विधानसभा चुनाव के पहले चरण के लिए आज मतदान है। वोट डालने के लिए कितने मतदाता निकलेंगे, इसका जोड़-घटाव व अनुमान लगने शुरू हो गए हैं। बात अगर नोएडा सीट की करें तो यहां पर अब तक हुए चुनाव में मतदान प्रतिशत 50 के पार नहीं गया है। अबकी बार यह प्रतिशत बढ़े यही सभी दल सोच रहे हैं। बीजेपी से लेकर सपा, कांग्रेस, बीएसपी, आप तक सभी को मत प्रतिशत बढ़ने में ही अपने बेहतरी व जीत की उम्मीद नजर आ रही हैं। आखिर सभी राजनीतिक दल क्यों चाहते हैं कि मतदान बढ़े।
बीजेपी
पिछला चुनाव बीजेपी प्रत्याशी ने एक लाख से ज्यादा वोटों से जीता था। अबकी बार उनके सामने लीड बरकरार रखने की चुनौती है। इसलिए बीजेपी की चाहत है कि इस सीट पर मत प्रतिशत बढ़े और लीड भी ज्यादा हो या कम से कम बरकरार रहे। संगठन पिछले चुनाव का जब भी आकलन करता है तो पदाधिकारी यह कहते हुए सुनाई देते हैं कि अगर मतदान और हुआ होता तो लीड और बड़ी होती।
सपा
पिछले चुनाव में नंबर-2 पर रही सपा संगठन का यह दावा है कि इस बार उसके पक्ष में माहौल है। माहौल परिणाम में बदले इसके लिए वोटिंग का ज्यादा होना जरूरी है। सपा संगठन के पदाधिकारी मानते हैं कि पिछले चुनाव में पार्टी का वोटर कम निकला था। अबकी बार मतदान बढ़ना पक्ष में होने का दावा है। वोटर को बूथ तक निकालने के लिए तैयारी भी की है।
कांग्रेस
पिछला चुनाव (2017 में) कांग्रेस सपा के साथ गठबंधन में लड़ी थी। 2012 के चुनाव में 25 हजार से ज्यादा वोट उस समय कांग्रेस के प्रत्याशी को मिले थे। कांग्रेस संगठन का मानना है कि उसका एक वोट बैंक है जो पिछले चुनाव में सपा के साथ नहीं गया और शांत रहा। उसके पिछले चुनाव में पार्टी की उतनी मजबूती नहीं थी। इस बार और मजबूती का दावा है। इस आधार पर मतदान प्रतिशत बढ़ना अपने पक्ष में आने का गणित कांग्रेस का है।
बसपा
2012 के चुनाव में 49 हजार से ज्यादा वोट बसपा को इस सीट पर हासिल हुए थे। 2017 के चुनाव में 27 हजार 365 वोट इस सीट पर मिले। बसपा संगठन के पदाधिकारियों का कहना है कि पिछले चुनाव में उसका कैडर वोटर नहीं निकला। इस वजह से कम वोट मिले। अबकी बार उन वोटर्स को निकालने के साथ ही नया वोट बैंक भी जोड़ने का दावा है। इसलिए वोट बैंक बढ़ने पर पदाधिकारी चुनाव अपने पक्ष में मान रहे हैं।
नौकरी में मायावती के करीबी, सियासत में बसपा से दूरी… यूपी के इन ‘अफसरों’ को रास नहीं आया हाथी
सपा में शामिल होने वाले कुंवर फतेह बहादुर की गिनती मायावती के बेहद करीबी अफसरों में होती थी। 2007 से 2012 के बीच जब प्रदेश में मायावती मुख्यमंत्री थीं। तब कुंवर फतेह बहादुर की तैनाती कई अहम पदों पर रही। वे प्रमुख सचिव गृह जैसे अहम पद पर रहे। रिटायरमेंट के बाद कुंवर फतेह ने बसपा का दामन थाम लिया। लेकिन बसपा के साथ उनकी पारी ज्यादा लंबे समय तक नहीं चल सकी। 2017 में बसपा जॉइन करने के कुछ साल बाद से कुंवर फतेह बहादुर की भूमिका पार्टी में न के बराबर हो गई थी। कई बार उन्होंने मायावती की नीतियों पर सवाल भी उठाए थे। रिटायर्ड आईएएस अफसर पीएल पुनिया की गिनती भी मायावती के बेहद खास अफसरों में होती थी। जब मायावती प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं, तब पीएल पुनिया उनके प्रमुख सचिव थे। नौकरी के दौरान भले की पीएल पुनिया मायावती के करीबी रहे हों, लेकिन जब राजनीति में जाने की बात आई, तो उन्होंने कांग्रेस को चुना। 2009 में कांग्रेस के प्रत्याशी के तौर पर वे बाराबंकी से सांसद बने। यूपीए सरकार में उन्हें राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग का अध्यक्ष बनाया गया। कांग्रेस ने उन्हें छत्तीसगढ़ का चुनाव प्रभारी भी बनाया और पार्टी ने वहां जीत भी हासिल की।- 1977 बैच के आईपीएस अफसर रहे बृजलाल को मायावती का दाहिना हाथ माना जाता था। 2007 में बसपा की सरकार सत्ता में आने के बाद बृजलाल को यूपी का एडीजी लॉ एंड ऑर्डर बनाया गया था। 2011 में मायावती ने दो वरिष्ठ आईपीएस अफसरों पर वरीयता देकर यूपी का डीजीपी बनाया था। लेकिन रिटायरमेंट के बाद बृजलाल ने 2015 में भाजपा जॉइन कर ली। 2018 में सीएम योगी आदित्यनाथ ने बृजलाल को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देते हुए यूपी अनुसूचित जाति और जनजाति आयोग का अध्यक्ष बनाया था। मौजूदा समय में बृजलाल राज्यसभा सांसद हैं। बृजलाल की पहचान भाजपा के बड़े दलित चेहरे के रूप में होती है।
- बसपा प्रमुख मायावती के सुरक्षा अधिकारी रहे पदम सिंह उनका साया माने जाते थे। पदम सिंह मायावती की सैंडिल साफ करने पर सुर्खियों में आए थे। पूर्व डीजीपी बृजलाल के बाद पदम सिंह ने भी भाजपा का दामन थाम लिया था। पदम सिंह को मायावती का सबसे विश्वासपात्र अधिकारी माना जाता था। उन्हें 2004 में डकैतों से लोहा लेने के लिए राष्ट्रपति के वीरता पदक से सम्मानित किया गया था।
- बसपा सरकार के एक और करीबी अफसर राम बहादुर ने भी हाल ही में बीजेपी का दामन थाम लिया। बसपा सरकार के दौरान राम बहादुर एलडीए वीसी समेत कई अहम पदों पर तैनात रह चुके हैं। राम बहादुर ने 2014 में मोहनलालगंज सीट से बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ा था।
- सिर्फ ब्यूरोक्रेट नहीं टेक्नोक्रेट भी इस सूची में शामिल हैं। 2019 के चुनाव में बीएसपी ने मछलीशहर लोकसभा सीट से त्रिभुवन राम को उम्मीदवार घोषित किया था। त्रिभुवन राम पीडब्लूडी के मुख्य अभियंता पद से 2011 में वीआरएस लेने के बाद बीएसपी की राजनीति में सक्रिय हुए। 2012 के विधानसभा चुनावों में वे अजगरा वाराणसी से विधायक चुने गए थे। वे बीएचयू से बीटेक हैं। इस विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने उन्हें उम्मीदवार बनाया है।
आप
पहली बार विधानसभा चुनाव में उतरी आप पार्टी के पदाधिकारी मान रहे हैं कि उनका कोई वोट बैंक नहीं है। दावा है कि दिल्ली के केजरीवाल मॉडल पर जनता उनके तरफ ही है। परिवर्तन के लिए मतदाता निकलेगा। इस लिहाज से मत प्रतिशत बढ़ना आप के भी गणित में शामिल है।
अब तक के चुनाव में मतदान प्रतिशत में
1993-
जेवर-47.12
दादरी -56.19
1996-
जेवर -50.09
दादरी-45.01
2002-
जेवर-52.20
दादरी -43.84
2007-
जेवर-46.63
दादरी-42.29
2012-
जेवर-62.05
नोएडा-49.98
दादरी-58.03
Assembly Election: कोरोना के बीच चुनाव, पिट गया चुनाव सामग्री का कारोबार
दिल्ली के सबसे बड़े थोक मार्केट, सदर बाजार, में पॉलिटिकल पार्टियों के झंडे, पटके, टोपी, बैनर, बिल्ले, पैन, डायरी आदि बनाने वाले व्यापारियों का अच्छा कामकाज है। अब कोविड प्रतिबंधों और चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों की वजह से चुनाव प्रचार सामग्री व्यापार की कमर टूट गई है। ऑल इंडिया इलेक्शन मैटेरियल मैन्यफ्रैक्चर्स एंड ट्रेडर्स असोसिएशन के महासचिव गुलशन खुराना ने बताया कि 5 साल पहले जो बिजनेस 5 हजार करोड़ रुपये का होता था। वह अब सिमटकर 600-700 करोड़ रुपये का रह गया है। सोशल मीडिया और कोरोना की वजह से प्रचार सामग्री व्यापारियों की हालत खराब हो गई है। कोरोना काल से पहले बड़ी-बड़ी रैलियां होती थीं। गली मोहल्ले में पदयात्राएं होती थीं। माहौल बनाने के लिए पटके, झंडे, बिंदी, साड़ियां, टोपी, झालर, बैंड, बैनर, टीशर्ट, स्टिकर आदि बिकते थे। महामारी में यह काम पिट गया है। सोशल मीडिया और वर्चुअल कैंपेन पर राजनेता फोकस किये हैं। इससे इलेक्शन कैंपेनिंग के दौरान उपयोग होने वाला सामान कम बिका है। दिल्ली के पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब में चुनाव हो रहा है। यहां से काफी माल कैंपेन में जाता था। इस बार ऐसा नहीं हुआ है।- गुलशन ने बताया कि कोविड-19 को ध्यान में रखकर मास्क भी बनाए थे। सभी राजनीतिक दलों के रंग और चुनाव चिन्ह मास्क का डिजाइन तैयार किया। मगर, नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं में महामारी का कोई खौफ नहीं दिख रहा। अधिकतर लोग बगैर मास्क के रैलियों और राजनीतिक कार्यक्रमों में हिस्सा ले रहे है। हमारे मास्क भी ज्यादा नहीं बिके, जबकि अभी कोरोना गया नहीं है। यदि राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता और समर्थक मास्क लगाएंगे, तो उनका प्रचार भी होगा और वे संक्रमण से भी बच सकते हैं।
- कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) ने केंद्र और राज्य सरकारों से डिमांड की है कि चुनाव प्रचार सामग्री से संबंधित व्यापारियों को वित्तीय राहत पैकेज दिया जाए। कैट के राष्ट्रीय महामंत्री प्रवीण खंडेलवाल ने कहा है कि इलेक्शन कैंपेन का बिजनेस देश में सीजनल है। इनसे जुड़े व्यापारियों को चुनाव का इंतजार रहता है। अब चुनाव आयोग द्वारा लगाई पाबंदियों से ट्रेडर्स को नुकसान पहुंचा है। इस बार आउटडोर प्रचार बहुत कम है। इसलिए व्यापारियों का सामान नहीं बिक रहा है।
2017-
जेवर-65.46
नोएडा-48.57
दादरी -60.13

