Site icon अग्नि आलोक

सरकार की बेरुखी का शिकार हुई पुलिस की को-ऑपरेटिव फ्रॉड शाखा

Share

ब्रांच में विधिक सलाहकार, चार्टर्ड अकाउंटेंट, कंपनी सेक्रेटरी और वैल्यूअर्स  की कमी

भोपाल। लोगों को ठगों व जालसाजों से बचाने और ठगी की राशि दिलाने के मुहिम में जुटी मध्य प्रदेश पुलिस की  को-ऑपरेटिव फ्रॉड (सहकारी धोखाधड़ी) शाखा खुद सरकार की बेरुखी का शिकार हो रही है। इस शाखा को बीते लंबे समय से संसााधन जुटाने के लिए 23 करोड़ रुपये की दरकार बनी हुई है, लेकिन यह राशि नहीं दी जा रही है। यही नहीं इस शाखा को पर्याप्त मात्रा में बल भी नहीं दिया जा रहा है। इसकी वजह से प्रदेशवासियों के ठगों के पास फंसे करोड़ों रुपये वसूल नहीं हो पा रहे हैं। हद तो यह है कि इस शाखा को अब तक कोई थाना तक नहीं मिल पाया है और न ही आर्थिक मामलों की जांच के लिए विशेषज्ञ। इसके लिए बीते लंबे समय से लगातार पुलिस मुख्यालय की ओर से सरकार को प्रस्ताव भी भेजे जा रहे हैं।
गौरतलब है कि चिटफंड, सहकारिता सहित अन्य आर्थिक अपराधों में कार्रवाई के लिए पुलिस मुख्यालय में वर्ष 2013 में को-ऑपरेटिव फ्रॉड शाखा शुरू की गई थी, लेकिन इतने लबं समय बाद भी अब तक इस शाख को आवश्यक संसाधन नहीं मिल सके हैं। हद तो यह है कि सरकार द्वारा अब तक इस शाखा का नोटिफिकेशन भी नहीं किया गया है। इससे किसी मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल बनाए जा सकते हैं और न ही अलग से थाना खोला जा सकता है। अभी प्रदेश में संचालित थानों पर ही इन मामलों की रिपोर्ट दर्ज की जाती है।
इसके बाद थानों की ही मदद से आरोपियों को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश करना पड़ता है। ऐसे मामलों में की जटिलता को लेकर कोर्ट में पक्ष रखने में भी बेहद मुश्किल आती है। इसका फायदा कई बार आरोपियों को मिल जाता है। इसके बाद भी यह शाखा चिटफंड कंपनियों से करीब 800 करोड़ रुपये लोगों को वापस दिला चुकी है। इसके पास अभी जांच में 700 से ज्यादा मामले हैं।
बजट के अभाव में यह परेशानी
मांगी गई राशि से भोपाल, इंदौर, सागर, जबलपुर, ग्वालियर, रीवा, उज्जैन, रतलाम में आठ जोनल अधिकारियों की नियुक्ति की जानी है। इसके अलावा हर जोन पर अलग थाना वैल्यूअर्स, कंपनी मामलों के विधि विशेषज्ञों की तैनाती की भी योजना है। अभी स्थिति यह है कि पुलिस मुख्यालय में पुलिस महानिदेशक, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक, और उप पुलिस अधीक्षक है, लेकिन अतिरिक्त बल के नाम पर एक भी कर्मचारी नहीं है। विधिक सलाहकार, चार्टर्ड अकाउंटेंट, कंपनी सेक्रेटरी, वैल्यूअर्स को-आॅपरेटिव क्षेत्र से जुड़े अधिकारी-कर्मचारी नहीं हैं। इस संबंध में समय-समय पर उचित फोरम पर बात भी होती रही है। वर्ष 2017 में विधानसभा में भी मामला उठा था। 2019 में विभाग की समीक्षा बैठक में भी इस पर सहमति बनी थी, लेकिन कुछ नहीं हुआ।

Exit mobile version