कभी मध्यप्रदेश का सूचना विभाग पत्रकारों की कलम का गवहा था अब सिर्फ़ विचार धारा की दीमक से ग्रस्त है।*
मध्यप्रदेश का जनसम्पर्क विभाग जो कभी देश भर में अपनी एक पहचान था । *आज इस विभाग में दीमक लग गयी है ।*
ये वही सूचना विभाग है जो पत्रकारों का सम्मान और मान रख कर सरकार को भी सचेत कर देता था । *क्योकि वो वक्त औऱ पत्रकार कुछ अलग ही थे अपने मान सम्मान औऱ खबरो से समझौता नही करते थे । और नोकरिया तक छोड़ दिया करते थे।*
आज अगर आप जनसम्पर्क विभाग की बात करें तो यहाँ सिर्फ बचा है तो तराजू जो सिर्फ़ वह लिखेगा उसे चुस्की मिलेगी । यहाँ पत्रकारों के लिए औऱ उनके संरक्षण व पत्रकारिता के उद्देश्य के लिए अब कुछ नही बचा , बचा है तो सिर्फ विज्ञापन का कमीशन चापलूसी औऱ चाय की चुस्कियां।
इस विभाग में अलग अलग कैटेगिरी में पत्रकारो की सूचियां बनाई जाती है । और किस किस को कौन कौन सी सूचना का आदान प्रदान किया जाना है या फिर किसे किस कार्यक्रम में बुलाना है या नही । अब जनसम्पर्क पिछले डेढ़ दशक से भी ज्यादा समय से इसी नीति पर एक विचारधारा से बंध कर काम कर रहा है ।
जो अधिकारी विचार धारा से सहमत नही होता या अपने कार्य के लिए ईमानदार होता है उन्हें भी यहाँ से संभाग ,जिला या लूप लाईन में डाल दिया जाता है । क्योकि वो आजकी पत्रकारिता के परिवेश से वाकीफ़ होता है । इस विभाग का सिस्टम अपडेट हो ना हो लेक़िन पत्रकारो की अवेलना औऱ उनके मान सम्मान को ठेस कैसे लगे इसमे अपडेट जरूर है ।
इस विभाग की संरचना जिस उद्देश्य से की गई थी अब उन उद्देश्यों से ये विभाग अलग ही दिशा में चल रहा है । औऱ पत्रकारिता औऱ पत्रकारो की कलम को समझने वाले अधिकार लूप लाईन में दबे कुचले पड़े है ।साथ ही जो पत्रकार कभी अपने मान सम्मान के लिए नोकरियों को भी छोड़ दिया करते थे वो आज जनसम्पर्क की सूची से दरकिनार खड़े है ।
*क्योकि मुख्यमंत्री स्वयं जनसम्पर्क मंत्री है । और मंच से ये कहते है कि एक अकेला आदमी पूरे जनसम्पर्क का काम करता है ।* तो अब ऐसे में अधिकारी भी सिर्फ दफ्तर में चुस्कियां ही लेते नज़र आते है । औऱ इस जनसम्पर्क विभाग को विचारधारा की दीमक ने जकड़ रखा है । *क्योकि माननीय जनसम्पर्क मंत्री एक अकेले चने से भाड़ फ़ूडवाने में लगे है ।*

