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*मप्र में 2020 से टूटती गई परंपरा: खाली है विधानसभा उपाध्यक्ष का पद*

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मप्र विधानसभा में 2020 से उपाध्यक्ष का पद खाली है। यह पद विपक्ष को देने की परंपरा रही है, लेकिन 2020 में हुए दलबदल के बाद से यह पद खाली है। 16वीं विधानसभा के तहत 1 दिसंबर से शीतकालीन सत्र शुरू होने जा रहा है। इसके साथ ही यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि मप्र विधानसभा का एक और सत्र बगैर उपाध्यक्ष के आहूत होगा। पिछले साढ़े पांच साल से विधानसभा उपाध्यक्ष का पद रिक्त है। जबकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 178 में प्रदेश विधान सभाओं में स्पीकर सहित डिप्टी स्पीकर के पद का उल्लेख है।

नियमानुसार विधान सभा के द्वितीय सत्र तक उपाध्यक्ष पद की पूर्ति होना चाहिए, किंतु मध्यप्रदेश विधानसभा में विगत साढ़े पांच साल से उपाध्यक्ष की नियुक्ति नहीं होने से यह पद रिक्त है। दरअसल, मप्र में 2018 में कांग्रेस की सरकार बनने पर कमलनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद विपक्ष को पद नहीं दिया गया था। कांग्रेस विधायक हिना कांवरे को विधानसभा का उपाध्यक्ष बनाया गया था। 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस विधायकों के भाजपा में शामिल होने के बाद बनी शिवराज सरकार में भाजपा ने कांग्रेस को उपाध्यक्ष का पद नहीं दिया। इसके बाद से अब तक विधानसभा उपाध्यक्ष का पद खाली ही है।


मप्र विधानसभा का एक और सत्र बगैर उपाध्यक्ष के आहूत होने जा रहा है। पिछले साढ़े पांच साल से विधानसभा उपाध्यक्ष का पद रिक्त है। इस दरमियान शिवराज सरकार का चौथा कार्यकाल पूरा हो गया और मोहन सरकार को सत्ता में आए दो साल होने को हैं, लेकिन विधानसभा उपाध्यक्ष के पद के लिए निर्वाचन नहीं हुआ है। बड़ा सवाल यह है कि नया विधानसभा उपाध्यक्ष क्यों नहीं बनाया जा रहा है?  मप्र विधानसभा में अब तक 18 उपाध्यक्ष रहे हैं। विष्णु विनायक सरवटे मप्र विधानसभा के पहले उपाध्यक्ष थे। उनका कार्यकाल 24 दिसंबर, 1956 से 5 मार्च, 1957 तक था। भाजपा के पास 22 साल (वर्ष 2003 से) से विस उपाध्यक्ष का पद नहीं है। ईश्वरदास रोहाणी भाजपा के अंतिम विस उपाध्यक्ष थे। उनका कार्यकाल 1999 से 2003 तक था। उनके बाद हजारीलाल रघुवंशी, हरवंश सिंह, डॉ. राजेंद्र कुमार सिंह और हिना कांवरे (सभी कांग्रेसी) विस उपाध्यक्ष रहे।
ऐसे टूटती गई परंपरा
दरअसल, मप्र में विधानसभा उपाध्यक्ष का पद विपक्ष को देने की परंपरा रही है, लेकिन तत्कालीन कमलनाथ सरकार में यह परिपाटी टूट गई थी।15वीं विधानसभा के गठन के बाद अध्यक्ष के निर्वाचन के समय भाजपा ने परंपरा को तोड़ते हुए अपना उम्मीदवार मैदान में उतार दिया था। इसके बाद से ही उपाध्यक्ष को लेकर भी दोनों पार्टियों के बीच विवाद की स्थिति बन गई थी। इसके पहले अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव आपसी सहमति से निर्विरोध कर लिया जाता था। जहां अध्यक्ष का पद सत्ता पक्ष के पास रहता था, तो वहीं उपाध्यक्ष का पद विपक्ष को दे दिया जाता था। लेकिन 2018 में कांग्रेस ने जब अध्यक्ष पद के लिए एनपी प्रजापति का नाम सामने किया था, तो भाजपा ने जगदीश देवड़ा को मैदान में उतार दिया। हालांकि देवड़ा चुनाव हार गए थे। इसके बाद कांग्रेस ने उपाध्यक्ष का पद भी विपक्ष को नहीं दिया। कमलनाथ सरकार ने विधानसभा उपाध्यक्ष का पद अपने पास रखते हुए तत्कालीन विधायक हिना कांवरे को विधानसभा उपाध्यक्ष बनाया था। उन्होंने 10 जनवरी, 2019 को विधानसभा उपाध्यक्ष पद की शपथ ली थी। मार्च, 2020 में कांग्रेस विधायकों के दलबदल के चलते कमलनाथ सरकार गिर गई। शिवराज सिंह चौहान चौथी बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। हिना कांवरे ने 24 मार्च, 2020 को विधानसभा उपाध्यक्ष का पद छोड़ दिया था। शिवराज सरकार के चौथे कार्यकाल (वर्ष 2020 से 2023 तक) में विधानसभा उपाध्यक्ष का पद खाली रहा। मोहन सरकार को भी 19 महीने से ज्यादा हो गए, लेकिन अब तक किसी को विधानसभा उपाध्यक्ष नहीं बनाया गया है। सूत्रों का कहना है कि भाजपा सरकार कांग्रेस के पदचिन्हों पर चलते विधानसभा उपाध्यक्ष का पद विपक्ष को नहीं देना चाहती। भाजपा के कई वरिष्ठ विधायकों की नजर विधानसभा उपाध्यक्ष के पद पर है। खासकर वे वरिष्ठ विधायक, जिन्हें मंत्री नहीं बनाया गया है। गौरतलब है कि मप्र विधानसभा में उप नेता प्रतिपक्ष हेमंत कटारे ने जनवरी, 2025 में स्पीकर नरेंद्र सिंह तोमर को पत्र लिखकर उपाध्यक्ष का पद विपक्ष को देने का आग्रह किया था। पत्र में उन्होंने कहा था कि नियमानुसार विधानसभा के द्वितीय सत्र तक उपाध्यक्ष पद की पूर्ति होना चाहिए, लेकिन मप्र विधानसभा में विगत करीब पांच वर्ष से उपाध्यक्ष का पद रिक्त है। मप्र में विधायी कार्य को लोकतांत्रिक व स्वच्छ विधायी परंपरा के अनुरूप संपादित करने के लिए उपाध्यक्ष पद विपक्ष को देने की परंपरा रही है।

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