहले से डायबिटीज, दिल और किडनी की बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिए यह संक्रमण जानलेवा साबित हुआ. कई परिवारों ने अपने बुजुर्गों को अपनी आंखों के सामने कमजोर पड़ते देखा.

वहीं पश्चिमी जोन के प्रभारी डॉक्टर ओमेश नंदवार बताते हैं कि अस्पताल में भर्ती मरीजों की तस्वीर और भी चिंताजनक थी. करीब 95 फीसदी मरीज महिलाएं थीं और उनमें से 70 से 80 फीसदी को किडनी फेल होने जैसी गंभीर समस्या हो गई. कुल 310 मरीज अस्पताल में भर्ती हुए, जिनमें कई को आईसीयू में रखना पड़ा. सबसे छोटा मरीज सिर्फ 10 साल का था, जिसने शायद यह भी नहीं समझा होगा कि उसके साथ क्या हो रहा है.
तीन अन्य अस्पतालों की जिम्मेदारी संभाल रहे डॉक्टर अभिषेक निगम बताते हैं कि हालात को देखते हुए डॉक्टरों को बहुत कम समय में इलाज का पूरा सिस्टम खड़ा करना पड़ा. हल्के मामलों में दवाइयों और फ्लूइड से सुधार हुआ, लेकिन गंभीर मरीजों के लिए अलग-अलग विशेषज्ञों की जरूरत पड़ी. गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट, मेडिसिन और एंडोक्रिनोलॉजी विभाग के डॉक्टर दिन-रात एक साथ काम करते रहे. कई मरीजों को डायलिसिस तक की जरूरत पड़ी.
आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने कैसे की मदद?
इस पूरी लड़ाई में सिर्फ डॉक्टर ही नहीं, बल्कि जमीनी स्तर के स्वास्थ्यकर्मी भी नायक बनकर उभरे. महू से आने वाले स्वास्थ्यकर्मी विनोद नीम रोज सुबह छह बजे घर से निकलते और इंदौर पहुंचते. आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के साथ वे एक-एक घर जाकर लोगों की जांच करते. हर परिवार में 10 मिनट रुककर डिहाइड्रेशन के लक्षण देखते, बच्चों और बुजुर्गों पर खास नजर रखते. एक हफ्ते में 66 हजार से ज्यादा लोगों की स्क्रीनिंग हुई और हजारों परिवारों को ओआरएस के पैकेट बांटे गए.

बच्चों की हालत डॉक्टरों को सबसे ज्यादा डराने वाली लगी. बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर सचिन गर्ग बताते हैं कि बच्चों में संक्रमण बहुत तेजी से असर करता है. थोड़ा सा पानी कम हुआ और बच्चा जानलेवा स्थिति में पहुंच सकता है. इलाके में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी ने हालात और मुश्किल बना दिए. छह महीने का एक बच्चा भी इस दूषित पानी का शिकार बना यह सोचकर ही डॉक्टरों की आवाज भर आती है.


इंदौर की यह त्रासदी सिर्फ बीमारी की कहानी नहीं है. यह उस लापरवाही की कहानी है, जहां चेतावनियां समय पर नहीं सुनी गईं, जहां गंदा पानी कई दिनों तक लोगों के गिलास तक पहुंचता रहा. 70 से 310 तक पहुंचते ये आंकड़े उन जिंदगियों की गवाही हैं, जिन्होंने दर्द, डर और असहायता को बहुत करीब से देखा. डॉक्टरों की थकी आंखें, स्वास्थ्यकर्मियों के छाले पड़े पैर और मरीजों की सूनी निगाहें… इंदौर की यह कहानी लंबे समय तक सिस्टम को आईना दिखाती रहेगी.

दूषित पानी पीने से हुई मौतों के बाद जो सच सामने आया है, उसने न सिर्फ प्रशासन बल्कि पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया है. अब यह साफ हो चुका है कि यह त्रासदी सिर्फ भागीरथपुरा तक सीमित नहीं थी, बल्कि शहर के 59 स्थानों पर पीने का पानी वर्षों से पीने योग्य ही नहीं था.

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट ने खोली सालों पुरानी लापरवाही

यह खुलासा मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट से हुआ है. बोर्ड ने वर्ष 2016–17 और 2017–18 के दौरान इंदौर शहर के 60 अलग-अलग इलाकों से पानी के सैंपल लिए थे. इन सैंपलों की जांच रिपोर्ट 2019 में आई, जिसमें 60 में से 59 सैंपल फेल पाए गए.

सबसे खतरनाक बात यह रही कि जांच में पानी में टोटल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया पाया गया, जो साफ तौर पर इस बात का संकेत है कि पानी में सीवर या गंदगी की मिलावट हो रही थी. मेडिकल एक्सपर्ट्स के मुताबिक, कोलीफॉर्म बैक्टीरिया से दूषित पानी पीने से उल्टी, दस्त, पेट दर्द, टाइफाइड, डिहाइड्रेशन और गंभीर संक्रमण हो सकते हैं, और कमजोर इम्युनिटी वाले लोगों के लिए यह जानलेवा भी साबित हो सकता है.

चेतावनी दी गई… तीन बार लेटर लिखा गया लेकिन कुछ नहीं बदला

रिपोर्ट सामने आने के बाद प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इंदौर नगर निगम को तीन बार पत्र लिखकर चेताया. इन पत्रों में साफ लिखा गया था कि जिन इलाकों में पानी दूषित पाया गया है, वहां उपचार (ट्रीटमेंट) के बाद ही जल आपूर्ति की जाए. इतना ही नहीं, बाद में इस पूरे मामले की जानकारी सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड को भी दी गई. इसके बावजूद जमीनी स्तर पर कोई ठोस और स्थायी कार्रवाई नहीं हुई. न तो पाइपलाइन बदली गई, न लीकेज रोके गए और न ही प्रभावित इलाकों में वैकल्पिक सुरक्षित व्यवस्था की गई.

ये हैं वो इलाके, जहां पीने लायक नहीं था पानी

जिन इलाकों के पानी के सैंपल फेल पाए गए, उनमें भागीरथपुरा के साथ-साथ खातीपुरा, रामनगर, नाहर शाहवली रोड, खजराना, गोविंद कॉलोनी, शंकर बाग कॉलोनी, परदेशीपुरा, सदर बाजार, राजवाड़ा, जूनी इंदौर जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्र शामिल हैं. इन इलाकों में रहने वाले लाखों लोग सालों तक वही पानी पीते रहे, जिसके बारे में सरकारी रिपोर्ट में पहले ही खतरे की घंटी बज चुकी थी.

मौतों के बाद हरकत में प्रशासन

भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी पीने से हुई मौतों के बाद प्रशासन हरकत में आया. अब तक 15 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 203 मरीज अब भी अस्पताल में भर्ती हैं. इनमें से 25 मरीजों की हालत गंभीर है और वे ICU में इलाजरत हैं. घटना के बाद भागीरथपुरा में रिंग सर्वे शुरू किया गया है. हॉटस्पॉट के आसपास के 50 घरों का विशेष सर्वे किया जा रहा है, अब तक 3,679 घरों का सर्वे पूरा हो चुका है

इस काम के लिए 20 टीमें तैनात की गई हैं

प्रशासन का दावा है कि सर्वे के जरिए यह पता लगाया जा रहा है कि किन घरों में किस तरह का पानी इस्तेमाल हुआ और बीमारी किस स्तर तक फैली.

लोगों का भरोसा लौटाने खुद मैदान में उतरे कलेक्टर

लोगों में फैले डर को कम करने और भरोसा दिलाने के लिए शिवम वर्मा, खुद मैदान में उतर आए. भागीरथपुरा में टैंकरों से सप्लाई हो रहे पानी को लेकर संदेह बढ़ने पर कलेक्टर ने खुद टैंकर का पानी पीकर देखा. इस दौरान उनका वीडियो भी सामने आया, जिसमें वे पानी की गुणवत्ता पर भरोसा दिलाने की कोशिश करते नजर आए. प्रशासन का कहना है कि फिलहाल प्रभावित इलाकों में टैंकरों के जरिए ही सुरक्षित पानी की आपूर्ति की जा रही है.

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