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इस चुनाव में नहीं दिख रहा बाहुबलियों का जोर; सभी प्रमुख दलों ने किया किनारा

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इस चुनाव में बाहुबलियों का जोर नहीं दिख रहा है। सभी प्रमुख दलों ने किनारा कर लिया है। परिवार को भी टिकट मिलना मुश्किल हो रहा है। पुलिस और अदालत की सख्ती की वजह से सियासत में बाहुबलियों का दखल खत्म हो गया है।सारे समीकरणों को ध्वस्त करने का हथियार बन गए। पर, वक्त का पहिया कुछ ऐसा घूमा कि बाहुबलियों की न तो वो धमक रही, न ही वो हनक। लोकसभा चुनाव में पहली बार ऐसा देखने को मिल रहा है कि बाहुबली अपनी पतीली चुनावी चूल्हे पर चढ़ाने से भी कतरा रहे हैं। यूपी की सियासत में बाहुबली कैसे नहीं रहे बली, बता रहे हैं अशोक मिश्रा…

पं. जवाहरलाल नेहरू हों या फिर लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, चौधरी चरण सिंह, राजीव गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, अटल बिहारी वाजपेयी हों या फिर मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, इन सभी ने दिल्ली की कुर्सी का रास्ता वाया यूपी ही तय किया। यही वजह थी कि सत्ता के गलियारों में कहा जाने लगा कि दिल्ली की कुर्सी का रास्ता लखनऊ से होकर गुजरता है। पर, प्रदेश ने एक दौर ऐसा भी देखा जब बाहुबली सियासत की अलग भाषा और परिभाषा लिखने लगे।

बीते तीन दशकों की यूपी की सियासत पर नजर डालें तो तमाम बाहुबली अपने दमखम से सत्ता दिलाने और खुद भी माननीय बनने की होड़ में रहे। पश्चिम में डीपी यादव से लेकर पूर्वांचल में मुख्तार अंसारी के कुनबे ने सभी प्रमुख दलों में अपनी पैठ बनाई। पर, 2017 के बाद एक बड़ा टर्निंग पॉइंट आया। सलाखों के पीछे रहकर भी सियासी उलटफेर करने का दम रखने वाले तमाम माफिया इस बार हाशिए पर हैं। 

अदालत और पुलिस की सख्ती ने बाहुबलियों के चुनाव लड़ने के मंसूबे पर पानी फेर दिया है। मुख्तार अंसारी, विजय मिश्रा, धनंजय सिंह, रिजवान जहीर, अमरमणि त्रिपाठी, विनय शंकर तिवारी, हाजी याकूब कुरैशी, संजीव द्विवेदी उर्फ रामू द्विवेदी, राजन तिवारी, बृजेश सिंह जैसे तमाम बाहुबली नेता कानून के शिकंजे में कुछ इस कदर फंस चुके हैं कि उनका चुनाव लड़ पाना या लड़वा पाना आसान नहीं है। इनमें से कुछ सजा होने की वजह से चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य हो चुके हैं, तो कई पर सजा की तलवार लटक रही है।

अंसारी परिवार ने दिखाया कुछ दम
मुख्तार अंसारी के भाई अफजाल अंसारी ही सिर्फ अपने कुनबे की सियासी पहचान को बचाए रखने की जद्दोजहद में जुटे हैं। अंसारी परिवार के तीन सदस्य वर्तमान में निर्वाचित जनप्रतिनिधि हैं। इनमें अफजाल अंसारी गाजीपुर से बसपा सांसद हैं, जो इस बार सपा के टिकट पर चुनाव लड़ने जा रहे हैं। जबकि मुख्तार का बेटा अब्बास मऊ सदर से सुभासपा विधायक है। मुख्तार के भाई सिगबतुल्लाह का बेटा शोएब अंसारी मन्नू गाजीपुर की मोहम्मदाबाद सीट से सपा विधायक है।

छोटे दलों से ही आस

ये भी हुए सियासी मैदान से दूर
बसपा सरकार में मंत्री रहे बादशाह सिंह को विधायक निधि के दुरुपयोग के मामले में सजा हो चुकी है। पूर्व सांसद रमाकांत यादव भी सजा भुगत रहे हैं। पश्चिमी उप्र के माफिया डीपी यादव को भी सही सियासी ठौर नहीं मिल रहा है। एनआरएचएम घोटाले में फंसने के बाद बाबू सिंह कुशवाहा और मुकेश श्रीवास्तव की भी सियासी पहचान धूमिल होती चली गई। बसपा सरकार में लोकायुक्त जांच में फंसे तत्कालीन मंत्री राजेश त्रिपाठी, अवध पाल सिंह यादव, रंगनाथ मिश्रा, रतन लाल अहिरवार, फतेह बहादुर सिंह, चंद्रदेव राम यादव, सदल प्रसाद, राकेश धर त्रिपाठी को भी बड़ा नुकसान उठाना पड़ा, जिससे सियासत में इन सबकी तरक्की पर गहरा प्रभाव पड़ा।

अतीक के कुनबे का सियासी सफर खत्म
माफिया अतीक अहमद हर चुनाव में अपनी दावेदारी पेश करता था। उसका भाई अशरफ विधायक रहा था। अतीक की पत्नी भी कई बार चुनाव मैदान में उतरने की कवायद कर चुकी है। उमेश पाल हत्याकांड के बाद अतीक और उसके भाई अशरफ की भी हत्या हो गई, जबकि दोनों की पत्नियां पुलिस रिकाॅर्ड में फरार हैं। अतीक के दोनों बेटे भी जेल में हैं। यूं कहें कि अतीक के पूरे कुनबे की अब सियासत में वापसी आसान नहीं है।

पर, इनका जलवा अभी कायम
प्रदेश के कुछ बाहुबली ऐसे भी हैं, जिनकी सियासी गलियारों में पकड़ मजबूत हुई है। सालों तक फरार रहे माफिया बृजेश सिंह ने आत्मसमर्पण करके यूपी में वापसी की, तो उनके परिवार के लिए सियासत के दरवाजे खुलते चले गए। बृजेश और उनकी पत्नी एमएलसी बने। अब वह बेटे को राजनीति में स्थापित करने के लिए प्रयासरत हैं।

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