आज का दौर एक तरफ जहाँ अँधेरे-निराशा का दौर है वहीं दूसरी तरफ यह चुनौतीपूर्ण भी है। हर समाज बदलता है और बदलाव को छोड़कर कुछ भी सनातन नहीं है। किन्तु यह भी उतना ही सच है कि यह अपने आप नहीं बदलता, प्रत्येक समाज को इन्सान ही बदलते हैं।
बाबाओं और इनके पैदा होने की ज़मीन को तभी समाप्त किया जा सकता है जब मुनाफ़ा-केन्द्रित पूँजीवादी व्यवस्था के स्थान पर मानव-केन्द्रित व्यवस्था की स्थापना की जाये। जब लोगों की भौतिक ज़रूरतें पूरी होंगी तो अलौकिक शक्तियों का भौतिक आधार भी धीरे-धीरे समाप्त होता चला जायेगा। लेकिन व्यवस्था परिवर्तन तक हाथ पर हाथ धरकर इन्तज़ार नहीं करना होगा बल्कि तुरन्त संजीदगी और धैैर्य के साथ ज्ञान-विवेक-तर्कणा और जनवादी मूल्यों का लगातार व अनथक ढंग से प्रचार-प्रसार करना होगा। अपनी ताक़त को प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करते हुए अपने हक-हुक़ूक़ की प्रत्येक ज़ब्ती पर फिर से मुक्का ठोंकना होगा। अँधेेरे की ताक़तों से लगातार लोहा लेना होगा, और सच को बार-बार जनता के बीच ले जाना होगा।
