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तारिक रहमान को जमात और ISI के गठजोड़ से निपटना सबसे बड़ी चुनौती

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अंतरिम सलाहकार मोहम्मद यूनुस के दौर में जो गड़बड़ियां की गईं, उसकी वजह से तारिक रहमान को शुरू से सब कुछ शुरू करना पड़ सकता है. बांग्लादेश की सियासत पर निगाह रखने वालों का कहना है कि रहमान के लिए, विदेशी रिश्तों को संवारने से ज्यादा भीतर से सफाई करना सबसे बड़ी चुनौती होगी.

ढाका/नई दिल्ली. बांग्लादेश में हुए आम चुनावों के नतीजों ने एक नई सुबह की उम्मीद तो जगाई है, लेकिन आसमान में काले बादल अभी भी मंडरा रहे हैं. बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की प्रचंड जीत के बाद तारिक रहमान सत्ता की बागडोर संभालने जा रहे हैं, लेकिन खुफिया एजेंसियों का मानना है कि उनकी राह आसान नहीं होगी. मोहम्मद यूनुस के अंतरिम शासन ने देश को जिस हालत में छोड़ा है, वहां से सब कुछ फिर से शुरू करना ‘कांटों भरा ताज’ पहनने जैसा है. सबसे बड़ी चिंता जमात-ए-इस्लामी का उदय है, जिसने 77 सीटें जीतकर अपने इतिहास का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन किया है.

रिपोर्ट के मुताबिक, तारिक रहमान के सामने सबसे बड़ी चुनौती विदेशी रिश्तों को सुधारना नहीं, बल्कि देश के भीतर की गंदगी साफ करना है. अंतरिम सलाहकार मोहम्मद यूनुस पर आरोप है कि उन्होंने पाकिस्तान को जरूरत से ज्यादा तवज्जो दी. वीजा नियमों में ढील दी और समुद्री रास्ते खोल दिए. भारतीय एजेंसियों का दावा है कि यूनुस की इन गलतियों का फायदा उठाकर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI ने बांग्लादेश में हथियार, गोला-बारूद और आतंकी भेजे. इन्ही रास्तों से ड्रग्स की तस्करी कर भारत में नशा भेजा जा रहा है. रहमान को अब इस नेटवर्क को तोड़ना होगा.

जमात का ‘खूनी’ इतिहास और 77 सीटों का डर
भले ही सरकार BNP की बन रही हो, लेकिन जमात-ए-इस्लामी का कद बढ़ना खतरे की घंटी है. जो पार्टी कभी 20 सीटों का आंकड़ा पार नहीं कर पाती थी, वह आज 77 सीटों पर काबिज है. यह एक बड़ी छलांग है. जमात का एजेंडा 1971 के मुक्ति संग्राम की यादों को मिटाना और बांग्लादेश को पाकिस्तान की विचारधारा के करीब ले जाना है. यूनुस के राज में जमात ने अनियंत्रित भीड़ का इस्तेमाल कर मीडिया और अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया. पुलिस भी लाचार नजर आई.

भारत के लिए क्यों है चिंता की बात?
इंटेलिजेंस रिपोर्ट में भारत की सुरक्षा को लेकर गंभीर चेतावनी दी गई है. जमात ने पश्चिम बंगाल से सटे सीमावर्ती इलाकों में जीत हासिल की है. इन इलाकों में जमात की पकड़ मजबूत होने से कट्टरपंथ तेजी से फैलेगा, जो सीधे तौर पर भारत की नेशनल सिक्योरिटी के लिए चुनौती है.

गठबंधन या टकराव?
BNP के पास अपने दम पर बहुमत है, इसलिए उसे सरकार चलाने के लिए जमात की बैसाखी की जरूरत नहीं है. एक अधिकारी ने बताया, “अगर जमात को सत्ता में हिस्सेदारी नहीं मिली, तो वह कुंठा का शिकार होकर हिंसा और भीड़तंत्र को बढ़ावा दे सकती है.” रहमान देश में सामान्य हालात चाहते हैं, इसलिए वे शायद जमात को खुली छूट न दें. ऐसे में जमात अपनी 77 सीटों की ताकत और स्ट्रीट पावर का इस्तेमाल कर सरकार को अस्थिर करने की कोशिश कर सकती है.

निष्कर्ष: बांग्लादेश की जनता ने जमात की पाकिस्तानी सोच को नकार कर BNP को चुना है, लेकिन ‘सांप’ अभी भी घर के अंदर मौजूद है. तारिक रहमान को एक तरफ लोकतंत्र बहाल करना है, तो दूसरी तरफ जमात और ISI के गठजोड़ से निपटना है.

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