महाराजा प्रवीर की पुण्यतिथि पर गोपाल राठी पिपरिया की फेसबुक वॉल पर 1 साल पुरानी पोस्ट——
बस्तर के अंतिम महाराजा प्रवीर चन्द्र भंजदेव की आज पुण्यतिथि है l उनकी नृशंस हत्या से समूचे बस्तर में सन्नाटा छा गया था l यह एक ऐसी घटना थी जिसने न केवल बस्तर के भविष्य का रास्ता ही अंधेरे की ओर धकेला बल्कि उस समय के राजनीतिक एवं बौद्धिक जगत में भी हलचल मचा दी थी। डॉ. राम मनोहर लोहिया के विचार मैं उद्धरित कर रहा हूँ —
24.04.1966, को डॉ. राम मनोहर लोहिया ने कहा
“वे बस्तर के सर्वोपरि नेता थे। वे महाराजा जरूर थे, लेकिन एक तरीके से श्री भंजदेव हो चुके थे। उन्होंने 13 से 20 तारीख तक भूख हडताल की थी। उन्होंने भूख के मामले को ले कर ही यह हडताल की थी। अपने इलाके के लोगों के भूख से मरने के कारण यह हडताल उन्होंने की थी, ताकि वे भूख से न मरें। यहाँ पर धान मामले को ले कर तहलका मचा हुआ है और यह मामला महीनों से चल रहा है। बस्तर की जनता के कष्टों के लिये उनके मन में एक पीड़ा थी जो उनके आखिरी वक्तव्य से प्रकट होती है। उन्होंने कहा था “बस्तर के बाहर के लोगों को मुफ्त में जमीन दी जाती है, आदिवासियों के लिये लकड़ी और जमीन लेना मना है, यहाँ तक कि बस्तर के लोगों को अपने तालाबों में मछली पकड़ने का अधिकार भी नहीं है। आदिवासियों की जमीन पर जो लकड़ी है उसे शासन के डाकू और वकील-चोर हड़प रहे हैं।….। पर सरकार ने उनकी शिकायतों पर कोई ध्यान नहीं दिया और अब उनके चरित्र हनन की ही कोशिश की जा रही है।…।
यदि हम कहें कि बस्तर का राजा शराबी था तो नगा वाले मामले में क्या हुआ? कश्मीर में क्या हुआ? उर्वसीयम के मामले में क्या हुआ? सब जगह गोली क्यों चलानी पड़ती है? क्या इससे मामला गड़बड़ नजर नहीं आता? अंग्रेजी राज खराब था। इसमें शक नहीं कि उस राज्य से छुट्टी पा कर भारत ने बहुत उन्नति हासिल की है। लेकिन अंग्रेज इतने अनाडी नहीं थे जितने हमारे लोग हैं। वे अपनी राजनीति और कूटनीति के जरिये काम निकाल लेते थे लेकिन हमारे ये शासक एकदम अनाडीपन से काम लेते हैं। वे सरकारी हिंसा को छूट दे रहे हैं। मैं हिंसा को नापसंद करता हूँ। मैं अभी भी इस मत का नहीं बना हूँ कि सरकारी हिंसा का जवाब जनता की हिंसा से दिया जाये, लेकिन मैं बिलकुल किनारे आ खड़ा हुआ हूँ और मैं इसको रोकना चाहता हूँ। यहाँ वहाँ मिजो और नागा और कश्मीर और उर्वसीयम के चौथे, पाँचवे, छठे दर्जे के नेताओं को ढूंढ़ कर अपने साथ चिपका लेने से काम नहीं चलेगा। ये लोग भारत की सारी तपस्या को बरबाद कर रहे हैं।
इस अवसर पर प्रस्तुत है लाला जगदलपुरी की एक अत्यंत दुर्लभ कविता जो बहुत सीमित संग्रहों में ही उपलब्ध है तथा महाराजा प्रवीर का व्यक्तित्व एवं 1966 के गोलीकाण्ड की त्रासदी पर उनकी मनोभावनाओं को अभिव्यक्त करती है।
जहाँ पर गूंजती किलकारियाँ थीं, जहाँ पर पय पिलाती नारियाँ थीं, जहाँ पर गर्भिणी सुकुमारियाँ थीं, वहाँ पर दमन की तैय्यारियाँ थीं।
किया खुलकर परिश्रम क्रूरता नें, दिखाई शक्ति अनुपम शूरता नें, अनय का गर्व सचमुच भयंकर था, मरण का पर्व सचमुच भयंकर था।
प्रशासक बन गये एसे कसाई, अहिन्सा तिलमिलाई, छटपटाई, विगत शासक ‘प्रवीर’ उदार दानी, बहादुर, कष्ट-दर्शी, स्वाभिमानी।
कि जो थे नयनतारे आदिमों के, कि जो थे प्राण प्यारे आदिमों के,रुधिर उनका बहाया गोलियों से, उन्हें छलनी बनाया गोलियों से।
फकत अन्याय पर था रोष उनका, नहीं था और कोई दोष उनका, समर्पण की दिशा में बह गये जो, गँवा कर प्राण मन में रह गये जो।
उन्हें विश्वास अपने पीर पर था, भरोसा लोचनों के नीर पर था, अनय का सामना जो कर चुके हैं, सुरभि अपनी लुटा कर झर चुके हैं।
उन्हें बागी कहा, लांछन लगाया, उन्हें दागी कहा, लांछन लगाया, बहुत विश्वास था परमात्मा पर, करारी चोट पहुँची आत्मा पर।
उन्हें खो कर बहुत व्याकुल चमन है।उन्हें श्रद्धा सहित मेरा नमन है
( लाला जगदलपुरी )




