शहर में थैलेसीमिया के ‘ए’ और ‘एबी’ पॉजिटिव ब्लड ग्रुुप वाले बच्चों को इन दिनों खून की किल्लत बनी हुई है। प्रदेश के सबसे बड़े एमवाय अस्पताल के ब्लड बैंक में भी इन दोनों ग्रुपों के ब्लड बहुत कम उपलब्ध हैं। खास बात यह कि शहर और आसपास कि जिलों के करीब 5 हजार से ज्यादा ऐसे बच्चे हैं, जो थैलेसीमिया से ग्रस्त हैं, लेकिन उनके रिश्तेदार और नजदीकी लोग ब्लड देने के लिए आसानी से उपलब्ध नहीं होते हैं। इसके पीछे दो मुख्य कारण शरीर में कमजोरी की आशंका और कोरोना संक्रमण हैं। स्थिति यह है कि 70% से ज्यादा बल्ड इन्हें वालन्टेरी डोनर्स के जरिए उपलब्ध हो रहा है।
पिछले दिनों खरगोन, देवास, खातेगांव व स्कीम 54 में रहने वाले बच्चों को इसके लिए इंतजार करना पड़ा और लौटना पड़ा। फिर 2-3 दिनों बाद उन्हें ब्लड उपलब्ध हुआ। वर्तमान में ब्लड कैंप संचालित करने वालों में प्रमुख रूप से सेवा भारती, अद्भुत फाउण्डेशन सहित 15 से ज्यादा एक्टिव एनजीओ हैं। जिनके द्वारा समय-समय पर कैम्प आयोजित किए जाते हैं। 14 जून को ‘विश्व रक्तदान दिवस’ पर शहर में कई स्थानों पर कैम्प संचालित हुए थे। जिसके तहत ब्लड, प्लाज्मा डोनेट किए गए थे। अब करीब एक माह बाद ए और एबी पॉजिटिव ग्रुपों के ब्लड ग्रुप की कमी बनी हुई है।
एमवाय अस्पताल ब्लड बैंक के एचओडी डॉ. अशोक यादव ने बताया कि पिछले दिनों इन दोनों ग्रुपों के ब्लड की जरूरत ज्यादा हुई जिसके चलते तीन-चार दिनों से कमी है। जबकि दूसरे ग्रुपों काल ब्लड उपलब्ध हैं। बकौल डॉ. यादव खून की कमी वाले मरीजों खासकर थैलेसीमिया के बच्चों के साथ भी यह स्थिति है कि इन्हें रिश्तेदार या नजदीकी लोग ब्लड बहुत कम देते हैं। जिसके चलते अधिकांश ब्लड वालन्टेरी डोनर्स से उपलब्ध होता है। यह वालन्टेरी डोनर्स सीधे अस्पताल आते हैं या कैम्प के माध्यम से ब्लड उपलब्ध कराते हैं।
दो यूनिट ब्लड 15 दिनों तक ही
वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजशन (डब्ल्युएचओ) की गाइड लाइन के अनुसार वालन्टेरी डोनेशन अधिकतम (100 फीसदी) किया जाना है। जिससे कहीं भी ब्लड संकट की स्थिति न बने। एमवाय अस्पताल के ब्लड बैंक में जो ब्लड उपलब्ध हैं। उसमें से 60 से 70 फीसदी तक वालन्टेरी डोनर्स का ही है। पिछले दिनों कोरोना की दूसरी लहर में संक्रमण ज्यादा होने व लॉकडाउन होने के बावजूद वे वालन्टेरी डोनर्स ज्यादा आगे आए जो समय-समय पर ब्लड डोनेट करते आए हैं। इस दौरान कोरोना प्रोटोकॉल के तहत स्पेशल कैम्प आयोजित किए गए जिसमें संक्रमण बचाव का पूरा ध्यान रखा गया। वैसे ज्यादातर खून उन्हीं बच्चों को दिया जाता है। जिनका हिमोग्लोबिन 8 ग्राम प्रति डेसीलीटर से भी कम है, लेकिन तब कोरोना संक्रमण की अनिश्चितता के चलते जिन बच्चों का हिमोग्लोबिन 10 प्रति डेसीलीटऱ तक था, उन्हें भी दिया गया क्योंकि थैलेसीमिया बच्चों के लिए दो यूनिट ब्लड 15 दिन तक चल पाता है। वैसे सामान्यत व्यक्ति में हिमोग्लोबिन की मात्रा 12 फीसदी या उससे ज्यादा होना चाहिए।
बाहर के बच्चों की ज्यादा परेशानी
शहर में थैलेसीमिया के 85 फीसदी बच्चों को ब्लड एमवाय अस्पताल ही उपलब्ध होता है जो पूरी तरह फ्री है। यहीं किसी भी प्रोसेस का कोई चार्ज नहीं लिया जाता। दूसरी ओर 15 फीसदी थैलेसीमिया वाले बच्चों को परिजन निजी अस्पतालों व अन्य ब्लड बैंकों से ब्लड उपलब्ध करवाते हैं। इनमें भी अधिकांश वे होते हैं जो इंदौर से बाहर के हैं, क्योंकि वे ब्लड चढ़ाने की प्रक्रिया के बाद तुरंत रवाना हो जाते हैं। हालांकि ब्लड चढ़ाने के पहले डोनर की एचआईवी, हेपेटाइटिस बी व हेपेटाइटिस बी की भी जांच होती है जिसके चार्जेस अलग और महंगे होते हैं।
तीन महंगी जांचों के लिए 3 करोड़ की मशीन
ब्लड की जांच जल्द कराकर मरीजों को उपलब्ध कराने के लिए केंद्र की योजना के तहत जनवरी 2021 में एमवायएच की ब्लड बैंक में तीन करोड़ की लागत वाली न्यूक्लिक एसिड टेस्ट (एनआईटी) मशीन का इंस्टालेशन किया गया था। इसमें ब्लड देने के पहले एचआईवी, हेपेटाइटिस बी और हेपेटाइटिस सी की जांच तुरंत हो जाती है। मशीन की क्षमता एक दिन में 300 से 400 सैम्पल टेस्ट करती है। इससे भी प्रक्रिया को काफी गति मिली है।
शादी से पहले आरएच टेस्ट जरूरी हो
थैलेसीमिया के बच्चों के लिए सालों से कार्यरत संस्था अद्भुत फाउण्डेशन के सिद्धार्थ शर्मा ने बताया कि थैलेसीमिया के बच्चों मेें कमी आने के लिए बेहतर है कि शादी के पहले युगल का आरएच फैक्टर टेस्ट कराया जाए जिससे दोनों की वर्तमान स्थिति पता चल सके कि उनमें थैलेसीमिया का माइनर या मेजर फैक्टर तो नहीं है। 18 मार्च 2021 को सांसद शंकर लालवानी ने भी लोकसभा में आरएच फैक्टर का मामला उठाया था। इसमें बताया था कि देश में 15-20% आबादी थैलेसीमिया माइनर हैं लेकिन अगर दो माइनर लोगों का आपस में विवाह होता है तो बच्चे के थैलेसीमिया मेजर होने की संभावनाएं बहुत ज़्यादा होती हैं। ऐसे में विवाह के पूर्व थैलेसीमिया की जांच ही इस बीमारी को रोकने की दिशा में सबसे बड़ा कदम है। थैलेसीमिया के बच्चों को हर हफ्ते कष्ट से गुजरना पड़ता है। पूरा परिवार आर्थिक और मनोवैज्ञानिक तौर पर टूट जाता है।

