सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक पद्मभूषण बिंदेश्वर पाठक का मंगलवार को दिल्ली AIIMS में निधन हो गया है। वे 80 साल के थे। सुबह सुलभ इंटरनेशनल के केंद्रीय कार्यालय में ध्वजारोहण के बाद अचानक उनकी तबीयत बिगड़ गई। इसके बाद उन्हें AIIMS ले जाया गया,जहां उनका निधन हो गया।

डॉ. पाठक को 2003 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया है। बिंदेश्वर पाठक बिहार के वैशाली के रहने वाले थे।
बुधवार की सुबह 7 बजे दिल्ली स्थित महावीर इनक्लेव स्थित सुलभ ग्राम में उनके शरीर को अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा। इसके बाद दिल्ली में ही हिंदू रीति रिवाज से दाह संस्कार किया जाएगा।
यह तस्वीर 2012 की यूपी के वृंदावन की है। जहां सुलभ ने विधवा महिलाओं के लिए सुलभ शौचालय बनवाए हैं।
सुलभ इंटरनेशनल की स्थापना की
बिंदेश्वर पाठक 1968 में कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद बिहार गांधी शताब्दी समारोह समिति के भंगी-मुक्ति (मेहतरों की मुक्ति) प्रकोष्ठ में शामिल हुए, जिससे उन्हें भारत में मैला ढोने वाले समुदाय की दुर्दशा के बारे में पता चला। इस समुदाय की स्थिति में सुधार के लिए उन्होंने 1970 में सुलभ इंटरनेशनल की स्थापना कर नागरिकों को स्वच्छ शौचालय की सुविधा देने की पहल थी।
उनकी संस्था मानव अधिकार, पर्यावरण स्वच्छता, ऊर्जा के गैर-पारंपरिक स्रोतों, अपशिष्ट प्रबंधन और सामाजिक सुधारों को बढ़ावा देने के लिए काम करती है।
1968 में डिस्पोजल कम्पोस्ट शौचालय का आविष्कार किया
भारत में मैला ढोने की प्रथा के खिलाफ अभियान चलाने वाले बिंदेश्वर पाठक ने देश में स्वच्छता अभियान में अहम भूमिका निभाई। देश में शौचालय निर्माण विषय पर उन्होंने बहुत शोध किया। डॉ. पाठक ने सबसे पहले 1968 में डिस्पोजल कम्पोस्ट शौचालय का आविष्कार किया, जो कम खर्च में घर के आसपास मिलने वाली सामग्री से बनाया जा सकता है।
यह आगे चलकर बेहतरीन वैश्विक तकनीकों में से एक माना गया। उनके सुलभ इंटरनेशनल की मदद से देशभर में सुलभ शौचालयों की शृंखला स्थापित की।
एक महिला को छूने पर उन्हें खिलाया गया था गोबर
बिंदेश्वर पाठक ने चार साल पहले दैनिक भास्कर से बातचीत में बचपन की कहानी सुनाई थी। उन्होंने बताया था- बचपन में हमारे घर में एक महिला बांस का बना सूप, डगरा और चलनी देने के लिए आती थी। जब वह लौटती, तो दादी जमीन पर पानी छिड़कतीं। मुझे आश्चर्य होता था कि इतने लोग आते हैं लेकिन दादी उन्हीं के लिए ऐसा क्यों करतीं?
लोग कहते थे वह महिला अछूत है, इसलिए दादी पानी छिड़कती थीं ताकि वह जगह पवित्र हो जाए। मैं कभी-कभी उस महिला को छूकर देखता था कि क्या मेरे शरीर और रंग में कोई परिवर्तन होता है या नहीं? लेकिन कोई बदलाव नहीं पाया। एक बार दादी ने मुझे उनके पैर छूते हुए देख लिया। घर में कोहराम मच गया। सर्दी के दिन थे, दादी ने मुझे पवित्र करने के लिए गाय का गोबर खिलाया और गोमूत्र पिलाया। गंगा जल से स्नान करवाया। उस समय मेरी उम्र 7 साल थी, इसलिए छुआछूत की घटना को अधिक समझ नहीं पाया।
डॉ. पाठक ने बताया कि बिहार में एक बार मैं कुछ साथियों के साथ चाय पीने जा रहा था, उस दौरान सांड ने एक बच्चे पर हमला कर दिया। आसपास के लोग और हम सब उसे बचाने के लिए दौड़े। इस दौरान भीड़ में से ही आवाज आई कि यह मैला ढोने वाले समुदाय की बस्ती का बच्चा है। यह सुनते ही लोग पीछे हो गए और बच्चे को छोड़ दिया। हम लोगों ने उसे उठाया और इलाज कराने के लिए दौड़े, लेकिन देर हो गई। हम उस बच्चे को बचा नहीं पाए। उन्होंने कहा कि इन दो घटनाओं ने मेरे जीवन पर गहरा असर डाला