अभिव्यक्ति का कोई भी स्वरूप साहित्य, कला, थिएटर जो अपने समय के बारे मे कुछ भी नही कहता हो अप्रासंगिक है.इसिलिए क्रान्तीबा फुलेने मराठी ग्रंथकार सभा को लिक्खे खत मे कहा था ऊंटपरसे भेडबकरियो को चराने वालोसे,हमारा मेलजोल कतई संभव नही.हमारा रास्ता,हमारी श्रममूलक जीवनपध्दती -संस्कृति ,आपकी गैरश्रमिक, परजीवी,, बांडगूळ, दल्ला विकृतीके एकदम विरूध्द होने से. हम हमारे मेहनतकश लोगो के लिए खुदही सम्मेलन आयोजित करके विषमतावादी व्यवस्था के खिलाफ सांस्कृतिक प्रतिरोध पुरजोर तरीके से खडा करेंगे. और इसी फुले-आंबेडकर वादसे प्रेरित होकर विद्रोही सांस्कृतिक मुव्हमेंट कि तरफसे दि. २६ २७ मार्च को लोकशाहीर वामनदादा, मानव और मानवता का गीत गाकर मनुवादी व्यवस्था के खिलाफ बिगुल बजाने वाले प्रख्यात साहित्यकार बाबुराव बागुल आबा ,साम्राज्यवादी अमानवीय बर्बर व्यवस्था को अपने सामर्थ्यशाली शब्दबाणो से जर्जर करने वाले कविवर्य अरूण कालेजीके जन्मभूमी नाशिकमे १६ वा विद्रोही साहित्य सम्मेलन होने जा रहा है. मुलतत्ववादी-सांस्कृतिक दहशतवादी, सांस्कृतिक उपनिवेशवादी अ. भा. साहित्य सम्मेलन पर बहिष्कार का एलान भी आजही किया गया
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