जाली अदालती आदेशों और पुलिस व न्यायिक अधिकारियों के छद्म रूप से किए गए डिजिटल अरेस्ट घोटालों से संबंधित एक स्वतः संज्ञान मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी किए। इससे पहले, न्यायालय ने हरियाणा के सीनियर सिटीजन दंपति, जो इसी तरह की एक साइबर धोखाधड़ी के शिकार हुए, उनसे एक पत्र प्राप्त होने के बाद मामले का स्वतः संज्ञान लिया था।
दरअसल देशभर में तेजी से बढ़ रहे डिजिटल अरेस्ट घोटालों पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने कहा है कि ऐसे मामलों की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपी जा सकती है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से इस तरह के मामलों में दर्ज एफआईआर की जानकारी मांगी है।
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, “विभिन्न हिस्सों में एक से अधिक घटनाएं घटित हुई हैं। हम सभी राज्यों के संबंध में मामले को केन्द्रीय जांच ब्युरो को सौंपने के इच्छुक हैं, क्योंकि यह एक ऐसा अपराध है जो पूरे भारत में या सीमा पार भी संचालित हो सकता है।” अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि ने अदालत को बताया कि इन घोटालों के पीछे धन शोधन नेटवर्क अक्सर भारत के बाहर स्थित होते हैं। उन्होंने कहा, “हमारे क्षेत्र के बाहर म्यांमार और थाईलैंड सहित एशिया के कई हिस्सों में धन शोधन गिरोह मौजूद हैं।”
जस्टिस सूर्यकांत ने केंद्र और सीबीआई से ऐसे मामलों की बढ़ती संख्या से निपटने की उनकी क्षमता के बारे में जानकारी मांगी। उन्होंने कहा, “मामलों की बढ़ती संख्या को देखते हुए हम जानना चाहते हैं कि अगर सीबीआई को ट्रांसफर किया जाता है तो क्या उसके पास सभी मामलों से निपटने के लिए पर्याप्त मानव और तकनीकी संसाधन हैं।”
जस्टिस कांत ने आगे कहा कि यदि पुलिस के दायरे से बाहर विशेष साइबर अपराध विशेषज्ञों की आवश्यकता है तो एजेंसी आवश्यक सहायता के लिए न्यायालय को सुझाव दे सकती है।
जस्टिस बागची ने म्यांमार से संचालित ऐसे साइबर घोटाला सिंडिकेट पर कार्रवाई की हालिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए इस घटना को एक “अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा” बताया। कोर्ट ने कहा कि इन अपराधों की व्यापकता और देशव्यापी नेटवर्क को देखते हुए अब जांच का दायरा सीबीआई के स्तर पर बढ़ाया जाना जरूरी है।
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि इन साइबर अपराधों की जड़ें म्यांमार और थाईलैंड जैसे विदेशी ठिकानों से जुड़ी हुई हैं। कोर्ट ने सीबीआई को निर्देश दिया कि वह इन मामलों की जांच के लिए एक ठोस कार्य योजना तैयार करें और कोर्ट को प्रस्तुत करें।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “हम सीबीआई की जांच की प्रगति की निगरानी करेंगे और जरूरत पड़ने पर आगे के निर्देश भी जारी करेंगे।” इसके साथ ही कोर्ट ने एजेंसी से यह भी पूछा कि क्या उन्हें इन मामलों की जांच के लिए अधिक संसाधन या विशेषज्ञों की आवश्यकता है।
सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी याद दिलाया कि उसने 17 अक्टूबर को डिजिटल अरेस्ट के नाम पर हो रही ऑनलाइन ठगी पर स्वतः संज्ञान लिया था। कोर्ट ने कहा था कि ऐसे अपराध जनता के न्याय व्यवस्था पर भरोसे की जड़ पर वार करते हैं।
यह मामला तब चर्चा में आया जब हरियाणा के अंबाला में एक वरिष्ठ नागरिक दंपति को फर्जी न्यायिक आदेश दिखाकर 1.05 करोड़ रुपये की ठगी का शिकार बनाया गया। कोर्ट ने कहा कि यह कोई सामान्य अपराध नहीं है, बल्कि एक ऐसा नेटवर्क है जिसके खिलाफ राज्य और केंद्र दोनों स्तरों पर समन्वित कार्रवाई जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट अब 3 नवंबर को इस मामले की अगली सुनवाई करेगा।

