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राष्ट्रवाद की संकीर्णता फ़ासिज़्म है, विशालता वसुधैव कुटुंबकम् 

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नफरतवाद के खिलाफ धर्मनिरपेक्षता सहिष्णुता ही भारत के लोगों की असली ताकत है: अजय खरे

रीवा । विंध्यांचल जन आंदोलन के नेता अजय खरे ने कहा है कि राष्ट्र की अवधारणा अपने सभी नागरिकों के साथ समता और न्याय पर निहित है। राष्ट्र सभी निवासियों का है, किसी धर्म जाति पंथ समुदाय विशेष का नहीं। यहां तक बहुसंख्यक आबादी भी अल्पसंख्यक की अवहेलना नहीं कर सकती। किसी के साथ भी अन्याय नहीं होना चाहिए। नफरतवाद के खिलाफ धर्मनिरपेक्षता सहिष्णुता ही भारत के लोगों की असली ताकत है। किसी शासक के धर्म को राष्ट्र का धर्म मानना उचित नहीं है। धर्म नितांत निजी उपासना का विषय है , जिसे राष्ट्र पर नहीं लादा जा सकता। देश में अलग-अलग विचार , विभिन्न रीति रिवाज को मानने वाले लोग रहते हैं। राष्ट्र अपने धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के बिना सभी को साथ में लेकर नहीं चल सकता है। धर्मनिरपेक्षता राष्ट्र की आत्मा है। भारत पर किसी भी धर्म विशेष के व्यक्ति ने शासन किया हो लेकिन यहां के लोगों ने धर्मनिरपेक्षता को ही राष्ट्र धर्म के रूप में विकसित और स्वीकार किया। जब कभी धर्मनिरपेक्षता कमजोर हुई तो देश पर संकट गहराया। सावरकर का द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत घातक है जिसने अखंड भारत के सपनों को चूर करते हुए देश का बंटवारा करा दिया। धर्म जाति भाषा संप्रदाय नस्ल आदि के वर्चस्व पर बनने वाली विभेदकारी व्यवस्था राष्ट्र का आधार नहीं हो सकती है। कोई भी राष्ट्र नफरत से नहीं ,भाईचारे से चलता है। राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए उसका धर्मनिरपेक्ष स्वरूप बेहद जरूरी है। राष्ट्रवाद की संकीर्णता फ़ासिज़्म है, विशालता वसुधैव कुटुंबकम् जिसमें पूरा विश्व एक परिवार है।

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