मराठवाड़ा में भारी बारिश ने छत्रपति संभाजीनगर की हजारों महिलाओं से मातृत्व का सपना छीन लिया. 2025 में जिले में गर्भपात के मामलों में 42 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई. बाढ़, सड़क बंद होने और इलाज न मिलने से करीब 2800 महिलाओं ने अजन्मे बच्चों को खो दिया. इस घटना ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
‘साहब, उस रात पानी घर में घुस आया था… दवाइयां भीग गईं, रास्ते बंद थे… अस्पताल पहुंचते-पहुंचते बहुत देर हो गई.’ छत्रपति संभाजीनगर की यह आवाज सिर्फ एक महिला की नहीं है, बल्कि उन करीब 2800 महिलाओं की पीड़ा है. जिनके गर्भ में पल रहे सपने इस साल कुदरत के कहर में बह गए. मराठवाड़ा में हुई असामान्य और लगातार बारिश ने सिर्फ खेत, घर और मवेशी ही नहीं छीने, बल्कि हजारों परिवारों से आने वाली पीढ़ी की उम्मीद भी छीन ली.
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े इस दर्द को और गहरा कर देते हैं. भारी बारिश से उपजी बाढ़ और अव्यवस्था के बीच छत्रपति संभाजीनगर जिले में गर्भपात के मामलों में 42 प्रतिशत की चौंकाने वाली बढ़ोतरी दर्ज की गई है. यह महज एक आंकड़ा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था, आपदा प्रबंधन और ग्रामीण हकीकत पर बड़ा सवाल है.
छत्रपति संभाजीनगर जिले में जून से सितंबर के बीच 905.1 मिमी बारिश दर्ज की गई, जबकि सामान्य औसत सिर्फ 566.1 मिमी होता है. यानी करीब 160 प्रतिशत ज्यादा बारिश. इस भारी बारिश ने बाढ़ जैसी स्थिति पैदा कर दी. घरों में पानी भर गया, गांवों का संपर्क टूटा, सड़कें बंद हो गईं और इलाज तक पहुंचना मुश्किल हो गया. इसका सबसे गहरा असर गर्भवती महिलाओं पर पड़ा.
आंकड़े क्या कहते हैं?
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार-
- 2014 में अप्रैल से नवंबर के बीच 1,959 गर्भपात दर्ज हुए थे.
- 2024 में इसी अवधि में 2,741 मामले सामने आए.
- लेकिन 2025 में यह संख्या बढ़कर लगभग 2,800 तक पहुंच गई.
- विशेषज्ञों का कहना है कि यह वृद्धि सामान्य नहीं, बल्कि बेहद चिंताजनक है.
कैसे बारिश बनी अजन्मे बच्चों की दुश्मन?
भारी बारिश के कारण कई गांवों में हालात ऐसे बने कि गर्भवती महिलाएं समय पर इलाज नहीं करा सकीं. एक 26 वर्षीय महिला का मामला दिल दहला देने वाला है. घर में पानी भर जाने के कारण उसे रातों-रात परिवार के साथ घर छोड़ना पड़ा. दो दिन तक वह जरूरी दवाइयां नहीं ले पाई. तीसरे दिन तेज पेट दर्द हुआ. अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टरों ने उसकी जान तो बचा ली, लेकिन गर्भ में पल रहे बच्चे को नहीं.
बाढ़ और सड़क बंद, अस्पताल दूर
बाढ़ की वजह से कई इलाकों में सड़कें पूरी तरह बंद हो गईं. नतीजा यह हुआ कि शुरुआती 12 हफ्तों की गर्भावस्था में होने वाले गर्भपात के मामले कम दर्ज हुए. क्योंकि महिलाएं अस्पताल तक पहुंच ही नहीं सकीं. आंकड़ों के मुताबिक:
- 2024 में अप्रैल–नवंबर के बीच 12 हफ्ते से कम गर्भावस्था में 2,741 गर्भपात.
- 2025 में इसी अवधि में यह संख्या घटकर 1,388 रह गई.
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह कमी राहत नहीं, बल्कि इलाज न मिल पाने की भयावह सच्चाई है.
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि बाढ़ प्रभावित इलाकों में गर्भपात की दर आमतौर पर 10 प्रतिशत तक बढ़ सकती है. लेकिन संभाजीनगर में 42 प्रतिशत की वृद्धि ने सभी को चौंका दिया है. इतना ही नहीं प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका ‘नेचर’ में प्रकाशित एक रिसर्च के मुताबिक, बाढ़ से प्रभावित महिलाओं में गर्भपात का खतरा औसतन 8 प्रतिशत अधिक होता है.
एक नजर में स्थिति
- मराठवाड़ा में 160% ज्यादा बारिश.
- संभाजीनगर में गर्भपात 42% बढ़ा.
- 2025 में लगभग 2,800 गर्भपात दर्ज.
- बाढ़, पलायन और दवाओं की कमी बनी बड़ी वजह.
- सड़कें बंद होने से अस्पताल पहुंचना मुश्किल.
क्या यह सिर्फ कुदरत की मार है?
सवाल यह भी है कि क्या यह सिर्फ बारिश का असर है, या आपदा प्रबंधन और स्वास्थ्य सेवाओं की कमजोर कड़ी भी जिम्मेदार है? विशेषज्ञ मानते हैं कि समय पर राहत, मोबाइल मेडिकल यूनिट, गर्भवती महिलाओं की पहचान और सुरक्षित आश्रय की व्यवस्था होती, तो कई जानें और सपने बचाए जा सकते थे.
संभाजीनगर के ये आंकड़े चेतावनी हैं. बदलते मौसम और इस तरह की घटनाओं के दौर में मातृ स्वास्थ्य को आपदा नीति के केंद्र में लाना अब विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत बन चुका है. वरना हर साल कोई न कोई महिला यही कहती रह जाएगी ‘साहब, मेरा बच्चा नहीं रहा…’
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