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PM मोदी ने 8 साल में जो इमेज बनाई, उसे इन बयानों से नुकसान हुआ

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नई दिल्ली

पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ आपत्तिजनक बयान पर खाड़ी देशों से उठे विरोध के बाद बीजेपी एक्शन मोड में नजर आ रही है। पार्टी ने अपने दो प्रवक्ताओं नूपुर शर्मा और नवीन कुमार पर एक्शन लेकर कड़ा संदेश देने की कोशिश की और उसके बाद ऐसे नेताओं की लिस्ट तैयार करके उन्हें विवादास्पद बयानों से दूर रहने की हिदायत भी दे डाली।

इधर, इस मामले में आतंकी संगठन अल कायदा ने भी भारत को धमकी दी है। संगठन ने चिट्‌ठी जारी की है जिसमें दिल्ली, महाराष्ट्र, यूपी और गुजरात में आत्मघाती हमले की धमकी दी गई है।

इस मुद्दे पर पहले 57 मुस्लिम देशों के संगठन इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) ने विरोध जताया और इसके बाद कुछ अरब देशों ने भारतीय उत्पादों का बहिष्कार शुरू कर दिया। इसके साथ ही ईरान, इराक, कुवैत, कतर, सऊदी अरब, ओमान, यूएई, जॉर्डन, अफगानिस्तान, बहरीन, मालदीव, लीबिया, इंडोनेशिया, तुर्की, मलेशिया और पाकिस्तान ने भी बयान का विरोध किया है।

ऐसे में सवाल ये है कि अरब देशों का दबाव कितना असरदार साबित होगा? क्या आने वाले दिनों में भाजपा की रणनीति बदलेगी? क्या पार्टी हार्ड के बजाय साॅफ्ट चेहरे के तौर पर सामने आएगी? इन्हीं मुद्दों पर दैनिक भास्कर ने एक्सपर्ट्स से बात की। एक्सपर्ट्स के जरिए पूरे मामले को आप भी समझिए…

‘पीएम की आठ साल की मेहनत पर पानी फेरा’

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार और जेएनयू के रिटायर्ड प्रोफेसर पुष्पेश पंत कहते हैं कि भाजपा ने अपने प्रवक्ताओं के चयन में योग्यता का ध्यान नहीं रखा। ऐसे लोगों को प्रवक्ता नियुक्त किया गया है, जिन्हें पता नहीं है कि अशोभनीय भाषा क्या होती है। धर्म विरुद्ध भाषा क्या होती है।

नूपुर शर्मा बयान मामले में छोटे-छोटे मुस्लिम देश भी भारत का विरोध करने लगे हैं। भारतीय उत्पादों का बहिष्कार किया जाने लगा है। ये समझना होगा कि भारत तेल और गैस जैसी बुनियादी चीजों के लिए मिडिल ईस्ट पर निर्भर है। लाखों की संख्या में भारतीय खाड़ी के देशों में रहते हैं। ऐसी स्थिति में ये देश कभी भी कह सकते हैं कि भारतीय नागरिकों की उन्हें जरूरत नहीं है।

विरोध के बाद बीजेपी को ये कहना पड़ा कि ये पार्टी प्रवक्ताओं के निजी विचार हैं। सरकार या पार्टी का इससे कोई लेना-देना नहीं है। इस तरह से आप कितनी चीजों को नकार सकते हैं।

मेरे विचार से बीजेपी की ये कार्रवाई महज दिखावा भर है। ऐसा करके डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश की गई है। इससे पार्टी की रीति-नीति पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। बल्कि आगे नैरेटिव चेंज करके इस मामले को हल्का करने का प्रयास किया जाएगा। इसके अलावा बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती है।

कुछ लोग कहने लगे कि कतर की क्या औकात है। हम भी ऐसे देशों का बहिष्कार करेंगे, लेकिन समझने की बात यह है कि कतर के पास गैस का सबसे बड़ा भंडार है और भारत उसका सबसे बड़ा इंपोर्टर है। यूएई ने हमारे पीएम को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया है। पीएम ने आठ साल में जो सफलता हासिल की है, उसे इस तरह के बयानों से नुकसान पहुंचाया गया है।

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि हर मस्जिद में शिवलिंग नहीं तलाशने चाहिए। इसके बाद सोशल मीडिया पर भागवत के खिलाफ बयानबाजी शुरू हो गई। उन्हें कहा जाने लगा है कि वो राजनीतिक दबाव में काम कर रहे हैं।

‘मिडिल ईस्ट के देशों से भारत को कई फायदे’

जेएनयू के स्कूल आफ इंटरनेशनल स्टडी के एसोसिएट प्रोफेसर राजन कुमार कहते हैं कि बयानबाजी पर लिए गए एक्शन के पीछे आर्थिक वजहें सबसे बड़ी हैं। 50 से अधिक इस्लामिक देश हैं, जिनसे रणनीतिक, सामरिक और आर्थिक तौर पर भारत सीधे जुड़ा हुआ है।

1991 के जैसा गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हो सकता है। इसे बैलेंस ऑफ पेमेंट क्राइसिस के तौर पर भी जाना जाता है। इसकी एक वजह अमेरिका-इराक युद्ध भी था। इराक से भारत तेल इंपोर्ट करता था, जो अमेरिका से युद्ध के चलते ठप हो गया था।

वहीं मिडिल ईस्ट में रहने वाली बड़ी भारतीय आबादी भारत वापस आ गई थी। वहां काम करने वाले लोग भारत में रह रहे अपने परिवारों को भी पैसा भेजते थे, जो उस दौरान बंद हो गया। इसके चलते भारत का विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से घटने लगा और आर्थिक संकट गहरा गया।

कनेक्टिविटी की बात करें तो सेंट्रल एशिया में अपना सामान भेजने के लिए हम ईरान के पोर्ट चाबहार का इस्तेमाल करने जा रहे हैं। हम रूस तक सामान तुर्की के जरिए भेज रहे थे, जिससे लागत बढ़ जाती है। ईरान से हमें कई फायदे हैं।

ईरान से यदि संबंध खराब हो जाते हैं तो उस स्थिति में आप पाकिस्तान और अफगानिस्तान पर कैसे नजर रखेंगे। सुरक्षा के लिहाज से इन देशों से अच्छे रिश्ते रखना हमारे लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

दुबई में 25 से 30 फीसदी आबादी भारत और पाकिस्तान की है। अगर भारत में हिंदू-मुस्लिम विवाद बढ़ता है तो उसका असर इस्लामिक देशों से रिश्तों पर पड़ेगा।

अभी हमारे पास एक मौका है इन देशों से संबंध मजबूत करने का। वैसे भी ये देश छोटे-छोटे मामलों में दखल नहीं देते। कश्मीर मामले में कभी भी इस्लामिक देश भारत के खिलाफ नहीं बोलते।

सऊदी अरब से 17 से 18 फीसदी तेल भारत आता है। रिश्ते खराब होने की स्थिति में सऊदी अरब तेल देने से मना कर सकता है। उस स्थिति में भारत का क्या होगा।

60 से 70 लाख भारतीय मिडिल ईस्ट में काम करते हैं। वे भारत को पैसा भेजते हैं। भारत की पहुंच विश्व के सभी देशों तक है। ऐसे में संवेदनशील मुद्दों पर टिप्पणी से बचना चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया गया तो उन देशों का दबाव भारत पर पड़ेगा। जो देश भारत को सपोर्ट कर रहे हैं, वे हाथ पीछे खींचने लगेंगे। भारत को यूएन तक उन देशों की जरूरत है।

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