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सेंचुरी श्रमिक मांग रहे रोजगार: मिल्स की बिक्री फर्जी व्यापार, रोजगार बचाने, मिल्स चालू कराने मध्यप्रदेश शासन करें हस्तक्षेप

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मध्य प्रदेश के खरगोन जिले में स्थित 26 साल पुरानी सेंचुरी यार्न और डेनिम टेक्सटाइल्स
मिल्स के श्रमिकों का संघर्ष जारी है, रोजगार के लिए सेंचुरी की बड़ी कंपनी (CTIL) हर साल
लॉकडाउन में 400 करोड़ से 700 करोड़ रुपए तक मुनाफा कमाती है फिर भी इन मिल्स में
पूंजीनिवेश और आधुनिकीकरण न करते हुए कंपनी ने इन दो मिल्स में घाटा दिखाकर उन्हें
बेचने की साजिश की है। जबरन नगद राशि बैंक अकाउंट में डालने के बावजूद 873 श्रमिक और
कर्मचारियों ने उसे नकारते हुए अपना संघर्ष रोजगार पाने के लिए जारी रखा है। यह चुनौती है,
कंपनी और शासन को भी।


कुमार मंगलम बिरला समूह की सेंचुरी टेक्सटाइल्स एंड इंडस्ट्रीज लिमिटेड की मध्य प्रदेश के
खरगोन जिले में स्थित सेंचुरी यार्न और डेनिम मिल्स के श्रमिक अक्टूबर 2017 से आज तक
संघर्षरत हैं। हमारा संघर्ष है रोजगार बचाने जीने का और आजीविका पाने के लिए! 1993 और
1996 से स्थापित इन टेक्सटाइल्स मिल्स के द्वारा अश्वासन था, रोजगार का! मध्य प्रदेश के
पश्चिम निमाड़ के तथा अन्य राज्यों में खूब प्रचार और विज्ञापन के द्वारा आमंत्रित किए
युवाओं ने 30/रु. रोज लेकर भी प्रशिक्षण लिया और अपना खून पसीना बहायाl कई सारे 25 सालों
तक मेहनत की पूंजी लगाये और बिड़ला समूह की तिजोरी भरती और संपत्ति भी बढ़ती गयी।
मात्र 10 से 14 हजार रु. वेतन पाते हुए श्रमिक भी सेंचुरी कंपनी में डटे रहे, रोजगार की
निश्चिती मानकर!

2017 में अचानक दोनों मिल्स बेचने निकली सेंचुरी कंपनी मुंबई आगरा हायवे पर स्थित अपनी
83 एकड़ जमीन, दसों इमारतें, बड़े गोडाउन्स, मशीनरी और सैकड़ों श्रमिक तथा कर्मचारियों के
आवास, जिसमें 57 एकड़ खुली जमीन भी शामिल रही है। श्रमिकों ने इसका विरोध दर्ज करते
हुए सत्याग्रह शुरू किया, नर्मदा बचाओ आंदोलन का साथ लेकर! उस वक्त रजिस्टर्ड रही चारों
यूनियंस के प्रतिनिधियों ने आयटक/एटक, इंटक, भारतीय मजदूर संघ और कामगार एकता ने
हमारे साथ श्रमिक जो भी दिशा तय करेंगे, उसे साथ देने की घोषणा मंच से की। कुछ ही दिनों
में सेंचुरी ने की बिक्री- वेयरइट ग्लोबल कंपनी के साथ 2.5 करोड़ रुपए मात्र संपत्ति की कीमत
दिखाकर किया हस्तांतरण का अनुबंध औद्योगिक न्यायालय में फर्जी साबित होकर रद्द करना
पड़ा। औद्योगिक न्यायालय, उच्च न्यायालय और सर्वोच्च अदालत से भी आदेश होकर 44
महीनों तक मिल्स बंद रखकर भी वेतन देना पड़ा, करीबन 900 श्रमिक और कर्मचारियोंको, हर
महीना दो करोड़ रुपए तक!
सेंचुरी मैनेजमेंटने इंदौर आकर हमारे ही साथ बात की, श्रमिक शक्ति देखकर! पहले (अगस्त
2017 में) उन्होंने मिल्स सुचारू रूपसे चलाएंगे लेकिन अगर नहीं चला पाए तो VRS (स्वैच्छिक
सेवानिवृत्ति अनुदान) देंगे यह लिखित दिये आश्वासन के अनुसार 3 से 5 लाख तक राशि देने
का प्रस्ताव रखा। जब हमने नामंजूर किया तब तत्काल ही 1/-रुपए में दोनों मिल श्रमिकों की
संस्था को देने का प्रस्ताव रखा। इन दोनों विकल्पों की बात उन्होंने औद्योगिक ट्रिब्यूनल के
समक्ष हलफनामे में भी पेश की। हमने दोनों विकल्पों पर चार बार उन्हीं से चर्चा और विशेषज्ञों
से जांच एवं सलाह के बाद अक्टूबर 2018 में श्रमिकों के द्वारा ही मिल्स चलाने का विकल्प,
ऐतिहासिक ही नहीं न्यायिक भी होते हुए स्वीकारा और उस पर काफी कार्य करने के बाद
प्रस्ताव पेश किया। धक्कादायक बात यह हुई कि चारों युनियंसने जो 44 महीनों तक चले
सत्याग्रह आंदोलन में भी शरीक नहीं थे, एक होकर VRS की मांग की। उनके पत्र में फर्जी
हस्ताक्षर भी मिले। सेंचुरी ने इसी का फायदा उठाकर श्रमिक संस्था को मिल्स देने का प्रस्ताव
नकारा। लेकिन श्रमिक चंद रुपए/नगद राशि लेकर जिंदगी नहीं बिता सकते हैं इसलिए उन्होंने
हमारी ‘श्रमिक जनता संघ’ के साथ, 90% श्रमिक सदस्य बनकर एकजुटता दिखाई।
अब फिर से सेंचुरी ने मंजीत ग्लोबल प्राइवेट लिमिटेड और मंजीत कॉटन प्राइवेट लिमिटेड
कंपनियों को, जिसके मुखिया तो एक ही हैं जो ‘कॉटन किंग’ माने जाते रहे, बेचना खुद ही तय
करके बिजनेस ट्रांसफर एग्रीमेंट और किया जिस में भी फर्जीवाड़ा है। जो औद्योगिक भूमि है, उसे
व्यवसायिक भूमि भी नहीं, कृषि भूमि बताकर बेचना, हाईवे के लागत की भूमि भी ‘रोड से

अंदर की भूमि’ बताना एक मील की संपत्ति दूसरे मील के नाम RCC की बिल्डिंग्स भी RBC वर्ग
में आदि गलत आधार लेकर मात्र 62 करोड़ में बेची हुई संपत्ति वही है, जो कि 2017 में उच्च
न्यायालय में पेश किए अधिकृत मूल्यांकन के अनुसार 426.78 तक करोड़ रुपए की साबित हुई
थी! फिर से VRS थोपने की हरकत भी 29 जून 2021 को नोटिस थोपकर की गई और नये
मालिक से किसी भी श्रमिक या कर्मचारी का काम पर ना लेना जाहिर किया।
सेंचुरी के 873 श्रमिक और कर्मचारियों ने जब भी VRS नकारा है, तब जरूरी है शासन ने
हस्तक्षेप करके बिक्री अनुबंध और रजिस्ट्रियों की जांच करना तथा सभी श्रमिकों को रोजगार
सुनिश्चित करना।
मध्य प्रदेश और देशभर बेरोजगारी के खिलाफ लड़ रहे हैं युवा, आत्महत्याओं के लिए मजबूर
हैं, किसानों की तरह! क्या राज्य शासनने, श्रममंत्रालय और मुख्यमंत्री श्रमिकों के पक्ष में अगुवाही
नहीं करेंगे? क्या उद्योगपतियों की मनमानी नहीं रोकेंगे। क्या VRS के नाम पर ‘अनैच्छिक
सेवानिर्वित्ति’ की साजिश से श्रमिकों की जिंदगी की बर्बादी को नहीं रोक पाएंगे? हम चाहते हैं
त्वरित हस्तक्षेप, विवाद का सुलझाव।
देवीसिंह तोमर संदीप मिश्रा मेधा पाटकर

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