रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू हुए 47 दिन बीत चुके हैं। इसका अंजाम कोई नहीं जानता। हालांकि, इस युद्ध ने दुनिया के राजनीतिक समीकरणों को सिर के बल खड़ा कर दिया है। अमेरिका और पश्चिमी देश यूक्रेन के पीछे मजबूती के साथ खड़े हैं। उन्होंने रूस को सबक सिखाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया है। इन देशों ने रूस पर प्रतिबंधों की बौछार कर दी है। अमेरिका इनकी अगुआई कर रहा है। भारत उन देशों में शामिल है जो पूरे मामले में न्यूट्रल) रहा। यानी उसने अमेरिका या रूस दोनों में से कोई एक खेमा नहीं चुना। वहीं, अमेरिका और रूस दोनों चाहते हैं कि भारत उसके साथ खड़ा दिखाई दे। इसी कवायद के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ सोमवार को वर्चुअल मीटिंग की। खास बात यह है कि मीटिंग बाइडेन की पहल पर हुई। इस मीटिंग में अमेरिकी राष्ट्रपति ने ‘दादा’ नहीं बल्कि एक पार्टनर की तरह बात की। यह बैठक कई लिहाज से महत्वपूर्ण है। आइए, समझते हैं कैसे।
यह मीटिंग वर्चुअली हुई और पूरी दुनिया ने देखा कि दो बड़े राष्ट्रों के प्रमुख आपस में कैसे बातचीत करते हैं। मीटिंग में पीएम मोदी ने बिना लाग लपेट अपनी बात रखी। दो-टूक कहा कि वह रूस-यूक्रेन के बीच शांति चाहते हैं। इसके लिए उन्होंने अपनी ओर से प्रयास भी किए। जंग में शामिल दोनों देशों के राष्ट्रपतियों को उन्होंने फोन किया और आपस में बातचीत के लिए कहा। उन्होंने बूचा में निर्दोष लोगों की हत्या की आलोचना भी की। इसे चिंताजनक बताया। साथ ही उम्मीद जाहिर की कि दोनों देश बातचीत के जरिये शांति का रास्ता तलाश लेंगे।
जैसा कि उम्मीद थी अमेरिकी राष्ट्रपति ने यूक्रेन में मानवीय संकट को लेकर भारत से सहयोग की अपेक्षा जाहिर की। उन्होंने रूसी हमलों का शिकार यूक्रेन के लोगों को राहत सामग्री देने के लिए भारत के प्रयासों की सराहना की। साथ ही यह भी कहा कि दोनों इस मसले पर आगे भी बात करते रहेंगे।
अमेरिका-भारत दुनिया के दो सबसे बड़े और पुराने लोकतंत्र
मीटिंग का टोन गौर करने वाला था। पूरी बैठक में पीएम मोदी की बॉडी लैंग्विज बिल्कुल पॉजिटिव रही। इसके मैसेज की गहराई को समझने की जरूरत है। अमेरिका भारत को एशिया-प्रशांत क्षेत्र में एक बड़ी शक्ति के तौर पर देखता है। वह भारत की सांस्कृतिक विरासत को भी बखूबी समझता है। जब भारत शांति की बात करता है तो उसके कुछ मायने होते हैं। अमेरिका और भारत दुनिया के दो सबसे बड़े और पुराने लोकतंत्र हैं। अमेरिका के पाले में भारत के न दिखने से रूस के खिलाफ अमेरिका का नैरेटिव कमजोर दिखने लगता है। वह नहीं चाहता कि भारत तानाशाही ताकतों के साथ पलड़े में ज्यादा भारी दिखाई दे। पूरा वेस्टर्न वर्ल्ड पुतिन को एक तानाशाह के तौर पर दिखाने में लगा है।
अमेरिका समझता है भारत की मजबूरी
रूस के साथ भारत के पुराने संबंध हैं। वह उसके साथ हर मुश्किल में खड़ा रहा है। यूक्रेन युद्ध के बाद भी इन रिश्तों पर कोई फर्क नहीं पड़ा है। अलबत्ता इनमें और ज्यादा मजबूती आई है। अमेरिका को खिसकाकर रूस भारत के साथ रुपये-रूबल में कारोबार के विकल्प बनाने में लगा है। चीन पहले ही कह चुका है कि वह रूस के साथ कारोबारी रिश्तों को बनाए रखेगा। अगर एशिया की दो प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं रूस के साथ कारोबार जारी रखती हैं तो पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों का असर कुछ खास नहीं रह जाएगा। अमेरिका इस बात को समझता है। हालांकि, उसके पास भारत से नाराज हो जाने का भी कोई कारण नहीं है। वह जानता है कि कोई भी समझदार देश सबसे पहले अपने हितों की सुरक्षा करेगा। उसे भारत और रूस के संबंधों के बारे में अच्छे से पता है। ऐसे में अमेरिका की भी मजबूरी है कि वह संतुलन को साधकर रखे।
चीन पर अंकुश रखने के लिए भारत का साथ जरूरी
एक और अहम पहलू यह है कि अमेरिका एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते दबदबे को देख रहा है। वह उसके विस्तारवादी मंसूबों को भी समझता है। इसके अलावा अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वॉर भी जगजाहिर है। सिर्फ भारत ही नहीं चीन ने क्षेत्र के तमाम देशों की नाक में दम कर रखा है। इनमें ऑस्ट्रेलिया और जापान भी शामिल हैं। श्रीलंका जैसे देश चीन के कर्ज जाल में फंसकर खुद को बर्बाद कर चुके हैं। अमेरिका को पता है कि एकमात्र भारत ही है जो चीन को ईंट का जवाब पत्थर से दे सकता है। गलवान की झड़प में भारत यह दिखा भी चुका है। ऐसे में अमेरिका भी भारत के महत्व को समझता है। अपनी ओर से भारतीय प्रधानमंत्री के साथ बैठक की पहल करना इसका सबूत है।

