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क्रांतिकारी गीतकार शैलेन्द्र पर लिखी किताब “धरती कहे पुकार के 

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शैलेन्द्र के बहाने कवि, कविता और साहित्य पर कुछ बात …*

विजय दलाल

हिंदी के मूर्धन्य आलोचक रामविलास शर्मा के अनुसार “जिस साहित्य से जनता जागृत हो,वह साहित्य श्रेष्ठ है। उच्च कोटि की होने पर भी कविता यदि कवि तक सीमित रहे अथवा चार लोगों तक ही सीमित रहे तो वह हमारी दृष्टि से महान नहीं है।
महत्ता वहॉं पैदा होती है जहॉं लोकहृदय और कवि हृदय में तारतम्य है रामविलास शर्मा की इस कसौटी पर शैलेन्द्र की रचनाऍं सोलह आने खरी उतरती है।
धर्मयुग के 16 मई,1965 के अंक में ” मैं,मेरा कवि और मेरे गीत” आलेख में शैलेन्द्र ने प्रखर आलोचक रामविलास शर्मा के इस महत्वपूर्ण विचार को आगे बढ़ाते हुए लिखा है “एक बात तो मेरे मन में विश्वास बनकर बैठ गई है कि जनता को मूर्खया सस्ती रूचि का समझने वाले कलाकार या तो जनता को नहींसमझते या अच्छा और खुबसूरत पैदा करने की क्षमता उनमें नहीं है।*
हां वह अच्छा मेरे लिए बेकार,जिसे केवल गिने चुने लोग ही समझ सकते हैं।


*किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार
किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार
किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार
जीना इसी का नाम है…..


मेरा जूता है जापानी
ये पतलून इंगलिस्तानी
सर पे लाल टोपी रूसी
फिर भी दिल है हिंदुस्तानी।
निकल पड़े हैं खुली सड़क पर
अपना सीना ताने
मंजिल कहॉं कहॉं रूकना है ऊपरवाला जाने
बढ़ते जाएं हम सैलानी
जैसे एक दरिया तूफानी।


सजन ये झूठ मत बोलो
खुदा के पास जाना है,
न हाथी है न घोड़ा है,
वहां पैदल ही जाना है….


मेरे क्रांतिकारी दोस्तों को यह भाषा अटपटी लग सकती है
मगर इस मुल्क के लोगों की यही ज़बान है।
विजय दलाल

Ramswaroop Mantri

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