जयपुर. देश के पूर्व प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) डी वाई चंद्रचूड़ ने सशस्त्र सेनाओं में महिलाओं को स्थायी कमीशन प्रदान करने, समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर करने और ‘चुनावी बांड’ संबंधी सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसलों को अपने कार्यकाल के परिवर्तनकारी बड़े फैसले बताया. न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम व्यवस्था में बदलाव संबंधी सवालों पर उन्होंने कहा कि सवाल पारदर्शिता सुनिश्चित करने का है और इसके लिए उन्होंने नागरिक संस्थाओं से विशिष्ट व्यक्तियों को शामिल किए जाने का सुझाव दिया और कहा कि इससे जनता का न्यायपालिका में भरोसा बहाल होगा. वह रविवार को 19वें जयपुर साहित्य महोत्सव में ‘आइडियाज ऑफ जस्टिस’ सत्र में बोल रहे थे.
जयपुर साहित्य महोत्सव में पूर्व सीजेआई डी वाई चंद्रचूड़ ने सुप्रीम कोर्ट के चुनावी बांड, महिलाओं को स्थायी कमीशन, समलैंगिकता फैसलों को परिवर्तनकारी बताया और न्यायपालिका में पारदर्शिता पर जोर दिया. उमर खालिद की जमानत नामंजूर किए जाने की पृष्ठभूमि में जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि दोषसिद्धि से पहले जमानत प्राप्त करना एक नागरिक का अधिकार है.
सेवानिवृत्ति के बाद कोई पद नहीं लेने संबंधी सवाल पर न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा कि इस समय वह बतौर नागरिक जिंदगी का आनंद उठा रहे हैं. उनसे उनके कार्यकाल के दौरान किसी मामले को लेकर अफसोस होने संबंधी सवाल पर जस्टिस चंद्रचूड़़ ने कहा कि देश को आजाद हुए 76 साल हो चुके हैं, लेकिन आज भी वैवाहिक बलात्कार को अपराध की श्रेणी में नहीं लाया जा सका है. उन्होंने इसके लिए कानून में बदलाव की पुरजोर वकालत की. साथ ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को जनता का न्यायालय बनाने के अपने प्रयासों पर खुशी जाहिर की. उनके कार्यकाल में ही सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही का सीधा प्रसारण न केवल हिंदी भाषा में, बल्कि संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज सभी भारतीय भाषाओं में शुरू किया गया.
छात्र नेता उमर खालिद की जमानत नामंजूर किए जाने की पृष्ठभूमि में देश में उदारवादी मूल्यों के खतरे में पड़ने की चिंताओं के बीच जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि दोषसिद्धि से पहले जमानत प्राप्त करना एक नागरिक का अधिकार है. इसके साथ ही उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि जिन मामलों में राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा शामिल हो, उनमें इस प्रकार की राहत देने से पूर्व मामले की गहराई से पड़ताल की जानी चाहिए. साल 2020 के दिल्ली दंगों संबंधी षड्यंत्र के मामले में जेल में बंद उमर खालिद और साथी कार्यकर्ता शरजील इमाम को जमानत देने से इंकार करते हुए शीर्ष अदालत ने पांच जनवरी को कहा था कि वे उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों की ‘साजिश रचने, लोगों को एकत्र करने और रणनीति’ बनाने में शामिल थे.
उमर खालिद को लेकर पूर्व CJI चंद्रचूड़ ने खींची रेड लाइन
छात्र नेता उमर खालिद की जमानत नामंजूर किए जाने की पृष्ठभूमि में देश में उदारवादी मूल्यों के खतरे में पड़ने की चिंताओं के बीच देश के पूर्व प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) डी वाई चंद्रचूड़ ने रविवार को यहां कहा कि दोषसिद्धि से पहले जमानत प्राप्त करना एक नागरिक का अधिकार है. इसके साथ ही पूर्व सीजेआई ने हाईकोर्ट्स और सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति से संबंधित कॉलेजियम व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित करने और न्यायपालिका में आम नागरिक के भरोसे की बहाली और मजबूती के लिए नागरिक संस्थाओं से भी विशिष्ट व्यक्तियों को शामिल किए जाने का सुझाव दिया.
जयपुर साहित्य महोत्सव में ‘आइडियाज ऑफ जस्टिस’ सत्र में वरिष्ठ पत्रकार वीर सांघवी द्वारा शुरुआत में ही उमर खालिद की जमानत का मुद्दा उठाए जाने पर न्यायमूर्ति (रिटायर्ड) चंद्रचूड़ ने कहा, ”दोषसिद्धि से पूर्व जमानत अधिकार का मामला है. हमारा कानून एक प्रकल्पना पर आधारित है और वह प्रकल्पना यह है कि कोई भी आरोपी व्यक्ति, अपराध सिद्ध होने तक निर्दोष है.” विभिन्न मामलों का उदाहरण देते हुए जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि अगर आरोपी के समाज में लौट कर फिर से अपराध को अंजाम देने, सबूतों से छेड़छाड़ करने या जमानत का फायदा कानून के शिकंजे से भाग निकलने के लिए किए जाने की आशंका है, तो आरोपी को जमानत देने से इंकार किया जा सकता है.
उन्होंने कहा, ”यदि ये तीनों आधार नहीं हैं, तो जमानत देनी ही होगी. मुझे लगता है कि जहां राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है, वहां अदालत का कर्तव्य है कि वह मामले की गहराई से पड़ताल करे. अन्यथा हो यह रहा है कि लोग वर्षों तक जेलों में बंद रहते हैं.” भारतीय आपराधिक न्याय प्रक्रिया में मामलों के निपटारे में देरी पर चिंता जाहिर करने के साथ ही उन्होंने कहा कि देश का संविधान सर्वोच्च कानून है और मामले में कोई ठोस अपवाद नहीं है तथा त्वरित सुनवाई में देरी है, तो आरोपी जमानत का अधिकारी है. सत्र और जिला अदालतों द्वारा जमानत नहीं दिए जाने को न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने चिंता का विषय बताया और कहा कि प्राधिकार के प्रति अविश्वास बढ़ा है और न्यायाधीशों को यह डर सताता है कि कहीं उनकी निष्ठा पर सवाल तो नहीं उठाया जाएगा. उन्होंने कहा कि यही कारण है कि जमानतों के मामले उच्चतम न्यायालय तक पहुंचते हैं.

